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राजनीति: नेपाल में भारत की चिंता

पूर्ण बहुमत से नेपाल की सत्ता में आए ओली भारत से अच्छे संबंधों की बात तो कर रहे हैं, लेकिन उनके तमाम आश्वासनों के बावजूद भारत की चिंता कम नहीं हुई है। नेपाल अब चीन ही नहीं, पाकिस्तान से भी नजदीकी बढ़ाने को इच्छुक है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खान अब्बासी ने हाल ही में नेपाल की यात्रा की। दूसरी तरफ चीन में शी जिनपिंग के और मजबूत होने के बाद नेपाल में और आक्रामक आर्थिक विस्तार के संकेत चीनी कंपनियों की तरफ से हैं।

Author April 2, 2018 03:56 am
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली।

संजीव पांडेय

नेपाल में खासे बहुमत से सरकार बनाने के बाद वहां प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने जहां देश में सक्रिय स्वयंसेवी संगठनों पर लगाम कसना शुरू कर दिया है वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय से नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का आग्रह भी किया है। विभिन्न जांच एजेंसियों को सीधे अपने नियंत्रण में लेने के संकेत उन्होंने दिए हैं। उनका कहना है कि नेपाल अब एक स्वतंत्र विदेश नीति की तरफ बढ़ेगा। हालांकि कुछ ही दिनों में भारत के दौरे पर ओली पहुंच रहे हैं, लेकिन चीन के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी भारत के लिए चिंता का विषय है। नेपाल पिछले बारह सालों में कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के सहयोग और हस्तक्षेप का गवाह रहा है। नेपाल के कई राजनीतिक दलों ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से अनुदान लिए। राजनीतिक दलों से संबंध रखने वाले स्वयंसेवी संगठनों ने भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से वित्तीय सहायता हासिल की। ओली ने इन अनुदानों पर नियंत्रण के संकेत दिए हैं। पूर्ण बहुमत से नेपाल की सत्ता में आए ओली भारत से अच्छे संबंधों की बात तो कर रहे हैं, लेकिन उनके तमाम आश्वासनों के बावजूद भारत की चिंता कम नहीं हुई है। नेपाल अब चीन ही नहीं, पाकिस्तान से भी नजदीकी बढ़ाने को इच्छुक है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खान अब्बासी ने हाल ही में नेपाल की यात्रा की। दूसरी तरफ चीन में शी जिनपिंग के और मजबूत होने के बाद नेपाल में और आक्रामक आर्थिक विस्तार के संकेत चीनी कंपनियों की तरफ से हैं।

यह सच्चाई है कि माओ त्से तुंग की नेपाल नीति और जिनपिंग की नेपाल नीति में काफी फर्क है। माओ त्से तुंग ने नेपाली नेताओं को साफ कहा था कि नेपाल हिमालय के दक्षिण में है, इसलिए नेपाल के हित में उचित यही होगा कि वह भारत से अपने संबंध मधुर रखे। लेकिन आज नेपाल और चीन के बीच हिमालय कोई रणनीतिक बाधा नहीं है। अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल युग की तकनीकी क्रांति ने हिमालयी बाधा दूर कर दी है। चीन आधुनिक तकनीक की बदौलत हिमालय पार करने की क्षमता रखता है। उसने पूरे एशिया में पहाड़ों और नदियों की बाधाओं को कई जगह खत्म किया है। इसी के बल पर उसने अपने आर्थिक विस्तार को अंजाम दिया है।

जिस समय माओ त्से तुंग ने नेपाली नेताओं को भारत से संबंध अच्छे रखने को कहा था उस समय की वैश्विक राजनीतिक अलग थी। उस समय चीन तिब्बत में अपनी पकड़ मजबूत करने में लगा था। आज जिनपिंग के समय, तिब्बत में चीन के पैर पूरी तरह से जम चुके हैं। ऐसे में तिब्बत की तमाम बाधाओं को पार कर नेपाल तक पहुंचना चीन का लक्ष्य है। 2002 में ल्हासा तक रेललाइन पहुंचा कर चीन ने सारी प्राकृतिक बाधाओं को खत्म कर दिया। 2006 में भूटान के उत्तर में सिगात्शे तक चीन की रेल पहुंच गई। अब 2020 तक काठमांडो के उत्तर में नेपाल सीमा तक चीनी रेल पहुंच जाएगी। भारत की चिंता ओली की गतिविधियों के कारण बढ़ी है। चीन-नेपाल रेलवे नेटवर्क को लेकर ओली काफी गंभीर हैं। उन्होंने चुनाव जीतने के तुरंत बाद नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुआगढ़ी का दौरा किया। इसी जगह से प्रस्तावित तिब्बत-नेपाल रेल लाइन को गुजरना है। वैसे तो ओली की रसुआगढ़ी यात्रा प्रतीकात्मक थी। पर यह यात्रा भारत के लिए एक संदेश थी। बात यहीं तक नहीं रुकी। चीनी रेलवे का विशेषज्ञ दल भी उसी समय नेपाल पहुंचा। तेईस सदस्यों वाले विशेषज्ञ दल ने तिब्बत-नेपाल रेलवे परियोजना का तकनीकी अध्धयन किया। टीम लुंबिनी तक पहुंची। यह भारत के लिए निश्चित तौर पर चिंता की बात है। नेपाल-चीन की बढ़ती नजदीकी में कहीं न कहीं नेपाली जनता का भी भरोसा है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि 2015-16 में नेपाल सीमा पर हुई नाकेबंदी के कारण नेपाली जनता की परेशानियां बढ़ीं। इस घटना ने नेपाल को चीन से नजदीकी बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। नेपाली जनता के बीच भारत- विरोधी दलों ने प्रचार किया कि भविष्य में भारत फिर से नाकेबंदी करवा सकता है। इसलिए विकल्प के तौर पर चीन से व्यापार बढ़ाया जाए।

