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राजपाट : राज की बात

समाजवादी पार्टी लगातार दावे कर रही है कि अखिलेश यादव ने कई नई पहलें की हैं। इस बात में आंशिक सच्चाई है भी। मसलन, जब से वे सत्ता में आए हैं, राज्य विधानमंडल का हर सत्र शुक्रवार को ही शुरू हुआ।

Author February 22, 2016 15:57 pm
सीएम अखिलेेश यादव

समाजवादी पार्टी लगातार दावे कर रही है कि अखिलेश यादव ने कई नई पहलें की हैं। इस बात में आंशिक सच्चाई है भी। मसलन, जब से वे सत्ता में आए हैं, राज्य विधानमंडल का हर सत्र शुक्रवार को ही शुरू हुआ। आम तौर पर सत्र सोमवार से शुरू होते हैं, ताकि लगातार पांच दिन कामकाज हो सके। पर अखिलेश ने इस स्थापित पुरानी परंपरा को तोड़ दिया। हर बार सत्र शुक्रवार को ही शुरू कराया। मौजूदा सत्र भी 29 जनवरी को शुक्रवार को ही शुरू हुआ। राज्यपाल के अभिभाषण की औपचारिकता भर निपटी। इसके बाद पूरे दस दिन की छुट्टी हो गई। यानी नियमित रूप से सदन की बैठक आठ फरवरी को ही होगी। राज्यपाल का अभिभाषण सदन की कार्यवाही का अहम हिस्सा माना जाता है। पर एक दिन के चक्कर में विधायक लखनऊ की आवाजाही क्यों करते? सदन में इसी वजह से सदस्यों की मौजूदगी फीकी नजर आई। शुक्रवार को ही सदन के सत्र की शुरुआत को लेकर विधायकों की राय भिन्न है। कोई इसे ज्योतिष से जोड़ता है तो कोई टोना-टोटका बताता है। पर इसके पीछे असली राज कुछ और है। सूूबे के संसदीय कार्यमंत्री हैं आजम खान। वे शुक्रवार के दिन को सबसे पवित्र मानते हैं। उन्हीं को खुश करने के चक्कर में अखिलेश ने नई परंपरा डाल दी। विधायकों को असुविधा होने के कारण अखरता है तो अखरे। पर दिक्कत तो दूसरी है। चाचा खां साहब भतीजे के अपने इशारों पर नाचने के बावजूद भी उससे संतुष्ट कभी नजर नहीं आए।

नीकु का धर्मसंकट
नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दुविधा आलोचकों ने बढ़ा दी है। उन्हें कुर्सी का प्रेमी बता कर। नीकु पर लालू के दबाव में सरकार चलाने के आरोप खुलेआम लग रहे हैं। गठबंधन सरकार चलाना हंसी खेल होता भी नहीं। फिर नीकु भी क्या करें? राजनीति में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। पहली बार जब मुख्यमंत्री बने थे तो सिर मुड़ाते ओले पड़ने वाला अनुभव हुआ था। बहुमत साबित नहीं कर पाने से कुर्सी खिसक गई थी। नतीजतन राबड़ी देवी सत्ता में आई थीं। तब लालू से मुकाबले में उनके मुकाबले हल्के पड़ गए थे। लेकिन कुछ दिन बाद किस्मत ने पलटा खाया और लगातार मुख्यमंत्री रहे। इस बार भी बहुमत की सरकार के मुख्यमंत्री तो जरूर हैं पर सरकार का श्रेय उन्हें नहीं लालू यादव को है। लालू की बदौलत कुर्सी पाई है तो खामियाजा भी भुगतना ही पड़ेगा। लालू की इच्छा पूरी नहीं करेंगे तो एहसान फरामोश कहलाएंगे। करेंगे तो विरोधियों के ताने सुनेंगे। विरोधी तो कहने ही लगे हैं कि नीकु तो नाम के मुख्यमंत्री हैं। सरकार तो रिमोट के जरिए लालू ही चला रहे हैं। उसी तरह जैसे राबड़ी के मुख्यमंत्री रहते चलाते थे। बिहार में जगह-जगह यह भी मजाक उड़ रहा है कि लालू के मंत्री पुत्रों का सामना नीकु कैसे करते होंगे? मुंहबोले चाचा के नाते तो झेल भी लें पर उनकी सरकार अब लालू पर चल रहे मुकदमों को ही खत्म कराने पर उतारू हो गई है। ऐसे में विरोधी खिल्ली क्यों न उड़ाएं। नीकु ऐसे तो नहीं थे, उन्हें हो क्या गया है? बड़ी शेखी बघारते थे कि कुर्सी का कतई मोह नहीं। जब चाहें तब छोड़ सकते हैं। आखिर कुर्सी से मान-सम्मान ही बड़ा होता है। लेकिन ऐसे सिद्धांतवादी बयान देने वाले नीकु आज कल यह सुन कर कि वे नाम के मुख्यमंत्री हैं, दुखी तो जरूर होते होंगे। या फिर वे भी ढाक के तीन पात बन गए हैं।

