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खुद के खिलाफ

राहुल गांधी को खुद के अंदर के विपक्ष को अनसुना नहीं करना चाहिए। यह वक्त है सड़े हुए ढांचे में विस्फोट कर खुद के खिलाफ खड़े होने का। राहुल खुद तो पद छोड़ें ही साथ ही उन्हें भी छोड़ने के लिए मजबूर करें जो गांधी-नेहरू परिवार के नाम पर सिर्फ अपना ही परिवार देख रहे थे। आज पूरे हिंदुस्तान की जमीन राहुल गांधी की कर्मभूमि है। दरबारी राग से निकल कर जनता के दिलों की आग में झुलसेंगे तो खरा सोना बनकर निकलेंगे। यह वक्त है जब आप खुद के खिलाफ जाकर खुद को पाएं। कांग्रेस और राहुल के इस करो या मरो वाले समय पर बेबाक बोल।

राहुल गांधी कह रहे हैं कि एक महीने के अंदर उनका विकल्प चुन लिया जाए।

अब तक तो सब कुछ पूर्व अनुमानित लकीर के फकीर जैसा ही होता दिख रहा है। राज्यों में कांग्रेस हारती है, वहां के कर्ताधर्ता इस्तीफा देते हैं, जो नामंजूर होता है। 2014 में सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की थी जो मंजूर नहीं हुई थी। अब लोकसभा चुनाव में औंधे मुंह गिरने के बाद कर्णधारों की तरफ से इस्तीफों की बाढ़ तो आ गई है, लेकिन अभी तक किसी के कंधे से तमगा उतारा नहीं गया है।

सोनिया गांधी पर दरबारी कांग्रेसियों से घिरे रहने के आरोप लगते थे। लेकिन यह आरोप तब सच साबित हुआ जब हार के बाद राहुल गांधी ने अपनी पीड़ा जताई। कांग्रेस के संविधान के अनुसार अध्यक्ष फैसलों के लिए सर्वोपरि है। इसके बावजूद टिकट बंटवारे में राहुल गांधी के हाथ बंधे रहे। उन्होंने साफ-साफ कहा कि मैंने मुख्यमंत्रियों के बेटों को टिकट देने का विरोध किया तो मेरा विरोध शुरू हुआ। हालात ऐसे हैं कि जिन लोगों पर राहुल गांधी ने साफ-साफ इशारा किया, अभी तक उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा है। इसके उलट वे लोग राहुल को इस्तीफा नहीं देने के लिए मना रहे हैं।
राहुल की मुश्किल यह है कि वे उस दाग पर सवाल उठा रहे हैं, जो उनके दामन पर भी लगा है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि दिग्गज नेताओं ने अपनी पूरी ऊर्जा अपने वारिसों को जिताने में लगाई और पार्टी की लुटिया डुबो दी। तो क्या आज राहुल के पास यह नैतिक बल नहीं है कि वे उन मुख्यमंत्रियों को निकाल-बाहर करें जो पूरा चुनाव सिर्फ अपने वारिसों के लिए लड़ते रहे।

राहुल गांधी कह रहे हैं कि एक महीने के अंदर उनका विकल्प चुन लिया जाए। राहुल को अपने इस रुख पर पूरी तरह कायम रहना चाहिए। इसके साथ ही एक महीने में उन्हें यह व्यवस्था करनी चाहिए कि चमचों को हाशिए पर कर दें। आम कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को अधिकार दिया जाए कि नेहरू-गांधी परिवार से इतर अपना अध्यक्ष चुने। राहुल अगर कांग्रेस को इतिहास की किताब में खत्म अध्याय होने से बचाना चाहते हैं तो उन्हें खुद वारिसी कुर्सी को खाली कर जमीन पर आना होगा। राहुल वंश-बेल की ही उपज हैं इसलिए उन्हें दूसरों को जवाब देने में समस्या आ रही है। ढर्रे को बदलने के लिए उन्हें खुद बदलना होगा। राहुल गांधी के लिए इससे बेहतर समय कुछ और नहीं हो सकता है। आपको जिस जनता की रहनुमाई करनी है उसके बीच जाइए। वह जनता ही आपको सिखाएगी-पढ़ाएगी और अपना नेता बनाएगी। यह दरबार से दूर होकर जनता का राग समझने का वक्त है।

