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20 फीसदी वोट के लिए दलित आंदोलन हो रहा है लहूलुहान?

जनसंख्या के लिहाज से इस अहम वोट बैंक को कोई भी सियासी दल इतनी आसानी से अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता। यहीं वजह है कि जब देश जल रहा था तब किसी भी दल के नेता ने प्रदर्शन के हिंसक तरीकों पर सवाल नहीं उठाया बल्कि राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साध कर अपनी सियासत चमकाने की कोशिश की।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सोमवार (2 अप्रैल) को भारत बंद के समर्थन में बोले। उन्होंने इसी के साथ सड़क पर उतरने वाले दलितों को सलाम किया। उन्होंने कहा, “दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के डीएनए में है। जो इस सोच को चुनौती देता है, उसे वे हिंसा से दबाते हैं।” कांग्रेस अध्यक्ष ने आगे कहा, “हजारों दलित भाई-बहन आज सड़क पर उतरकर नरेंद्र मोदी सरकार से अपने अधिकारों की रक्षा की मांग उठा रहे हैं। हम उन सभी को सलाम करते हैं।” आपको बता दें कि दलित संगठनों ने आज (2 अप्रैल) भारत बंद बुलाया है। ऐसा एससी-एसटी एक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट में फैसले को लेकर हुआ है। छह राज्यों में बड़े स्तर पर इसका असर देखने को मिला, जिनमें मध्य प्रदेश और राजस्थान में हिंसक प्रदर्शन भी हुए। खबर लिखे जाने तक 5 की मौत और 30 लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की जानकारी है।

यह वो दौर अब नहीं जब कोई आंदोलन बड़ी ख़ामोशी से जीत जाए। यह वो दौर नहीं जब सियासत की दाल आंदोलन की आंच में ना गलाई जाए। यह वो दौर है जब कोई संग्राम पल भर में सड़क पर लहूलुहान हो जाता है और फिर इसी लहू से सींची जाती है सियासत की फसल। दलित संगठनों के इस क्रांति प्रदर्शन में देश जलता रहा और हमारे सियासतदान दूर से ही डुगडुगी बजाकर बस इस तमाशे को निहारती रहे। जब बाबा साहब ने देश को संविधान का अनमोल तोहफा दिया होगा तब शायद ही उन्होंने यह कभी नहीं सोचा होगा कि एक बेहतरीन संविधान वाले गणतांत्रिक देश के नागरिक एक दिन इसी संविधान में लिखे कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ा देंगे। बहरहाल दलितों के इस भीषण आंदोलन में देश को क्या और कितना नुकसान हुआ यह हम सबने देख लिया है और यकीनन सरकारी फाइलों में भी इस नुकसान के आंकड़ें दर्ज हो गए होंगे, सो बात अब उस सियासत की जो अक्सर ऐसे आंदोलनों के जरिए अपने लिए संजीवनी तलाशता रहता है। खासकर बात जब दलितों की हो तो राजनीतिक दल कोई भी भूल-चूक नहीं कर सकते।

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इस देश के किसी भी सियासी दल के लिए दलित कितने अहम हैं यह समझने के लिए आपको ज्यादा मेहनत करने या दिमागी घोड़े दौड़ाने की जरुरत नहीं है। बस इतना समझ लीजिए की लोकसभा की 543 सीटों में से करीब 79 सीटें अनुसूचित जाति और 40 से ज्यादा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में इस वक्त दलितों की आबादी करीब 20 प्रतिशत है। इस 20 प्रतिशत की ताकत यह है कि वो इस देश की सत्ता को कभी पलटने का माद्दा रखती है। जाहिर है इस ताकत को हासिल करने की तमन्ना हर सियासी दल के दिल में पलती है। अभी लोकसभा की कुल आरक्षित सीटों में से करीब आधी सीटें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास है। हर पांच साल पर लोकसभा की जिन 80 सीटों पर जीतने की होड़ मचती है उस सीट के लिए हर सियासी दल अपनी-अपनी तरह से खुद को दलितों का रहनुमा बताने की कोशिश करता है।

दलितों के इस आंदोलन का कहर यूं ही हिंदी भाषी राज्यों में नहीं टूटा है। दरअसल इसके पीछे वजह है इन राज्यों में इनकी बड़ी आबादी और इस आबादी की बदहाली तथा अपने रहनुमाओं के खिलाफ उनके दिल में सुलगता गुस्सा। जनसंख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में करीब 21 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं। कभी कांग्रेस और बसपा ने दलितों के नाम पर यहां अपनी सियासत चमकाई तो अब बीजेपी इन दलितों को वोट बैंक के लिए अपना सबसे बड़ा टारगेट मानती है। राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बिहार में दलितों की आबादी 16 प्रतिशत है। इनकी अहमियत को समझते हुए इनपर राजनीतिक जय हासिल करने के लिए ही यहां नीतीश कुमार ने दलितों में महादलित का हिट फॉर्मूला चलाया। पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी 25 फीसदी से ज्यादा है और एक वक्त था जब वाम मोर्चा का इनपर एकछत्र राज था लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस इनकी सियासत की रहनुमाई करने का दावा करती है। इसी तरह हरियाणा, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में दलितों की तादाद काफी अच्छी है।

जाहिर है जनसंख्या के लिहाज से इस अहम वोट बैंक को कोई भी सियासी दल इतनी आसानी से अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता। यहीं  वजह है कि जब देश जल रहा था तब किसी भी दल के नेता ने प्रदर्शन के हिंसक तरीकों पर सवाल नहीं उठाया बल्कि राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साध कर अपनी सियासत चमकाने की कोशिश की। मौके की नजाकत को समझते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी संसद में अपनी सरकार की स्थिति साफ कर दी कि वो इस तबके को नाराज करने की कभी सोच भी नहीं सकता।  लोकसभा चुनाव सिर पर है ऐसे में राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से दलितों को साधने की रणनीति बना रहे हैं।

लेकिन सच यह है कि इन राज्यों में दलितों की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है। जिस कानून में संशोधन करने की बात सर्वोच्च अदालत ने की है उस कानून को लेकर दलितों के मन में यह डर है कि इन राज्यों में उनके खिलाफ अपराध अब औऱ भी बढ़ जाएगा। यह सच है कि अभी भी देश में दलितों के खिलाफ अपराध के आंकड़ें काफी अफसोसजनक हैं। खासकर बिहार, यूपी, हरियाणा जैसे हिंदी भाषी राज्यों के सुदूर गांवों में दलितों की स्थिति काफी बुरी है। समाज में अभी भी इस वर्ग के लेकर कई लोगों के मन में कई शंकाएं और भेदभाव जैसी भावनाएं हैं। बदलते दौर में इस वर्ग ने तो खुद को काफी बदला लेकिन शायद नहीं बदल सकी है तो कुछ लोगों की मानसिकता जो उन्हें अपने पुरखों से विरासत में मिली है। अफसोस इस बात का भी है कि बरसों से सियासत ने इस दिशा में ठोस प्रयास किये होते तो शायद ऐसी स्थिति ना होती

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