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हमारी याद आएगी : जब के आसिफ की कल्पना और सुरैया के उसूल टकराए

यह किस्सा है एक अभिनेत्री की अपनी आजादी, आस्था विश्वासों और उसकी सीमाओं के एक निर्देशक की जिद, जुनून और कल्पना से टकराने का। मशहूर अभिनेत्री सुरैया और ‘मुगले आजम’ जैसी फिल्म बनाने वाले निर्देशक के आसिफ (आसिफ करीम) की फिल्म ‘जानवर’ इस टकराव की बलि चढ़ी थी। यह ऐसी फिल्म थी, जिसमें सुरैया और दिलीप कुमार ने पहली मगर आखिरी बार साथ काम किया था।

मशहूर अभिनेत्री सुरैया और ‘मुगले आजम’ जैसी फिल्म बनाने वाले निर्देशक के आसिफ करीम।

सुरैया (15 जून, 1929- 31 जनवरी, 2004) के आसिफ (14 जून, 1922- 9 मार्च 1971) : आसिफ और सुरैया के साथ काम करने की कहानी 1945 की फिल्म ‘फूल’ से शुरू होती है, जिसमें पृथ्वीराज कपूर हीरो थे और हीरोइन थीं वीणा। वीणा का असली नाम ताजौर सुलताना था। वीणा के भाई शहजादा सुरैया के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन सुरैया के घर के सामने फुटपाथ पर खड़े रहते थे, उनकी एक झलक पाने के लिए। बड़ी मुश्किल से सुरैया ने कुछ फिल्म वालों को बीच में डाल शहजादा का वहां खड़ा रहना बंद करवाया था। ‘फूल’ के लिए आसिफ सुरैया को लेना चाहते थे मगर बॉम्बे टॉकीज ने सुरैया के साथ 1943 में पांच साल का अनुबंध किया था। सुरैया को हर महीने पांच सौ रुपए मिलते थे। कलाकारों के कदरदान आसिफ इतने जिद्दी थे कि पसंदीदा कलाकार लेने के लिए वे कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे। आसिफ ने तीन शादियां-कथक साम्राज्ञी सितारा देवी, निगार सुलताना और दिलीप कुमार की बहन अख्तर आसिफ-की थीं। ‘मुगले आजम’ में बहार की भूमिका करने से जब अपार सुंदरी निगार ने इनकार किया, तो आसिफ ने उनसे अपनी जीवनसंगिनी बना बहार की भूमिका करवाई।

जब आसिफ को सुरैया और बॉम्बे टॉकीज के अनुबंध का पता चला, तो उन्होंने सुरैया से कहा कि वे उन्हें 40 हजार रुपए महीना देंगे। कहां पांच सौ रुपए और कहां 40 हजार की मोटी रकम। सुरैया यह प्रस्ताव ठुकरा नहीं सकी। उन्होंने देविका रानी से निवेदन कर अपने को अनुबंध से आजाद करवा लिया। ‘फूल’ के बाद आसिफ ने दिलीप कुमार और सुरैया को लेकर एक फिल्म ‘जानवर’ शुरू की थी, जिसमें सुरैया की कैबरे डांसर की भूमिका थी। इस फिल्म के एक दृश्य में दिलीप कुमार अंगूठे से लेकर घुटनों तक सुरैया के पैर चूमते हैं। अंगप्रदर्शन के खिलाफ रहीं सुरैया के लिए यह दृश्य असहज था। इस दृश्य में दिलीप कुमार का किरदार इतना वहशी हो जाता है कि वह सुरैया के कपड़े फाड़ देता है और नाखूनों के ऐसे निशान बना देता है जिनमें लहू छलकता दिखाई दे। यह दृश्य के करने के काफी दिनों बाद तक सुरैया शूटिंग नहीं कर पाई थी। सुरैया के साथ हमेशा सेट पर मौजूद रहने वाली उनकी नानी बाश्शा (बादशाह) बेगम को भी यह सब अच्छा नहीं लगा, मगर वह मन मसोस कर रह गईं।

सुरैया ने यह सीन तो कर दिया मगर एक बार जब सीमाएं टूटीं, तो टूटती चली गई। आसिफ की कल्पना बेलगाम दौड़ने लगी। उन्होंने एक दिन कहा कि वह सुरैया और दिलीप कुमार का एक चुंबन दृश्य फिल्माना चाहते हैं। सुरैया ने प्रतिवाद किया कि यह दृश्य पटकथा में नहीं है, फिर क्यों फिल्माया जा रहा है। साथ ही यह तर्क भी दिया कि सेंसर बोर्ड इसे काट ही देगा, तब फिल्माना अर्थहीन है। मगर आसिफ अपनी जिद पर अड़ गए और कहा कि वह सेंसर से इसे पास करवा लेंगे। जब आसिफ की जिद बढ़ गई तो सुरैया ने स्पष्ट कह दिया कि वे इस फिल्म में किसी भी कीमत पर काम नहीं करेंगी। उन्हें मनाने की कोशिशें की गई, मगर सफलता नहीं मिली। फिल्म की शूटिंग रुक गई। आसिफ ने बाद में मधुबाला को लेकर ‘जानवर’ बनाने की कोशिश की मगर सुरैया जैसी लोकप्रियता मधुबाला की नहीं थी, इसलिए फिल्म में पैसा लगाने वालों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। जब फाइनेंसरों ने फिल्म से मुंह मोड़ लिया, तो यह फिल्म हमेशा के लिए डिब्बे में चली गई।

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