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चौपाल: चिंता का विषय

आज इस खाई का निरंतर चौड़ी होते जाना चिंता का विषय है और अब तो यह एक हैरान कर देने वाली हकीकत हो गया है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि हम किस मुंह से अपने महान लोकतंत्र की दुहाई देते हैं? कुछ दिन पहले मोदीजी ने किसी भाषण में हमेशा की तरह अपनी पार्टी की छवि को उज्ज्वल दर्शाते हुए कहा था कि ‘भाजपा की रग-रग में लोकतंत्र है।

Author February 27, 2018 2:51 AM
ऊंचे रसूख वाले हीरा कारोबारी नीरव मोदी द्वारा पंजाब नेशनल बैंक के साथ 11400 करोड़ से भी अधिक की धोखाधड़ी ने बैंकों के सार्वजनिक स्वामित्व पर फिर से सवाल उठा दिया है।

‘गरीब है वो इसलिए कि तुम अमीर हो गए कि एक बादशाह हुआ तो सौ फकीर हो गए।’ किसी शायर के ये बोल इन दिनों बड़े प्रासंगिक लग रहे हैं जबकि हजारों करोड़ रुपयों के बैंक-घोटालों की खबरें देश की फिजां में गूंज रही हैं। सोशल मीडिया में घोटालों की कहानियां छाई हुई हैं और इन कहानियों के पात्र नायक और महानायक होकर समय के कैनवास पर उभरे हैं। आर्थिक अभावों में जैसे-तैसे जिंदगी बसर कर रही देश की बड़ी आबादी और कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों की छोटी और आम खबरों के बीच ये खबरें वैसे भी बड़ी और खास कही जा सकती हैं।

अमीर और गरीब के बीच एक बड़ा फासला हमारे समाज का कटु सत्य रहा है। आज इस खाई का निरंतर चौड़ी होते जाना चिंता का विषय है और अब तो यह एक हैरान कर देने वाली हकीकत हो गया है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि हम किस मुंह से अपने महान लोकतंत्र की दुहाई देते हैं? कुछ दिन पहले मोदीजी ने किसी भाषण में हमेशा की तरह अपनी पार्टी की छवि को उज्ज्वल दर्शाते हुए कहा था कि ‘भाजपा की रग-रग में लोकतंत्र है।’ पर अभी एक के बाद एक सामने आ रहे घोटालों की सनसनीखेज खबरों के बीच प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य पर सोच सहसा अटक-सी जाती है।

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महात्मा गांधी ने आखिरी कतार में खड़े व्यक्ति की खुशी को देश की खुशहाली मापने का पैमाना कहा था। लेकिन आज देखें तो स्थिति विपरीत है। आज पहली कतार सबसे अहम हो गई है। ये सब नायक और महानायक इस पहली कतार के ही लोग हैं जिनकी भूख और लालसा का कोई ओर-छोर नहीं है। आम व्यक्ति की श्रम से अर्जित धनराशि को, जिस पर वह टैक्स भी देता है और जिसे बैंक में जमा करके वह निश्चिंत-सा हो जाता है, आखिर कौन चुपके-से इन धन्नासेठों के नाम लिख देता है! देश में आर्थिक विषमता बढ़ाने के लिए ऐसे ही लोग उत्तरदायी हैं जो इस कुकृत्य में भागीदार हैं। इन्हें कठघरे में लाकर खड़ा करना जरूरी है, अन्यथा हमारे सामाजिक समानता के संवैधानिक मूल्य धराशायी हो जाएंगे।
’शोभना विज, पटियाला

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