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बेबाक बोल : बड़ी बीमारी

दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा सार्वजनिक बस में चढ़ती है। एक पुरुष उसके साथ अश्लीलता की हदें पार कर देता है। खचाखच भरी बस में सभी चुप थे। छात्रा ने अपने कैमरा फोन से क्लिप बना कर इंटरनेट पर डाल दिया। इस वीडियो पर एक चुप्पी थी। हमारे समाज के लिए यह उस छात्रा की निजी समस्या थी और उसके साथ किया गया अपराध एक व्यक्ति का अपराध था। इस वीडियो के बरक्स इंटरनेट पर वायरल होती है एक लड़के को आंख मारती हुई दक्षिण भारतीय अभिनेत्री। दावा है कि गूगल खोज में प्रिया वरीयर ने सनी लियोनी और काइली जेनर को पीछे छोड़ दिया है। आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गैरबराबरियों की चौड़ी खाई वाले देश में इस तरह के वायरल वीडियो का खमियाजा सार्वजनिक बस में बैठी लड़की भुगतती है। जिस व्यक्ति को सही शिक्षा नहीं मिली है उसके हाथ में सस्ता इंटरनेट है। अशिक्षा, गैरबराबरी और इंटरनेट पर अश्लीलता के मेल से जो कुंठा उपज रही है उसे हम एक व्यक्ति की बीमारी मान रहे हैं। इसका इलाज सामाजिक स्तर पर करना होगा। ये कुंठाएं उस पोलियो बीमारी की तरह हैं जिसमें एक बच्चा भी छूटा तो सुरक्षा चक्र टूटा। इसी पर बेबाक बोल।

उस लड़की के पास पुरुष की कुंठा का वीडियो नहीं होता तो मामला भी दर्ज नहीं होता।

आंध्र प्रदेश के एक किसान ने अपने खेत में सनी लियोनी का पोस्टर लगा दिया। किसान का तर्क है कि इस कारण उसकी लहलहाती फसल को लोगों की नजर नहीं लगेगी। उसका कहना है कि पहले लोग उसके खेतों के बगल से गुजरते वक्त फसल को निहारने से नहीं चूकते थे और नजर लग जाती थी। अब लोग सनी लियोनी को देखते हैं और फसल पर नजर नहीं जाती। इसी समय एक लड़के को आंख मार रही दक्षिण भारतीय अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वरीयर इंटरनेट पर लाइक और शेयर के सारे रेकॉर्ड तोड़ डालती है। मीडिया में हर जगह प्रिया ही प्रिया है। भूतो न भविष्यति सरीखी आंख मारती हुई लड़की। रातोंरात हर मोबाइल तक पहुंची प्रिया के मीम राहुल गांधी से लेकर महेंद्र सिंह धोनी तक के साथ बना दिए गए। वह सनी लियोनी, काइली जेनर से ज्यादा गूगल खोज वाली हस्ती हो गई।

एक आदमी फसल को लोगों की आंखों से बचाने के लिए खेत में सनी लियोनी का पोस्टर लगा रहा था। आंख मारती हुई लड़की पर जब देश पिघल रहा था उसी समय देश की राजधानी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा सार्वजनिक बस में चढ़ती है। बस में एक पुरुष उसके साथ अश्लीलता की हद पार कर देता है। भरी बस के सभी लोग चुप हैं। चुप्पी इसलिए कि सार्वजनिक बस में यह उस व्यक्ति और लड़की का निजी मसला है। अब लड़की क्या करती? दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जिन सीसीटीवी कैमरों का वादा किया था वह बस में नहीं था। जिस स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने की सलाह सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार का स्टिंग करने के लिए दी गई थी, लड़की ने उसका इस्तेमाल पूरे राज और समाज का स्टिंग करने के लिए कर दिया। लोगों से भरी बस में अश्लील हरकत करते पुरुष को लड़की ने अपने फोन के कैमरे में कैद किया। उसने इस वीडियो को इंटरनेट पर डाला। प्रिया वरीयर की आंख पर फिदा हुए देश को अचानक से इस वीडियो में कुछ सार्वजनिक सा नहीं लगा। मामला दर्ज करने के लिए उस लड़की को थाने में छह घंटे बिठाया गया। घटना के तीन दिन बाद मामला दर्ज हुआ और पांच से छह दिन के बाद यह खबर अखबारों में जगह पा सकी। आम लोगों की प्रतिक्रिया यही थी कि सार्वजनिक बसों में ऐसा होता ही है। सोचिए जरा, आम लोग इसे लेकर सहज हैं कि ऐसा होता ही है। उस लड़की के पास पुरुष की कुंठा का वीडियो नहीं होता तो मामला भी दर्ज नहीं होता।