रूठ गए सितारे
सुमो बेचैन हैं। सुमो यानी बिहार भाजपा के कद्दावर नेता सुशील मोदी। विधानमंडल में वे ही विपक्ष के नेता ठहरे। नीतीश और लालू के विरोध में रत्तीभर कोताही नहीं बरत रहे। नीतीश की सरकार में उपमुख्यमंत्री थे तो विरोधी उनका मजाक उड़ाते थे। राबड़ी के मुख्यमंत्री काल की नेता विपक्ष वाली उनकी भूमिका की उन्हें याद दिलाते थे। खिल्ली उड़ाते थे कि जितना वे मीडिया में राबड़ी के राज में छाए रहते थे, उपमुख्यमंत्री बन कर उतना ही परदे के पीछे खिसक गए। बेचारे सुमो झेंप कर रह जाते थे। अब फिर विपक्ष की भूमिका में हैं। लेकिन मीडिया तवज्जो ही नहीं दे रहा। अलबत्ता पार्टी के दूसरे केंद्रीय नेता खुलकर लालू और नीतीश का विरोध कर रहे हैं। ऐसे में सुमो बेचैन क्यों न हों? विरोध का श्रेय तो उन्हें मिलता तब वे सुकून मानते।

उलटा पड़ा दांव
मध्यप्रदेश सरकार ने लालबत्ती की रेवड़ियां दो साल से बांटी ही नहीं थी। मलाई मारने के इच्छुक पार्टी नेता व्यग्र तो इस दौरान जरूर रहे पर असंतोष नहीं था। अब निगम और मंडलों में पार्टी के नेताओं की तैनाती की ठहरी प्रक्रिया शुरू हुई तो विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं। चुनाव समिति की सोमवार को हुई बैठक में तो धमाका ही हो गया। पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी ने राय सिंह सेंधव को पाठ्यपुस्तक निगम का अध्यक्ष बनाने पर मुख्यमंत्री शिवराज चौहान से जवाब तलब कर लिया। जोशी के बेटे दीपक जोशी देवास से लगातार तीसरी बार विधायक हैं। इस समय शिवराज सरकार में राज्यमंत्री भी हैं। चौहान देवास की बाबत कोई भी फैसला कैलाश जोशी से पूछ कर ही करते आए हैं। लेकिन इस बार देवास के रायसिंह सेंधव को राज्यमंत्री वाली हैसियत उनसे बिना पूछे ही दे डाली। यानी जोशी के बेटे के बराबर की हैसियत। वह भी कोई चुनाव जीते बिना। कैलाश जोशी ने तेवर दिखाए तो चौहान उनसे काना-फूसी करने लगे। चर्चा है कि उनके राज्यमंत्री पुत्र को जल्द कैबिनेट मंत्री बनाने का भरोसा देकर पीछा छुड़ाया।

