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अब ‘मन की बात’ सुनने का समय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नजरिए से देखें तो उनको मार्गदर्शक मंडल में होना चाहिए। यह दीगर बात है कि उनकी मार्गदर्शन करने लायक बात को सुनना भी शायद प्रधानमंत्री को गवारा न हो।

मन की बात के कार्यक्रम को संबोधित करते मोदी की फाइल फोटो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नजरिए से देखें तो उनको मार्गदर्शक मंडल में होना चाहिए। यह दीगर बात है कि उनकी मार्गदर्शन करने लायक बात को सुनना भी शायद प्रधानमंत्री को गवारा न हो। मार्गदर्शक मंडल में इसलिए क्योंकि वे सात दशक पार कर चुके हैं और कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बहुत नजदीकी रहे हैं। उनकी बातों की सुनवाई इसलिए संभव नहीं, क्योंकि जब अटल बिहारी वाजपेयी कुछ कह नहीं रहे और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी कुछ कह भी रहे हैं, तो उनकी सुनवाई नहीं, तो मथुरा की सड़कों पर पैदल या किसी दुपहिया वाहन पर सवार होकर अपने काम पर पहुंचने वाले वीरेंद्र कुमार अग्रवाल की क्या हस्ती बची है।
ऐसा भी नहीं कि वे प्रधानमंत्री मोदी के कायल नहीं हैं। वे हर्षित हैं कि देश में भाजपा की सरकार बनी। बस इतना कि उनकी उम्मीदें पूरी होने की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाए जा रहे। उनका सीधा सुझाव है कि ‘‘प्रधानमंत्री जी, अपने मन की बात बहुत कर ली, अब दूसरों के मन की बात सुनने का समय है।’’ वीरेंद्र कुमार, जिन्हें लोगबाग मथुरा में वीरेन जी के नाम से जानते हैं, संघर्ष के लंबे रास्ते से गुजरे हैं और अपनी उम्र के बाकी लोगों की तरह ही हाशिए पर हैं।
पचास के दशक में जब आर्य समाज ने हिंदी के लिए आंदोलन चलाया तो वीरेन की पहली जेलयात्रा हुई, जो इमरजंसी तक अलग-अलग मौकों पर जारी रही। ‘‘मैं महज इस बात से सुकून पा सकता हूं कि पार्टी ने देश में सत्ता बना कर अपनी सार्थकता सिद्ध की है। लेकिन आम आदमी को, पार्टी के कार्यकर्ता को इससे कुछ हासिल नहीं हुआ। जरूरी है कि उसके लिए निजी स्तर पर कुछ हो। मसलन, लोगों के लिए महंगाई कम हो और कार्यकर्ता को पार्टी में सम्मान मिले।’’
वीरेन याद करते हैं कि पहले पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में कैसा नाता होता था! उनकी चार बेटियों में से एक के दाखिले के समय अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं उसे स्कूल लेकर गए, बजाय कोई चिट्ठी थमाने के। ‘‘मैं भूल नहीं पाता हूं वह क्षण जब अटल जी ने मेरी छोटी-सी बच्ची का हाथ थामा। लेकिन अब ऐसा कहां! अब तो पार्टी के सत्ता में आते ही नेता इतने दूर हो जाते हैं कि उन तक पहुंचने के लिए कई अवरोधक पार करने होते हैं।’’
मथुरा की भीड़ भरी सड़कों पर, जहां वे कभी नगराध्यक्ष रहे, आज भी किसी से लिफ्ट लेकर अपने काम पर पहुंचते हैं। यही उनकी अर्जित पूंजी है कि वे शहर में जिस भी वाहन को हाथ दे देते हैं, वह सहर्ष उनको साथ लेकर चल पड़ता है। वीरेन कहते हैं, ‘‘मैंने आर्य समाज, फिर जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के ध्वज के नीचे ही अपनी राजनीति की। लेकिन अब राजनीति धनार्जन का साधन हो गई है। इससे त्याग का भाव उठ गया है। पहले ऐसा नहीं था। अब गिरफ्तारियां महज कैमरे में कैद होने के लिए होती हैं, जबकि पहले उनका मकसद संघर्ष का होता था।’’
राजनीति से वीरेन जैसा मोहभंग कई और लोगों को भी हुआ है। बस उनमें कहने का दम है, जबकि बाकी का सहने या चुप रहने का। इस पर वीरेन का नजरिया साफ है: ‘‘मेरा अपना कुछ दांव पर नहीं और न ही कोई चाहत। मेरा तो जो भी है वह पार्टी के लिए है, जिसे कई वर्षों की मेहनत के बाद सत्तासुख मिला है। ऐसा न हो कि यह सब यों ही व्यर्थ चला जाए।’’
सत्तासीन लोगों को उनकी ये सब बातें प्रलाप ही लगेंगी। कुर्सी की चाहत में अपनी असहमति का गला घोंटने वाले मोदी के वरिष्ठ सहयोगियों से कोई भी उम्मीद बेकार है। लेकिन इस सबके बावजूद सम्मान का जो भाव वीरेन के लिए मथुरा वासियों के मन में है, वैसा सत्तासीन नेताओं में एक-दूसरे के लिए भी नहीं है। सभी मौका देख कर एक-दूसरे पर वार करने की फिराक में रहते हैं। वीरेन का कहना है, ‘‘बचपन से ही एक कहावत सुनते आए हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। शायद मेरे नेता के साथ भी ऐसा ही हो।’’ मगर दिल्ली की गलाकाट राजनीति से अनजान वीरेन की सुबह के भूले के शाम को लौटने की उम्मीद जल्दी पूरी होती दिखाई नहीं देती।
समूचे विश्व को गीता का उपदेश देने वाले भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा की स्थिति भी मोदी के मार्गदर्शक मंडल की तरह है। शहर जैसे किसी आपदा को निमंत्रण देता हुआ प्रतीत होता है। सड़कों पर पैदल चलना मुहाल है, वाहनों के चलने का तो सवाल ही नहीं। कृष्ण जन्म स्थान मंदिर को अगर छोड़ दें तो बाकी मंदिरों में अव्यवस्था का आलम खतरनाक स्तर पर है। गलियों की हालत खस्ता है। बाजारों में अतिक्रमण का बोझ और चौराहों पर जाम अनवरत साम्राज्य जैसी स्थिति है। ‘दूसरी सरकार पर हिंदुत्ववाद का भी इल्जाम है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण इस शहर का शायद कोई संरक्षक भी नहीं है।’ उन्होंने कहा। मथुरा से फिल्म स्टार हेमा मालिनी सांसद हैं।
राजनीति में ईमानदारी के ठेकेदारों और शुचिता के स्वघोषित अलंबरदारों की भीड़ में वीरेन की आवाज वैसे ही है जैसे नक्कारखाने में तूती। लिहाजा इसकी समाप्ति की उम्मीद भी बरकरार है। लेकिन भीड़ जितनी भी हो, जैसी भी हो, इसका अंत कभी तो होगा। संभव है कि वीरेन जैसी आवाजें अभी डेढ़-दो साल और उपेक्षा झेलती रहें, लेकिन चुनाव से दो वर्ष पहले तक न सिर्फ इनकी संख्या बढ़ जाएगी, बल्कि उनको सुनना भी विवशता होगी, जिसका असल में कोई विकल्प नहीं। तब तक इंतजार!

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