ऊपर तीन घटनाओं का जिक्र है, जिनमें एक समानता है। इन सबका आधार है कुंठा। पहली घटना में नजर लगने से बचने के लिए सेक्स प्रतीक बना दिए गए चेहरे का सहारा लिया जाता है। हमारे यहां गांवों, कस्बों, शहरों से लेकर महानगरों तक यह नजर लगने वाला भय दिखता है। आखिर इस नजर लगने का संबंध किस चीज से है। नजर लगने की बुनियाद में है अभाव और उससे जुड़ी हुई कुंठा। बच्चे को नजर लग जाती है, फसल को नजर लग जाती है, संपन्नता को नजर लग जाती है, खास मानकों वाली खूबसूरती को नजर लग जाती है। दूसरे के सुख के प्रति ईर्ष्या भाव यानी जलन ही है नजर। इन सारे उदाहरणों में विषमता, अभाव से उपजी हुई कुंठा ही है। आज इक्कीसवीं सदी में भी स्त्री-पुरुष संबंध को लेकर हमारा समाज अभी पूरी तरह से बंद है जिसमें कई तरह की कुंठाएं हैं। एक तरफ महानगरों में सहजीवन और उन्मुक्त सेक्स की तरफदारी करने वाला तबका है। दूसरी तरफ वो तबका है जिसके लिए आज भी खुल कर प्रेम का इजहार करना एक वर्जना है। वैलेंटाइन डे जो खास तरह के प्रेम से संबंधित है उसे मातृ-पितृ दिवस घोषित करना, पार्क में प्रेमी जोड़ों पर डंडे बरसाना ये भी हमारे समाज के उदाहरण हैं। सोशल मीडिया पर खिलौना भालू और प्रेम से जुड़ी कविताएं और शायरी तो खूब घूमी। पर तस्वीरों के नाम पर पति-पत्नी का ही जोड़ा था। प्रेमी युगलों की हिम्मत नहीं कि वे आज भी खुलेआम सोशल मीडिया पर अपने प्रेम का इजहार कर सकें। और जिन चंद लोगों ने ऐसा किया, उसके परिणाम भी उनकी ‘सामाजिक दीवार’ पर दिखने लगे।

दिल्ली जैसे महानगर में बस हो या मेट्रो या अन्य सार्वजनिक परिवहन के साधन, इनमें हर तबके के लोग यात्रा करते हैं। एक वर्जनाओं से दूर होती खुली सोच वाली छात्रा भी है तो एक ऐसा पुरुष भी है जिसके लिए स्त्री-पुरुष संबंध एक वर्जना के सिवा कुछ नहीं। अपनी शरीर की जरूरत भी उसके लिए वर्जना ही है जिसे वह इस तरह से निकालता है कि सभ्य समाज में उसे अपराध माना जाता है। वह गांव में या अपने छोटे शहर में अपने साथी से दूर है और यहां उसके लिए कुछ नहीं है। विषमता ने ही उसे गांव से भी दूर किया और यही विषमता शहर में उसे एक लड़की के सामने जानवर बना देती है। उसे स्वतंत्र स्त्री के साथ व्यवहार करना सिखाया ही नहीं गया है। शहरों और महानगरों में भी अपने घर की चारदीवारी से निकल कर यही स्त्री-पुरुष संबंध कुंठा और वर्जना के रूप में दिखता है। प्रिया वारियर की आंख मारती तस्वीर के साथ राहुल गांधी का मीम बनाकर प्रसारित करना क्या दर्शाता है। इस समाज में एकल स्त्री और पुरुष के लिए अभी भी न तो कोई जगह है और न कोई सम्मान। राहुल के एकल होने का चुटकुला कुंठित राजनीति की तस्वीर है। हमारा समाज स्त्री और प्रेम को अभी भी सहज और स्वाभाविक रूप में नहीं देख पा रहा है। नजर लगने से परेशान उस किसान की समस्या को उसकी निजी समस्या मान लिया जाएगा। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा के साथ डीटीसी की बस में अश्लीलता करते पुरुष की समस्या को भी इसी तरह देखा जाएगा कि एक पुरुष ने किया। उसका अपराध एक व्यक्ति का अपराध है, इसमें राज और समाज की कोई भूमिका नहीं है। यह उसकी व्यक्तिगत बीमारी है।

इतनी बड़ी बीमारी की समस्या यही है कि इसे निजी मान लिया गया है। अब तक इसकी पहचान (डायग्नोस) एक सामाजिक बीमारी के रूप में नहीं हुई है। हमें इस कुंठित समाज की पहचान करनी ही होगी, अगर हम ईमानदारी से इसका इलाज चाहते हैं तो। आज के समय में रोज-रोज वैलेंटाइन डे या किसी और चीज के बहाने स्त्री-पुरुष के घर के बाहर साथ आने के स्पेस को खत्म किया जा रहा है। बराबरी के तौर पर जो थोड़ी-बहुत जगह बनाई गई थी उसे भी वापस मांगा जा रहा है। आर्थिक, शैक्षणिक और अन्य तरह की सामाजिक गैरबराबरी पर बात किए बिना इस बीमारी का इलाज भी नहीं है। स्त्री-पुरुष को बराबर और एक-दूसरे को लेकर सहज नहीं माना जाएगा तो इसी तरह एक आंख मारती लड़की ‘नेशनल क्रश’ बन जाएगी और उस ‘क्रश’ का खमियाजा डीटीसी की बस में चलती उस लड़की को भुगतना पड़ता है जो किसी फिल्म की नायिका नहीं है, जो आंख भी नहीं मार रही है और जिसने सनी लियोनी जैसे कपड़े भी नहीं पहन रखे हैं। एक कमजोर तबके के व्यक्ति को प्रिया या सनी लियोनी नहीं मिलती तो वह अपने सामने खड़ी लड़की को दबोचना चाहता है। यह निजी नहीं सामाजिक मसला है। यह उस पोलियो की बीमारी की तरह है जिसमें एक बच्चा भी छूटा तो सुरक्षा चक्र टूटा।

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