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बेबाक बोल: समय का सितारा

लोक के तंत्र में परलोक की राजनीति करने वालों को चुनौती मिली अरब सागर के तट पर बसे तमिलनाडु से। एम करुणानिधि ने द्रविड़ राजनीति के गढ़ में राज्य चलाने के लिए साहस के साथ भगवान के बरक्स संविधान को चुना। जन्म आधारित वर्णव्यवस्था के कटु आलोचक करुणानिधि एक समय में उस तरह की आधुनिक सकारात्मक राजनीति के प्रतीक बने जिसका लक्ष्य मनुष्य के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व हासिल करना है। कमजोर तबके को सम्मान के साथ केंद्र में लाने की कोशिश हो या लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ शासन चलाना, भारतीय राजनीति और समाज में इनके उठाए कदम मील का पत्थर साबित हुए। समाज और राजनीति में नया गढ़ने के लिए पुराने का विध्वंस करना होता है। पुराने को लेकर अतीतव्यामोही होकर आप नए को न्याय नहीं दिला सकते हैं। समतावेशी समाज के लिए नया रचने वाले करुणानिधि भी भारतीय राजनीति के विरोधाभासों और विडंबनाओं के शिकार हुए। महज एक राजनेता से आगे जाकर विचारक, लेखक, समाज सुधारक की ऐतिहासिक भूमिका के जरिए वे अपना इतिहास रचते हैं। अपने समय के चमकते सितारे को बेबाक बोल में श्रद्धांजलि।

डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि। (फाइल फोटो)

राज्य का शासन भगवान नहीं संविधान के अनुसार चलेगा। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आधुनिक मूल्यों पर चलने के लिए जन्म और वर्ण आधारित प्रभुत्व को खत्म करना होगा। हाशिए पर पड़े तबके को समाज और राजनीति के केंद्र में लाने वाले भारतीय राजनीति के सबसे बड़े पटकथाकार हैं मुथुवेल करुणानिधि। उनकी पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) के झंडे का रंग आधा काला और आधा लाल है। उत्तर भारतीय परंपरा और संस्कृति में काले रंग की प्रतिरोध के स्वर में ही पहचान है। लेकिन जब करुणानिधि की बात करेंगे तो भारतीय राजनीति में यह उत्तर और दक्षिण का फर्क सामने आएगा। राजनीति में प्रतिरोध और संघर्ष का फर्क सामने आएगा। साथ ही यह समानता भी दिखेगी कि आंदोलन की कोख से उपजी राजनीतिक पार्टी सत्ता का प्रतीक बनने के बाद जोड़-तोड़ के साधारण समीकरण में ही उलझ जाती है। तार्किकता और बौद्धिकता का प्रतीक अपने खानदानी लाभार्थियों के बीच उलझ कर रह गया।

कभी किसी डीएमके कार्यकर्ता ने पार्टी के काले और लाल रंग के संगम का अपनी तरह से अर्थ समझाया था। उसने कहा कि जब हम अपने हकों की मांग करते थे, गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठाते थे, हिंदी के अक्षरों पर कालिख पोत देते थे तो हमारे प्रतिरोध के काले के जवाब में हमारे सिर से लाल खून गिरता था। प्रतिरोध का काला और प्रभुत्व का दिया लाल खून ही तो वह बदलाव लाया जो तमिलनाडु और करुणानिधि की राजनीति को हिंदुस्तान के नक्शे पर अलग करता है। आज जब पूरे देश में मंडल आयोग के ढाई दशक के दौर पर बहस कार्यक्रमों का सिलसिला जारी है तो आरक्षण के इतिहास में सबसे बड़े नायक तो करुणानिधि ही सामने आते हैं। द्रविड़ आंदोलन से जुड़े करुणानिधि वैचारिक स्तर पर गुरु अन्नादुरै और पेरियार से आगे बढ़ जाते हैं। वे नास्तिकता और ब्राह्मणवाद के विरोध से आगे बढ़कर जनवादी विचारधारा के करीब पहुंचते हैं, जो उनके शुरुआती निजी जीवन में भी दिखता है। बौद्धिकता और प्रगतिशीलता के साथ ही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी तमिल भाषा पर जबर्दस्त पकड़। शास्त्रीय तमिल से लेकर जनता के बीच बोली जाने वाली तमिल दोनों पर उनकी पकड़ थी। जब वे कोई शास्त्रीय लेखन करते, फिल्मों, धारावाहिकों के लिए संवाद लिखते या फिर जनसभा में कमजोर तबके की जनता को संबोधित करते, भाषा का फर्क महसूस किया जा सकता था। मीडिया वालों को लगता था कि यह कैसी तमिल है और आम जनता आंसू बहाते और ताली बजाते हुए कहती कि यही तो हमारा नेता है, यही तो हमारी तमिल है। जनता से जनता की भाषा में बात करना, जनता का दर्द अपनी भाषा में उतार देना यही वह गुण है जो उन्हें जननायक बनाता है।