महज यह कहकर कि वंशवाद सारे दलों में है, राहुल को खुद को माफ नहीं करना चाहिए। कांग्रेस पार्टी का इतिहास आधुनिक भारत के इतिहास के साथ शुरू होता है। इस पार्टी की नींव में आजाद भारत की बुनियाद भी है। कांग्रेस का इतिहास जब समृद्ध और अलग है तो फिर उसके अगुआ को आज भेड़चाल का हिस्सा क्यों बनना चाहिए कि यह कहां नहीं है। प्रजातंत्र में प्रतीकों का अपना महत्त्व है। राजीव गांधी की हत्या के बाद पूरी कांग्रेस सोनिया गांधी पर निर्भर हो गई थी। वे खुद सक्रिय राजनीति में आने की इच्छुक नहीं थीं लेकिन उन्होंने ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाते हुए एक गृहणी का चोला उतार सार्वजनिक नेता का बाना पहना। कांग्रेस को फिर से पांवों पर खड़ा कर उस हाल तक लार्इं कि वे प्रधानमंत्री हो सकती थीं। विदेशी मूल के मसले पर हंगामा होते ही उन्होंने अपने कदम पीछे कर लिए। विदेशी मूल का मुद्दा एक भावनात्मक मुद्दा था जिसकी गहराई को सोनिया गांधी समझ रही थीं। उस वक्त बहुत से चाटुकारों ने सोनिया गांधी को कहा होगा कि यह मौका गंवाना नहीं चाहिए, आपको प्रधानमंत्री बनना चाहिए। पर, सोनिया ने दरबारियों की बात न मान जनमानस का ख्याल रखते हुए इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया। सोनिया ने जनता के बीच रहने के लिए ही जनादेश को एक नया अर्थ दिया था। लेकिन 2019 में उनकी बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा अपनी मां की इस विरासत को नहीं समझ पाई थीं। जब रॉबर्ट वाड्रा पर भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रवर्तन निदेशालय का शिकंजा कसता गया और उनकी गिरफ्तारी की भी आशंका जताई जाने लगी तभी राहुल गांधी अपनी बहन को पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस महासचिव बना देते हैं। ऐन चुनावों के समय प्रियंका गांधी को आधिकारिक मोहर के साथ उत्तर प्रदेश में उतार दिया गया।

2014 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की आंधी में ही कांग्रेस के पांव उखड़े थे। इसके बावजूद 2019 में प्रियंका गांधी वाड्रा को तुरुप के पत्ते की तरह उतारा जाता है। रॉबर्ट वाड्रा पर अभी आरोप साबित नहीं हुए हैं, लेकिन वे गंभीर हैं। यह वह समय था जब नामदार और कामदार की बहस छिड़ चुकी थी। कांग्रेस अभी तक इसी गुमां में थी कि इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता चेहरा ही जनता को प्रभावित करने के लिए काफी होगा। लेकिन पिछले 70 सालों में राजनीति का पाठ बिल्कुल बदल चुका है और कांग्रेस ने प्रियंका को उतार उसी वंशवाद और भ्रष्टाचार के आरोप को आगे बढ़ाया। प्रियंका गांधी वाड्रा की बेपरवाही का आलम यह था कि कांग्रेस दफ्तर में अपना आधिकारिक पद संभालने के पहले वो मीडिया और गाजेबाजे के साथ अपने पति रॉबर्ट वाड्रा को प्रवर्तन निदेशालय के दफ्तर में पूछताछ के लिए छोड़ने गर्इं। पति का हाथ थाम तस्वीरें खिंचवार्इं। छवि-बोध की लड़ाई में वे भ्रष्टाचार के आरोपी की पत्नी भर थीं। नब्बे के दशक के बाद से क्षेत्रीय दलों के उभारों ने ‘राष्ट्रीय नेता’ के वजूद को खत्म कर दिया था। सीटों का आंकड़ा ही किसी को सिकंदर बना रहा था। लेकिन 2019 ने नागरिकशास्त्र और राजनीतिशास्त्र के पुराने पाठ्यक्रम को बदल दिया है। टिक-टॉक जैसे ऐप से खुद ही स्टार बनी जनता को अब राजा-रानी की कहानी उनके वारिसों की जुबानी सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं रही। आप आज के समय में क्या, क्यों और कैसे हैं उसे इससे मतलब है। यह रियलिटी शो का जमाना है जिसमें आपका अविश्वसनीय संघर्ष ही आपके लिए तालियां बजवाता है।

राहुल गांधी वंशनाम ढोते हुए वंशों के मठाधीशों के चक्रव्यूह में फंस चुके थे और जनता ने इस बार इन मठों को ढहा दिया है। अब राहुल को एक महीने का भी इंतजार नहीं कर तुरंत उसी जनता के बीच जाना चाहिए जिसने उन्हें नकारा है। आप उन किसानों के पास जाइए जिसने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दिल में बिठाया था। उन नौजवानों के पास जाइए जिन्हें आपमें उम्मीद दिखी थी। उन बच्चों की चिताओं के पास जाकर खड़े हो जाइए जो बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जिंदा जल रहे हैं। उन परिवारों के पास जाइए जिनके बच्चे व्यवस्था से निराश होकर जिंदगी की आस तोड़ रहे हैं। राजनीति के मैदान में विपक्ष से ज्यादा बड़ी जमीन किसी के पास नहीं होती। अभी तो पूरा हिंदुस्तान आपकी कर्मभूमि हो सकता है। राहुल को खुद के अंदर के विपक्ष को हारने नहीं देना चाहिए। यह समय है खुद के खिलाफ खड़े होने का। राहुल के सामने अपनी मां की मिसाल है। आगे जीत की उम्मीद रखनी है तो इस हार से सबक लेकर मठाधीशों को बेदखल करें। इन मठों का विध्वंस किए बिना राहुल गांधी के पास पुनर्जन्म का कोई रास्ता नहीं है।

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