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चौपाल: स्त्री के प्रति

आज भी देश के किसी न किसी भाग से हर दिन महिला उत्पीड़न की खबरें आ ही जाती हैं। ऐसे में क्या हर साल आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाकर महिला संगोष्ठी और सेमिनार का आयोजित मात्र करके महिलाओं पर ओजस्वी भाषण देकर हम स्त्री के प्रति पुरुष की सदियों पुरानी मानसिकता में बदलाव ला सकते हैं? नहीं।

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हम भारतीयों की खासियत है कि या तो किसी चीज को स्वीकारते नहीं हैं और स्वीकारते हैं तो अतिरंजना की हद तक जाकर उसे इंसान से उठा कर भगवान ही बना देते हैं। किसी को नकारते हैं तो उसे जमींदोज कर देते हैं और स्वीकारते हैं तो माथे पर बैठा लेते हैं। यह विरोधाभास ही भारत में महिला सशक्तिकरण के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा है। शास्त्रों में नारी को ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ कह कर भगवान के बराबर बताया और उसे शक्ति, धन और ज्ञान की देवी का प्रतीक मान कर दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पूजा गया। दूसरी तरफ व्यवहार की वास्तविकता यह रही कि उसे सदियों तक पर्दे या चारदिवारी के पीछे रख कर अबला मानकर उसके साहस, धैर्य और सामर्थ्य को न सिर्फ नजरअंदाज किया गया बल्कि उसे भोग्या और प्रदर्शन की वस्तु या एक हृदयहीन प्राणी मानकर कठपुतली की तरह उंगली पर नचाया गया। कभी उसे सीता बना कर अग्नि में जलाया गया तो कभी द्रोपदी बना कर भरी सभा में उसका चीरहरण किया गया। कभी उसे सती प्रथा के नाम पर बेमौत मारा गया तो कभी विधवा प्रथा के नाम पर पति की मृत्यु पर सामाजिक सुख से वंचित किया गया। कभी दहेज के नाम पर सताया गया तो कभी विज्ञापन में उसकी देह का बेजा इस्तेमाल किया गया।

आज भी देश के किसी न किसी भाग से हर दिन महिला उत्पीड़न की खबरें आ ही जाती हैं। ऐसे में क्या हर साल आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाकर महिला संगोष्ठी और सेमिनार का आयोजित मात्र करके महिलाओं पर ओजस्वी भाषण देकर हम स्त्री के प्रति पुरुष की सदियों पुरानी मानसिकता में बदलाव ला सकते हैं? नहीं। सिर्फ साल में एक दिन देश की आधी आबादी के गुणों का गान करके शेष 364 दिन उसे पुरुष प्रधान समाज के नजरिए से देखते हुए हम उसके साथ कभी न्याय नहीं कर पाएंगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाएं या न मनाएं, नारी को देवी मानकर भले ही न पूजें लेकिन व्यवहार में उसे हर दिन हर पल हर जगह बराबरी का दर्जा प्रदान किए बिना हम समाज और परिवार की गाड़ी को ठीक तरह से नहीं चला सकते। हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। केवल भाषण में स्त्री को देवी कहने से काम नहीं चलेग बल्कि अंतस में इस बात को बैठाना होगा कि स्त्री पुरुष से अधिक धैर्यवान है। परिवार में पिता यदि आकाश की तरह ऊंचाई और छत्रछाया का प्रतीक है तो माता धरती की तरह धैर्य, सहनशीलता और गहराई की पर्याय और परिवार की धुरी है। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों में से किसी भी एक के बिना संसार की कल्पना संभव नहीं है।

आज तो अंतरिक्ष में ऊंची उड़ान भरने से लेकर सेना की कमांन संभाल कर और जोखिम से लेकर उच्च पदों तक आसीन होकर भारत की नारी ने अपनी सामर्थ्य को साबित करते हुए बता दिया है कि वह कोख में नौ माह तक अपने शिशु को धारण करते हुए सांसारिक दायित्व का निर्वाह ही नहीं कर सकती बल्कि जरूरत पड़ने पर पीठ पर अपने कलेजे के टुकड़े को बांध रण में तलवार भी चला सकती है। देश-दुनिया का ऐसा कोई काम नहीं जो एक महिला के लिए संभव न हो। इसलिए बदलते दौर में हम बदलाव की नई इबारत लिखना चाहते हैं तो सबसे पहले पुरुषों को स्त्रियों के प्रति अपने पारंपरिक सोच में बदलाव लाते हुए यह स्वीकारना होगा परिवार में महिला का स्थान पुरुष से किसी भी तरह कमतर नहीं है। बल्कि कई मामलों में तो वह पुरुष से भी आगे है।
’देवेंद्र जोशी, उज्जैन

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