पर एक और पूर्व मुख्यमंत्री भी उनसे खफा हो गए। सुंदर लाल पटवा की बदौलत ही सियासत में कद बढ़ाया था चौहान ने। पटवा के भतीजे सुरेंद्र पटवा भी राज्यमंत्री हैं और विभाग है पर्यटन। लेकिन इसी विभाग के तहत आने वाले पर्यटन विकास निगम में तपन भौमिक को अध्यक्ष तो बनाया ही, दर्जा कैबिनेट मंत्री का दे दिया। यानी पटवा के बेटे से बड़ी हो गई भौमिक की हैसियत। जल्द ही सुरेंद्र पटवा को भी कैबिनेट मंत्री न बनाया तो दुर्वासा बन जाएंगे पटवा। सबको तो चौहान कैसे खुश कर सकते हैं। इसीलिए करीबियों को नवाजने के आरोप झेल रहे हैं। असंतुष्टों की दलीलें भी बेदम नहीं हैं। मसलन, जो लोग पहले ही कई-कई बार मलाईदार पदों पर रह चुके हैं, उन्हीं को फिर मौका देने से यह संकेत तो जाता ही है कि पार्टी में और कोई दावेदार है ही नहीं। करीबियों पर मेहर बरसाने का चौहान पर आरोप पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता प्रकाश मीर चंदानी तक ने लगा दिया। बिजेंद्र सिंह सिसौदिया, राम किशन चौहान, राजेंद्र सिंह राजपूत, गुरु प्रसाद शर्मा, शिव प्रसाद चौबे और राव सिंह सेंधव जैसे नाम बतौर प्रमाण हर कोई गिना रहा है। पूर्व मंत्री नारायण कबीर पंथी पर भी वरदहस्त कम नहीं है चौहान का। विधानसभा चुनाव हार गए तो क्या? पहले अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाया था, अब हस्तशिल्प विकास निगम उनके हवाले कर दिया। आलोचनाओं और बगावत से दबाव में आए चौहान को गुरुवार को दूसरी सूची जारी कर छह और नेताओं को मलाईदार ओहदे सौंपने पड़ गए। अब तो चौहान को यही लग रहा है कि लालबत्ती बांट कर बैठे-बिठाए मुसीबत मोल ले ली है उन्होंने।

असंतोष का ज्वार
आखिर अच्छे दिनों का आगाज हो गया। आम आदमी के नहीं, राजस्थान के भाजपा नेताओं के। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने दो साल से बाट जोह रहे कुछ चहेतों को लालबत्ती दे ही दी है। नाराज विधायकों में से कुछ संसदीय सचिव बन मंत्री जैसी हैसियत पा गए हैं। अगर अंधा भी रेवड़ियां बांटते वक्त अपने और पराए में फर्क कर लेता है तो भला वसुंधरा परायों पर कृपा क्यों करतीं? नतीजतन खांटी संघी तो अभी भी मुंह फुलाए ही घूम रहे हैं। जिन दो दर्जन करीबियों पर वसुंधरा ने कृपा बरसाई है, उनमें से ज्यादातर का भाजपा से लंबा नाता नहीं है। संघियों की सूची पर तो शायद वसुंधरा ने गौर अभी की ही नहीं। हालांकि संघी भी सयाने ठहरे। उन्हें अपने मतलब के ठिकानों पर कब्जा चाहिए। मसलन, राज्य लोकसेवा आयोग, अकादमी और शिक्षा संस्थाएं।

निगम और बोर्ड हों तो सदस्यता नहीं, सरपरस्ती। वह भी दाल-दलिए वाले। फिलहाल तो वसुंधरा के करीबियों ने संघियों को पछाड़ दिया है। संघ से वसुंधरा के रिश्ते जयपुर में मंदिर तोड़े जाने के बाद से ही तल्ख बने हैं। अब तो राम माधव भी रंग बदलने लगे हैं। जयपुर आते तो खूब हैं पर संघियों के शिकवे-शिकायत नहीं सुनते। समझदार हैं तो सत्ता से क्यों बिगाड़ें? जयपुर में आतंकवाद के विरोध में बड़ा सम्मेलन करने वाले हैं। संघी क्या मदद करेंगे? वे तो खुद ही बारह महीने चंदा जुटाते रहते हैं। सम्मेलन तो सरकार की मदद से सफल होगा। वसुंधरा को और क्या चाहिए। बिन मांगे मुराद मिल गई। संघ के नुमाइंदे के रूप में भाजपा के कोर ग्रुप में हैं इस समय राम माधव। जम्मू-कश्मीर से लेकर असम तक की सियासी बिसात बिछा रहे हैं। वसुंधरा को तो राम माधव के रूप में अच्छा मददगार मिल गया है। राम माधव की देखादेखी वी सतीश भी पलटी मार गए हैं। सत्ता से दूरी रखने में तो कोई मूर्ख ही भलाई देख सकता है। सतीश ठहरे भाजपा के सहप्रभारी। अमित शाह को फीडबैक वे ही देते हैं। पूरी व्यवस्था माकूल हो तो महारानी बेफिक्र होंगी ही। बेचारे वसुंधरा विरोधी खेमे की आस अब अमित शाह की नई टीम पर टिक गई है। उसी में शायद किसी का भला हो जाए।

