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राजपाट: बदली रंगत

गौरवयात्रा को दूसरे चरण में गुर्जर बहुल इलाकों में जाना था। पर वाजपेयी के निधन के कारण उसे टाल दिया था। वैसे भी गुर्जर बहुल इलाकों में विरोध होगा, इसका कुछ अहसास पहले से था। गुर्जरों ने एलान जो कर रखा था कि मीणा जाति जैसा आरक्षण नहीं मिला है तो फिर यात्रा को क्यों निकलने दें।

चुनावी मौसम में ही याद आती हैं नेताओं को यात्राएं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने यात्रा निकाली तो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भी सूझी गौरव यात्रा। लेकिन जोधपुर संभाग में उनकी यह गौरव यात्रा अखाड़े में बदल गई। यात्रा का विरोध देख भाजपा सकपका गई है। साढ़े चार साल के राज से लोग इस कदर कुपित होंगे, इसका अंदाज नहीं था पार्टी को। लोगों ने काले झंडे तो दिखाए ही पथराव तक कर दिया।

गौरवयात्रा को दूसरे चरण में गुर्जर बहुल इलाकों में जाना था। पर वाजपेयी के निधन के कारण उसे टाल दिया था। वैसे भी गुर्जर बहुल इलाकों में विरोध होगा, इसका कुछ अहसास पहले से था। गुर्जरों ने एलान जो कर रखा था कि मीणा जाति जैसा आरक्षण नहीं मिला है तो फिर यात्रा को क्यों निकलने दें। गुर्जर बहुल इलाकों को छोड़ जोधपुर संभाग चुना था। पिछले चुनाव में यहां खासी सफलता भी मिली थी। पर अशोक गहलोत ने अपने प्रभाव वाले इस इलाके में रिफाइनरी की स्थापना नहीं होने के मुद्दे पर वसुंधरा विरोधी माहौल बना दिया। काले झंडे देख वसुंधरा का पारा सातवें आसमान पहुंचा और कोसने लगीं गहलोत को। जोधपुर संभाग की देखा-देखी अब दूसरे इलाकों में भी समर्थन के बजाए सवालों का सामना ही कर रही है गौरव यात्रा।

ठौर की तलाश

पश्चिम बंगाल के वामपंथी दुविधा में हैं। लगातार चौंतीस बरस तक सूबे की सत्ता पर काबिज रहने के बाद ऐसी बेकद्री की उम्मीद नहीं की होगी। लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। पर माकपा अपनी रणनीति तय नहीं कर पा रही है। थामे तो आखिर किसका हाथ। तृणमूल कांग्रेस या कांग्रेस। सैद्धांतिक रूप से तो किसी से भी नहीं मिलते ग्रह-नक्षत्र। राज्य समिति की बैठक में संभावित साझेदार को लेकर मंथन तो हुआ पर नतीजा नहीं निकल पाया। केंद्रीय नेतृत्व तो शुरू से ही तालमेल के पक्ष में नहीं पर सूबे के नेता जमीनी हकीकत के हिसाब से चलने में हित देख रहे हैं।

एकला चलो रे का जोखिम नहीं उठा पा रहे। पंचायत के गठन में पार्टी कई जगह कांग्रेस की मदद कर रही है। कांग्रेस से तालमेल अतीत में भी हुआ है। कभी घोषित तो कभी परोक्ष। अब तो सूबे में नेतृत्व तक का संकट है। हर स्तर पर स्वीकार्यता वाला एक भी नेता बचा ही नहीं। भाजपा के खिलाफ कांग्रेस का हाथ थामना मजबूरी है। भले कांग्रेस ने अभी तक कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि, जरूरत उसे भी है सहारे की। वामपंथियों से बेहतर तो उसकी भी हालत नहीं यहां। दलबदल और बगावत से जूझ रही राहुल गांधी की पार्टी के लिए भी अपनी सीटों को बचाना ही हंसी खेल नहीं है।