भारत-नेपाल सीमा पर दो बार तनाव हुआ। दो बार नाकेबंदी की घटना हुई। 1988-89 में नेपाल की नाकेबंदी हुई थी। दुबारा नाकेबंदी 2015-16 में हुई। इस बार की नाकेबंदी के कारण नेपाल खासी मुसीबत में था। क्योंकि समय के साथ नेपाल की जरूरतें बढ़ी थीं। मसलन, एलपीजी का इस्तेमाल 1989 के मुकाबले 2015 में काफी ज्यादा हो रहा था। 2015-16 की नाकेबंदी से नेपाल का हर तबका परेशान हुआ। नेपाल में हुए चुनाव के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ने नाकेबंदी को लेकर जनता के बीच जबर्दस्त प्रचार किया और भारत को खलनायक के तौर पर पेश किया। इस प्रचार का सबसे ज्यादा लाभ केपी शर्मा ओली को हुआ। उनकी पार्टी को खासी सीटें मिलीं। अब ओली प्रधानमंत्री हैं। वे भारत से बराबरी के स्तर पर संबंधों को निर्धारित करना चाहते हैं। यही कारण है कि वे लगातार चीन से आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की वकालत कर रहे हैं। भारत ने यथार्थ को पहचाना है। नेपाल की घरेलू राजनीति पर भारत की पूरी नजर है। इस समय नेपाल में न्यायपालिका और सरकार के बीच तनाव है। सरकार न्यायपालिका को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रही है। ओली ने खुफिया विभाग अपने नियंत्रण में कर लिया है। स्वयंसेवी संगठनों पर लगाम लगाई जा रही है। लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन की ‘शार्प पॉलिसी’ (तीखी नीति) है। शार्प पॉलिसी के तहत चीन दुनिया के कई मुल्कों में राजनीतिक दलों और नेताओं को भ्रष्ट कर रहा है। कई मुल्कों में बुद्धिजीवियों और संस्थाओं को धन मुहैया करवा रहा है। नेपाल में भी चीन यही कर रहा है। उसकी शार्प पॉलिसी के शिकार आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और पाकिस्तान जैसे देश हो चुके हैं। पाकिस्तान में प्रमुख विपक्षी दलों का आरोप है कि यहां चीन ने कई परियोजनाओं की मंजूरी पाने के लिए नेताओं को भ्रष्ट किया। चीनी दबाव में पाकिस्तान सरकार ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का मास्टर प्लॉन बनाया। इस मास्टर प्लॉन में चीन को खेतीयोग्य भूमि भी उपलब्ध कराने की बात की गई है, जिसका विरोध पाकिस्तान में हो रहा है। चीन ने मालदीव में भी यही नीति अपनाई। मालदीव में संसद ने कानून बदल कर चीनी कंपनियों को जमीन खरीदने की अनुमति दी। भविष्य में नेपाल के अंदर भी चीन यही करेगा।

ओली की भारत-विरोधी रणनीति साफ दिख रही है। उन्होंने सत्ता में आने के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद खान अब्बासी को निमंत्रित किया। मार्च के पहले सप्ताह में अब्बासी नेपाल पहुंचे। भारत के लिए यही संकेत काफी है। पाकिस्तान की मंशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी पाकिस्तान को लगातार खल रही है। पाकिस्तान नेपाल में अपनी मौजूदगी दिखा कर भारत को चिंता में डालना चाहता है। वैसे भी नेपाल में आईएसआई की गतिविधियां लंबे समय से हैं। भारत ने लगातार इस पर चिंता व्यक्त की है। अलबत्ता वर्तमान सरकार की नेपाल नीति की आलोचना विपक्षी दल लगातार कर रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार नेपाल के मामले में विपक्षी दलों को विश्वास में नहीं ले रही है। वर्तमान परिस्थितियों में नेपाल से संबंधित कूटनीति में विपक्षी दलों को विश्वास में लेना जरूरी है। इस समय नेपाल में वामपंथी सरकार है। भारत और नेपाल के आपसी भरोसे में जो कमी आई है, उसकी भरपाई करने के लिए भारत के वामपंथी दलों से सहयोग लेने में कोई हर्ज नहीं है।

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