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भारत-अमेरिकी रक्षा व कारोबार सहयोग: रूस से संबंधों पर कितना दबाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 5.4 अरब डॉलर के ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली सौदे के समझौते के एक साल बाद ही भारत-अमेरिकी संबंधों पर छाया दिखने लगी।

Author Published on: October 22, 2019 5:42 AM
विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने अमेरिकी समकक्ष माइक पोंपिओ से मुलाकात करते हुए।

दीपक रस्तोगी

दिल्ली में भारत-अमेरिका रक्षा तकनीक एवं व्यापार पहल (इंडिया-यूएस डिफेंस टेक्नोलॉजिज एवं ट्रेड इनीशिएटिव या डीटीटीआइ) की होने जा रही बैठक को लेकर दोनों देशों के राजनयिक काफी उम्मीदें जता रहे हैं। अमेरिका रक्षा विभाग पहले ही उम्मीदें जता चुका है कि इस साल के आखिर तक भारत और अमेरिका के बीच रक्षा कारोबार 18 अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का आंकड़ा छू लेगा। इसके बाद पेंटागन ने उम्मीद जताई कि भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग और भागीदारी में इजाफा होगा। बैठक से पहले आए इन बयानों का भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्वागत तो किया, लेकिन साथ में रूस के साथ प्रस्तावित रक्षा सहयोग सौदों को लेकर सधी हुई प्रतिक्रियाएं भी विभिन्न गलियारों से सामने आईं। खासकर, रूस के साथ प्रस्ताव एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल रक्षा प्रणाली के सौदे को लेकर। अमेरिका इस सौदे से पीछे हटने के लिए भारत पर दबाव बना रहा है। हालांकि, भारत सरकार कई स्तरों पर कह चुकी है कि मिसाइल रक्षा प्रणाली हो या परमाणु रिएक्टर निर्माण सहयोग- किसी से पीछे हटने का सवाल नहीं।

नॉटो में जापान जैसे सहयोगी का दर्जा
अगस्त 2018 में अमेरिका ने भारत को एसटीए-1 (स्ट्रेटजिक ट्रेड अथॉरिटी टीयर 1) का दर्जा दिया। शर्त थी कि भारत अमेरिकी रक्षा कंपनियों को ही तरजीह देगा। भारत का यह दर्जा जापान, दक्षिण कोरिया और आॅस्ट्रेलिया की तरह है। भारत में जिस डीटीटीआइ पहल की बैठक हो रही है, उसमें अमेरिका का प्रतिनिधित्व अमेरिकी रक्षा अवर सचिव एलेन एम लॉर्ड एवं भारत का प्रतिनिधित्व रक्षा उत्पादन सचिव अपूर्व चंद्र कर रहे हैं। एलेन ने कहा है कि हम भारत के साथ रक्षा उत्पादन में नई ऊंचाइयां हासिल करना चाहते हैं।

डीटीटीआइ पहल कोई संधि या कानून नहीं है, जो भारत या अमेरिका के लिए बाध्यतामूलक हो। यह ऐसा उपादान है, जिसके तहत दोनों देशों के नेता और अधिकारी रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर बात करते रहेंगे। इसके तहत भारत का रक्षा उद्योग तंत्र विकसित और मजबूत किया जाना है। भारत रक्षा उपकरणों और हथियारों के उत्पादन में बड़ा मुकाम हासिल करना चाहता है और इस नाते भारत में रक्षा उद्योग में तेज बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है, जिसके मद्देनजर अमेरिका ने कारोबारी कवायद शुरू की है।

रूस के साथ संबंधों का क्या होगा
डीटीटीआइ की कवायद शुरू होने से पहले भारत और रूस के बीच पांच अक्तूबर, 2018 को रूसी ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली खरीदने के प्रस्ताव पर दस्तखत किए गए। उसी समय अमेरिकी कांग्रेस ने काट्सा कानून (काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रो सैंक्शंस एक्ट) पारित किया, जिसके बाद से भारत के सामने रूस के साथ द्विपक्षीय सौदों में त्रिपक्षीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 5.4 अरब डॉलर के ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली सौदे के समझौते के एक साल बाद ही भारत-अमेरिकी संबंधों पर छाया दिखने लगी। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वाशिंगटन जाकर अपने अमेरिकी समकक्ष माइक पोंपिओ से जब भी मुलाकात की, अमेरिकी अधिकारियों ने भारत को ‘रूसी सौदे के खतरों के प्रति आगाह’ किया। जब वाशिंगटन से डीटीटीआइ के बारे में 18 अरब अमेरिकी डॉलर के रक्षा सौदों की उम्मीद जताई जा रही थी, उसके कुछ दिन पहले ही उसके विदेश विभाग ने एक बयान में कहा, ‘हम अपने सभी सहयोगी और भागीदारी से निवेदन कर रहे हैं कि वे रूस के साथ कारोबार से बाज आएं और काट्सा के तहत प्रतिबंधों की आशंका से बचें।’ यह बयान जयशंकर के उस भाषण की त्वरित प्रतिक्रिया में था, जिसमें उन्होंने कहा कि हम किसी भी देश से यह सुनना पसंद नहीं करेंगे कि हम रूस या अमेरिका से क्या खरीदें और क्या नहीं।

अमेरिकी काट्सा कानून और ट्रायम्फ सौदा
भारत के लिए ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली की खरीद पाकिस्तान और चीन की सीमा पर आसन्न खतरों के मद्देनजर बेहद जरूरी मानी जा रही है। भारतीय वायुसेना ने इसकी जरूरत पर जोर दिया है। अमेरिका ने रूस से इस मिसाइल प्रणाली की खरीद पर चीन के उपकरण विकास विभाग (ईडीडी) और तुर्की पर काट्सा के तहत प्रतिबंध लगाए। अमेरिकी ने तुर्की को एफ-35 विमान बेचने से बना कर दिया। तुर्की इस सौदे से पीछे हट गया। चीन पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू हैं। काट्सा के नियमों में जिक्र है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चाहें तो प्रतिबंधों से छूट का ऐलान कर सकते हैं। भारत की राजनयिक स्तर पर इसी की कोशिश चल रही है।

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