करुणानिधि जब नास्तिकता पर बात करते तो वह सामने वाले को अपने अर्जित ज्ञान से प्रभावित करने में कामयाब होते थे। लोक के तंत्र में परलोक को नकारने का साहस दिखाते थे। अगर वो वाल्मीकि रामायण की आलोचना करते और उसे आर्य और द्रविड़ों के बीच संघर्ष की कहानी करार देते तो उसके पूरे श्लोकों और उद्धरण के साथ समसामयिकता से जोड़ते हुए ऐसा करते थे। वे अपनी बौद्धिकता के साथ जनता को जोड़ते थे, उसे खारिज नहीं करते थे। सामाजिक न्याय को लेकर लिखे उनके फिल्मी संवाद पर सिनेमा हॉल में तालियां और सीटियां बजती थीं और उन संवादों को बोलने वाले नायक के विशालकाय कटआउट की भगवान की तरह पूजा होती थी। यह बौद्धिक राजनीतिज्ञ साठ साल के राजनीतिक जीवन में पांच बार मुख्यमंत्री बना। सरकार बनाने की उनकी राजनीतिक कुशलता की तूती दिल्ली तक बोलती थी। इसी रणनीति के तहत उन्होंने राष्ट्रीय दलों को तमिलनाडु की हदबंदी से बाहर रखा। साझा मोर्चा सरकार बनाने का गुरुमंत्र देकर दिल्ली के गलियारों में भी सत्ता के गुरु बने। इसे राजनीतिक कुशलता कहिए या लोकलुभावन चाणक्य नीति का नाम दीजिए, लेकिन दिल्ली से लेकर तमिलनाडु तक जहां सत्ता थी, वहां करुणानिधि थे। द्रविड़ आंदोलन के बाद देशव्यापी स्तर पर बहुजन राजनीति को स्थापित करने वाले करुणानिधि ही हैं। शक्तिशाली ब्राह्मणवादी सत्ता के खिलाफ संगठित राजनीतिक संघर्ष तो दक्षिण भारत से करुणानिधि ने ही शुरू किया। वे आर्य बनाम अनार्य की बहस में द्रविड़ अस्मिता और बहुजन का गठजोड़ कर सत्ता हासिल करने वाले और कमजोर तबके की जनता को ताकत दिलाने वाले भारत के पहले राजनीतिक गुरु हैं। अपनी पहली ही सरकार में उन्होंने पंद्रह एकड़ तक जमीन की हदबंदी करने का साहस दिखाया। एक ऐसी जमीन तैयार की कि भारत जैसे देश के एक हिस्से में आरक्षण की सीमा 69 फीसद तक पहुंच गई। करुणानिधि ने दक्षिण में राजनीति के जरिए सामाजिक सुधार के जितने काम किए वह उत्तर भारत में कभी भी जमीनी हकीकत नहीं बन पाया। तमिलनाडु में लिखे गए ओबीसी राजनीति के इस पाठ को ही पढ़ उत्तर भारत में कई नेताओं ने बहुजन की राजनीति शुरू की और अपने समय के नायक बने।

इतने सारे प्रगतिशील कदमों के बावजूद करुणानिधि एक बिंदु पर उत्तर भारतीय बहुजन नेताओं जैसा ही व्यवहार कर बैठे थे। स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 31 फीसद आरक्षण का हक दिलवाने वाले करुणानिधि जे जयललिता की जीत को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाए। जयललिता और उनकी राजनीतिक दुश्मनी का हर कोई अपने तरह से विश्लेषण कर सकता है, लेकिन जब सामाजिक न्याय के पुरोधा और बहुजनवादी तथाकथित संभ्रात और उच्च तबके की महिलाओं को देश की संसद में ‘परकटी’ कहते हैं तो यह नफरत हम दक्षिण में करुणानिधि में भी महसूस कर सकते हैं। करुणानिधि और जयललिता की दुश्मनी ऊपरी नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं के बीच जिस निचले स्तर तक पहुंची, वह बौद्धिकता और तार्किकता की राजनीति में एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है। पेरियार के क्रांतिकारी शिष्य अंतिम समय में यह भी सबक दे जाते हैं कि महज बेटे का नाम स्टालिन रख देने से आप जनवादी नहीं हो जाते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के सामाजिक न्याय के नायकों की तरह ही दक्षिण के यह महानायक अपने परिवार के मोह से बाहर नहीं निकल पाया। उत्तर भारत की तरह ही इनके बाद इनकी क्रांति की मशाल ढोने के उपयुक्त पात्र उनके पुत्र ही हैं। सामाजिक न्याय के इस महानायक का कद अपने परिवार के अंदर जाकर थोड़ा छोटा हो जाता है और परिवारवाद बड़ा हो जाता है। द्रविड़ आंदोलन से जुड़े नेता का वही भ्रष्टाचार के आरोपों वाला अंत।

आंदोलनकारी करुणानिधि का कुनबा निजी संपत्ति के लिए जाना जाने लगा। टूजी से लेकर शराब माफिया तक के दाग लगे। ये भी क्षेत्रीय दलों के वैसे चाणक्य साबित हुए जिसका साध्य सिर्फ सत्ता था, वह कांग्रेस के साथ जाकर मिले या फिर किसी और दल के साथ जाकर।भारतीय राजनीति के फलक पर उनके जैसा कद्दावर सदियों में एक बार आता है। राजनीतिक और सामाजिक इतिहास के पन्नों पर करुणानिधि आज अपना मजबूत अध्याय छोड़ गए हैं। उन्होंने जिन मानवीय मूल्यों को जिया, आज उन मूल्यों पर भी राजनीति नामुमकिन सी दिख रही है। तमिलनाडु में समतावादी विचारों की अगुआई कर करुणानिधि ने कमजोर तबकों को जो केंद्रीय ताकत दिलाई वह इतिहास में उनका पलड़ा हमेशा मजबूत रखेगा।

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