तुरुप का पत्ता
भाजपा को पश्चिम बंगाल से कुछ ज्यादा ही आस है। हालांकि लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर के बावजूद पार्टी को महज दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। एक तो पिछली लोकसभा में भी मिली थी उसे। बस बाबुल सुप्रियो ही तो और जीते हैं। पर भाजपा की अपनी रणनीति ठहरी। जनाधार अचानक तो बढ़ता नहीं। वोट तो उसे कांग्रेस से ज्यादा मिल ही गए। लक्ष्य भी पार्टी का कांग्रेस का विकल्प बनना ही तो ठहरा। इस साल विधानसभा चुनाव में भाजपा की कोशिश मुकाबले को बहुकोणीय ही रखने की होगी। हालांकि वामपंथी और कांग्रेस दोनों ही तृणमूल कांग्रेस से तालमेल को लालायित हैं। भाजपा की रणनीति नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम को भुनाने की लगती है। अमित शाह ने दोबारा पार्टी की कमान संभाली तो पहली रैली हावड़ा में ही की। नेताजी के प्रपौत्र को पार्टी में शामिल कर लिया। चंद्रबोस ही अब तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल किए जाएंगे।

वे विधानसभा चुनाव तो शायद नहीं लड़ें। पर अगली बार लोकसभा में किस्मत जरूर आजमा सकते हैं। अलबत्ता विधानसभा में ममता के खिलाफ प्रचार अभियान जरूर चलाएंगे। नेताजी की जयंती पर 23 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वायदे के मुताबिक उनसे जुड़ी सौ फाइलों को सार्वजनिक कर दिया। उसके बाद चंद्रबोस पार्टी में आ गए। ममता के लिए यह दोहरे झटके वाली बात हो गई। भाजपा नेताजी के उन समर्थकों की हमदर्दी लूटना चाहती है, जो मानते ही नहीं कि 1945 की विमान दुर्घटना में नेताजी की मौत हुई थी। चंद्रबोस भी इसी मान्यता के हैं। गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने के मुद्दे पर ज्यादा मुखर भी वे ही थे। नेताजी के परिवार के दो सदस्य सांसद सुगत बोस और पूर्व सांसद कृष्णा बोस की मान्यता उलट है। वे नेताजी की मौत विमान हादसे में हो जाने की पुष्टि करते रहे हैं। यों तो ममता बनर्जी को भी कभी यकीन नहीं हुआ कि नेताजी की विमान हादसे में मौत हुई थी। पर चंद्रबोस तो उनका विरोध करेंगे ही। नेताजी का मुद्दा भाजपा के भाग्य को बदल पाएगा या नहीं, कौन जाने?

खिसियाए कांग्रेसी
कांगड़ा का जिला परिषद अध्यक्ष कांग्रेस को नहीं मिल पाया। सूबे की सत्तारूढ़ पार्टी को सबसे बड़े जिले ने झटका दे दिया। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल दोनों के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया था यह चुनाव। मुख्यमंत्री तो कांगड़ा में ही डेरा डाले थे। उनकी देखा-देखी धूमल को भी वहीं धमकना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के कद्दावर सांसद शांता कुमार का जिला है कांगड़ा। इस नाते ज्यादा दखल नहीं दिया कभी धूमल ने यहां। पर वीरभद्र खुद वहां सक्रिय दिखे तो भला धूमल अनदेखी कैसे करते? वे तो जिला परिषद चुनाव के चक्कर में अपने जिले हमीरपुर में भी नहीं पड़े। तीन वोट से कांग्रेस हार गई। कांगड़ा के तमाम दिग्गज मंत्री भी मात खा गए। हार की खीझ मिटाने के लिए कोई तो बहाना चाहिए ही। मंत्री जीएस बाली ने देर नहीं लगाई दोषारोपण करने में। भाजपा पर सदस्यों की खरीद-फरोख्त का आरोप जड़ हाथ झाड़ लिए।

