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चौपाल : आस्था का कारोबार

सत्ता से सांठगांठ कर जमीन पर अवैध कब्जे कर बड़े-बड़े आलीशान आश्रम बनाना, परमेश्वर, प्रलय, ग्रह-नक्षत्र और शैतान के नाम पर भोली-भाली जनता को डरा धमका कर लूटना, माता-बहनों को अपने जाल में फंसा कर उनका शोषण करना इन तथाकथित संतों का शगल बन गया है।

Author June 15, 2018 3:58 AM
भयूजी महाराज और दाती महाराज।

किसी संत कहे जाने वाले व्यक्ति पर अपनी शिष्या के बलात्कार का आरोप लगता है और दूसरे संत को किन्हीं वजहों से खुद को गोली मार कर आत्महत्या करनी पड़ती है। प्रश्न उठना लाजिमी है कि जनता को शांति और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले संत-महात्माओं के जीवन में इतनी अशांति क्यों है! इससे पहले आसाराम और राम रहीम जैसे कथित संत अपनी आपराधिक करतूतों के कारण जेल की सलाखों के पीछे हैं। लगता है साधुता और संतत्व वह नहीं है, जो माना जाता रहा है। साधु संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है- सज्जन व्यक्ति। लघु सिद्धांत कौमुदी के अनुसार, ‘साध्नोति परकार्यमिति’ अर्थात् जो दूसरों का कार्य कर दे, वह साधु है। श्रीमद्भगवतगीता के अनुसार संत की चार विशेषताएं बताई गई हैं- त्याग, संयम, वैराग्य और उपरामता, यानी ऐसी वृत्ति जो किसी तरह की विषय वासना की तरफ न जाती हो। यानी राग प्रवृत्ति का स्वत: अभाव होना।

लेकिन देखने में आ रहा है कि मूल्यों के पतन का जो दौर समाज में शुरू हुआ है, उससे संत समाज भी अछूता नहीं रह सका। यही वजह है कि समाज को तत्त्व ज्ञान का संदेश और मोक्ष तथा शांति का मार्ग दिखाने वाले साधु, संत, कथावाचक जनता को भ्रमित कर भ्रष्ट कमाई से अपनी अकूत सम्पदा खड़ी करने के पर्याय बन कर रह गए हैं। सत्ता से सांठगांठ कर जमीन पर अवैध कब्जे कर बड़े-बड़े आलीशान आश्रम बनाना, परमेश्वर, प्रलय, ग्रह-नक्षत्र और शैतान के नाम पर भोली-भाली जनता को डरा धमका कर लूटना, माता-बहनों को अपने जाल में फंसा कर उनका शोषण करना इन तथाकथित संतों का शगल बन गया है।

इस सबके लिए ये तो दोषी हैं ही, जनता भी इसके लिए कम दोषी नहीं है। लोगों ने इनको माथे पर बिठा कर इतना ऊंचा बना दिया है कि ये खुद को भगवान मानने लगे हैं। ऐसी अंधभक्ति किसी के भी प्रति ठीक नहीं है। आज व्यक्ति अपने कर्मों और भौतिकता की अंधी दौड़ के कारण इतना दुखी है कि उसे समझ नहीं आता है कि आखिर जाएं तो किधर। इसी कमजोरी का लाभ उठा कर ये तथाकथित धर्माचार्य आस्था की मंडी में उतर आए और धर्म का व्यापार करने लगे। साधु-संतों के इस भ्रष्ट कारोबार की असली वजह अंधभक्ति और अंधविश्वास है। इसने इन संतों को हैवान और शैतान बना दिया है। जितनी जल्दी हो सके इस अंधविश्वास की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। सरकार को भी सख्त कानून बना कर धर्म की आड़ में जनता को भ्रमित कर समाज को पथभ्रष्ट करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना चाहिए।

’देवेंद्र जोशी, उज्जैन

दिखावे के नारे
सच्ची देशभक्ति की अभिव्यक्ति के लिए सामाजिक समरसता और एकता दर्शाने की जरूरत है, न कि केवल जोर-जोर से लगाए जाने वाले नारे। राष्ट्रीय दिवसों पर देशभक्ति के नारे लोगों के मन में अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव उत्पन करते हैं। लेकिन आज नारों का सहारा लेकर जबर्दस्ती देशभक्ति का प्रमाण मांगा जा रहा है। एक विचारधारा से सहमति न रखने पर देश विरोधी होने का तमगा बांटा जा रहा है। जिस तरह से धार्मिक जुलूसों में देशभक्ति के नारों और तिरंगा लहराने का चलन बढ़ा है, वह चिंतित करने वाला है। नारों का इस्तेमाल सांप्रदायिक तनाव उत्पन करने के लिए हो रहा है। एक भारतीय को भारतीयता इस भूमि पर जन्म लेने से ही मिल जाती है और इसे प्रमाणित करने के लिए कोई दिखावा करने की जरूरत नहीं है। यह देश हम सबका है।
’गौरव कुमार ‘निशांत’, वाराणसी

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