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संपादकीयः हंगामे का चलन

विधायिका में बहस-मुबाहिसे के बजाय हंगामे का चलन पिछले कुछ सालों में बढ़ गया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष का तोड़फोड़ पर उतर आना इसका ताजा उदाहरण है।

विधायिका में बहस-मुबाहिसे के बजाय हंगामे का चलन पिछले कुछ सालों में बढ़ गया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष का तोड़फोड़ पर उतर आना इसका ताजा उदाहरण है। इसके पहले भी वहां कई बार ऐसी घटनाएं हुई हैं। कुछ मौकों पर सत्ता पक्ष के अड़ियल रवैए की वजह से विपक्ष नाराज हुआ तो कुछ मौकों पर विपक्ष खुद किन्हीं मसलों को बेवजह तूल देता रहा। इस बार विपक्ष मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से अनुच्छेद 370 पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग पर अड़ा हुआ था। दरअसल, पांच दिन पहले महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि अगर कोई अनुच्छेद 370 को कमजोर करने की कोशिश करता है तो वह सबसे बड़ा देशद्रोही कदम होगा। यह ऐसा मामला नहीं था, जिस पर सत्तापक्ष को अपना रुख साफ करने में हिचक होनी चाहिए। मगर वहां के शिक्षामंत्री ने विपक्ष की मांग को बेवजह करार देते हुए इस पर किसी तरह की बहस को खारिज कर दिया, तो विपक्ष ने उग्र रूप अख्तियार कर लिया। उन्होंने फाइलें और कुर्सियां उठा कर फेंकना शुरू कर दिया।

यह प्रवृत्ति केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है। विभिन्न विधानसभाओं में ऐसी घटनाएं देखी जा चुकी हैं। कई बार पक्ष और विपक्ष की झड़पों में कुछ जनप्रतिनिधियों के घायल हो जाने के भी उदाहरण हैं। संसद और विधानसभाएं समस्याओं को विचार-विमर्श और आपसी सहयोग से सुलझाने का मंच हैं। मगर अब इनकी कार्यवाहियों में राजनीतिक आग्रह-दुराग्रह ज्यादा हावी रहने लगे हैं। विपक्ष प्राय: सत्ता पक्ष को झुकाने के मकसद से कार्यवाही में बाधा डालने का प्रयास करता देखा जाता है, तो कई बार सत्तापक्ष जानबूझ कर ऐसी स्थिति पैदा करता है कि सदन में हंगामा हो और वह अपने कुछ फैसले मंत्रिमंडल में पारित करा सके। इस तरह अनेक मुद्दों पर बिना किसी बहस के, इकतरफा फैसला हो जाया करता है। यह किसी भी तरह से लोकतांत्रिक तरीका नहीं माना जा सकता।

वैसे सदन में हंगामे की स्थिति पैदा न हो, कामकाज सुचारु रूप से चले और बहस-मुबाहिसे के जरिए मसलों पर कोई फैसला करने की स्थिति बन सके, ऐसा माहौल बनाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की होती है। इसलिए उससे अपेक्षा की जाती है कि अड़ियल रुख अपनाने के बजाय, सभी दलों की राय जानने का प्रयास करे। ऐसे में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामे की स्थिति बनी तो उसके लिए सिर्फ विपक्ष को दोष नहीं दिया जा सकता। अनुच्छेद 370 कश्मीरियों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। अगर उसे लेकर मुख्यमंत्री ने कुछ कहा, तो उसे सदन में स्पष्ट करने से परहेज क्यों होना चाहिए था। जब से वहां भाजपा के सहयोग से पीडीपी ने सरकार बनाई है, अनुच्छेद 370 को लेकर लोगों के मन में संशय रहता है, क्योंकि भाजपा इसे समाप्त करने की वकालत करती रही है। इसलिए मुख्यमंत्री से सदन में अपनी बात स्पष्ट करने की विपक्ष की मांग अनुचित नहीं मानी जा सकती। मगर जिस तरह नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के सदस्यों ने सदन की मर्यादा का खयाल न करते हुए तोड़-फोड़ की वह अपनी मांग मनवाने का लोकतांत्रिक तरीका नहीं कहा जा सकता। यह महज सस्ती लोकप्रियता बटोरने का रास्ता हो सकता है। दरअसल, जब से मीडिया का प्रसार बढ़ा है और सदन की कार्यवाही के हर पल की खबरें लोगों तक पहुंचने लगी हैं, कुछ जनप्रतिनिधि तल्ख तेवर अपना कर जाहिर करने की कोशिश करते हैं कि वे अपने लोगों की फिक्र करते हैं। मगर ऐसी हरकतों से जो सदन के कामकाज में बाधा पहुंचती और मर्यादा का उल्लंघन होता है, उसकी भरपाई नहीं हो पाती।

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