सियासत की भेंट
केंद्र सरकार ने बीस स्मार्ट सिटी की पहली सूची जारी की तो हिमाचल उससे नदारद था। हालांकि शिमला स्मार्ट सिटी की व्यापक सूची में शामिल रहा है। मोदी सरकार की नीयत थी भी नहीं शिमला को जल्दी स्मार्ट सिटी बनाने की। अंकों की दौड़ में तभी तो वेंकैया नायडू के मंत्रालय ने शिमला को धर्मशाला से भी पीछे कर दिया। शिमला नगर निगम के लोगों ने हाईकोर्ट में चुनौती भी दी। मापदंडों से छेड़छाड़ का आरोप लगाया तो हाईकोर्ट ने धर्मशाला को स्मार्ट सिटी बनाने के प्रस्ताव को रद्द कर दिया। शिमला को ही स्मार्ट सिटी बनाने का प्रस्ताव तैयार करने की हिदायत दे डाली। नायडू का मंत्रालय फिर भी टस से मस नहीं हुआ। नतीजतन पहली सूची में न शिमला दिखा और न धर्मशाला। कांग्रेस के प्रवक्ता नरेश चौहान ने तपाक से केंद्र पर पर्वतीय राज्य हिमाचल के साथ सौतेला बर्ताव करने का आरोप जड़ दिया। हाईकोर्ट में लड़ाई माकपा से जुड़े शिमला के मेयर और डिप्टी मेयर भी लड़ी थीं। उन्होंने अब भी हार नहीं मानी है। यह बात अलग है कि कांग्रेस और भाजपा के सियासी खेल ने सूबे का स्मार्ट सिटी का खेल फिलहाल तो खराब कर ही दिया है।

बदनामी का सबब
हिमाचल जैसी ही तकदीर दूसरे पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की भी निकली। देश के पहले बीस स्मार्ट सिटी की सूची में उत्तराखंड का नाम भी नहीं आ पाया। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने की पुरजोर पैरवी की थी। चाय बागान की जमीन का चयन कर केंद्र को प्रस्ताव भी भेज दिया था। पर जमीन के चक्कर में भ्रष्टाचार का गुल गपाड़ा सामने आया तो विरोध सूबे में ही शुरू हो गया। कांग्रेस ने सूबे की अनदेखी का राग अलापा तो भाजपा के साथ-साथ आम आदमी पार्टी और वामपंथी पार्टियों ने भी फिर उछाल दिया चाय बागान की जमीन को बड़े कारोबारी को कौड़ियों के भाव सौंपने का हरीश रावत सरकार का फैसला। दुखी देहरादून के भाजपाई मेयर विनोद चमोली भी खूब हुए होंगे। पार्टी लाईन से अलग हट वे तो अपने नगर निगम की पौबारह का सपना देख रहे थे। नगर निगम से चाय बागान की जमीन पर स्मार्ट सिटी बनाने का प्रस्ताव भी पारित कराया था। और तो और हरीश रावत ने चीन के एक विश्वविद्यालय के साथ जब स्मार्ट सिटी के एमओयू पर दस्तखत किए थे तो चमोली भी गवाह बने थे। तभी तो अब कांग्रेसियों के साथ वे भी कोस रहे हैं अपनी ही केंद्र सरकार को।

नहीं गल रही दाल
उत्तराखंड का सचिवालय देहरादून में है। आज कल सचिवालय की तस्वीर बदल गई है। दो महीने पहले तक तो दलालों का जमघट दिखता था सचिवालय में। हर कोई तबके मुख्य सचिव राकेश शर्मा से अपने नजदीकी रिश्तों के दम पर कुछ भी करा देने का दावा करता था। इस जमघट में पत्रकार भी थे और बिल्डर भी। लेकिन मुख्य सचिव की कुर्सी पर शत्रुघ्न सिंह आए तो सबके चेहरे लटक गए। हालांकि दलालों ने हिम्मत नहीं हारी है। मुख्य सचिव के बजाए अब मुख्यमंत्री के दफ्तर के आसपास मंडरा रहे हैं। पूर्व मुख्य सचिव राकेश शर्मा को मुख्य सचिव से भी ज्यादा ताकतवर बता उनका महिमा मंडन कर रहे हैं। बदनाम शर्मा को मुख्यमंत्री ने अपना प्रधान सचिव जो बनाया है। पर सचिवालय में तो दागियों की दाल अब आसानी से गलने वाली नहीं।

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