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दुनिया मेरे आगेः स्त्री की छवि

कुछ साल पहले मैं प्रबंधन की पढ़ाई कर रही थी। राजस्थान के एक छोटे-से गांव में बना वह संस्थान शहरी शोर-शराबे से कोसों दूर था।

Author July 29, 2016 3:00 AM
(File Photo)

कुछ साल पहले मैं प्रबंधन की पढ़ाई कर रही थी। राजस्थान के एक छोटे-से गांव में बना वह संस्थान शहरी शोर-शराबे से कोसों दूर था। हॉस्टल में सफाई करने वाली, पौधों में पानी देने या खाना बनाने वाली सभी दीदियां मिलनसार और हंसमुख थीं। आमतौर पर उनकी बातों में राजस्थान की संस्कृति और लोक-विचार बातचीत का मुख्य मुद्दा होता था। अनेक रीतियों और कुरीतियों की जानकारी मुझे कभी अचरज में डाल देती तो कभी गुस्से में। हालांकि मैं शांत ही रहती थी।

एक दिन सुबह के नाश्ते के वक्त लड़कियों के बीच कुछ खुसर-फुसर चल रही थी। मेरी एक सहपाठी ने जब इसकी वजह बताई तो उसे सुन कर मैं बुरी तरह परेशान हो गई थी। यों तो इस मसले पर भारत भर में पुरुषों के मन में बैठे आग्रह छिपे नहीं रहे हैं, लेकिन मेरी उस सहपाठी ने राजस्थान और महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों में कुछ खास तबकों के बीच कायम एक परंपरा के बारे में बताया तो मैं भीतर तक हिल गई। विवाह के बाद लड़की की विदाई तब तक नहीं होती जब तक वह ‘कौमार्य परीक्षण’ में सफल नहीं हो जाती। इस परीक्षण में विवाह के बाद बिस्तर पर सफेद चादर बिछाई जाती है और सुबह में वर पक्ष के लोग उस चादर का निरीक्षण करते हैं। चादर पर खून के धब्बे लड़की को इस परीक्षण में सफल घोषित करते हैं और अगर ऐसा नहीं हुआ तो लड़की को चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है। इसके बाद या तो उस लड़की और उसके परिवार का बहिष्कार कर दिया जाता है या फिर उन्हें एक अन्य प्रथा से गुजरना होता है। इसमें मां-बाप समेत लड़की को निर्वस्त्र कर समाज के सामने कोड़े लगाए जाते हैं। इस तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ के बाद लड़की की विदाई हो जाती है।

दरअसल, हॉस्टल के मेस में लड़कियां इसी मसले पर बात कर रही थीं कि पड़ोस के गांव की एक लड़की ने इस प्रथा को मानने से साफ मना कर दिया था। यह सुनते ही मन में आया कि तुरंत जाकर उस लड़की को सलाम ठोंक आऊं, दिल से बधाई दूं। लेकिन सोचने लगी कि यहां एक लड़की ने विद्रोह किया है तो शायद स्थानीय समाज के सामने एक नई चीज हुई है और कुछ लोग ही सही, इस बारे में सोचना शुरू करेंगे। लेकिन क्या देश के दूसरे हिस्से में यह ‘सफेद चादर’ की मानसिकता अलग-अलग शक्ल में मौजूद नहीं है? सच यह है कि हम आज भी इस तरह की कुप्रथाओं की जद से बाहर नहीं निकल पाए हैं। आज भी लड़की के चरित्र को ‘कौमार्य’ की कसौटी से आंका जाता है। ऐसा केवल अनपढ़ और पिछड़े समाजों में नहीं है, बल्कि पढ़े-लिखे सभ्रांत दिखने वाले लोगों के दिमाग में भी ऐसे दकियानूसी विचार पलते-बढ़ते रहते हैं।
आज जब लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं, वहां पुरुष कुंठा को दर्शाने वाली ऐसी सोच क्या हमें जाहिल और पिछड़ी सोच वाला नहीं बताती है?

अव्वल तो कौमार्य परीक्षण स्त्री के व्यक्तित्व को दोयम बनाने वाली एक बेवकूफी भरी अवधारणा है। लेकिन स्त्रियों पर नियंत्रण करने के जिस हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जाता है, क्या पुरुषों या लड़कों के चरित्र निर्धारण की व्यवस्था हमारे समाज ने की है कभी? विज्ञान के इस युग में यह साफ हो चुका है कि जिस ‘हाइमिन’ या झिल्ली को पवित्रता का पर्याय माना जाता है, वह खेलने-कूदने, साइकिल चलाने, तैराकी या डांस करने वगैरह से फट सकती है। इस जानकारी से दूर लोगों की त्रासदी पर रहम खाया जा सकता है, लेकिन खुद को आधुनिक मानने और पढ़े-लिखे कहने वाले लोग भी इस कुंठा से भरे रहते हैं। जो लड़कियां इस तरह की प्रथा, आरोप या शक से गुजरती होंगी, उनकी भावनात्मक और मानसिक स्थिति की कल्पना से दिल दहल जाता है।

पितृसत्ता की जड़ें और इसकी मार इतनी गहरी है कि आज महानगरों की कुछ लड़कियां भी इससे पैदा होने वाली छवि की समस्या से डर कर खेल-कूद या किसी भी वजह से फट गए हाइमिन को फिर से पहले की हालत में लाने के लिए ‘हिमनोप्लास्टी’ नाम के आॅपरेशन का सहारा ले रही हैं। सवाल है कि क्या यह पुरुषवादी कुत्सित सोच नहीं है जो खुद को तराजू में तोले बगैर दूसरों का चरित्र निर्धारित करने निकल पड़ता है? एक झिल्ली को चरित्र का मानक बनाना किस सभ्य समाज में संभव हो सकता है? ऐसी खोखली सोच के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय इससे बचने के लिए आॅपरेशन का रास्ता ढूंढ़ लेना भी गलत है। अब जरूरत है ऐसे विषयों पर लोगों के दिमाग में भरे पूर्वग्रहों का इलाज किया जाए, वरना हमारी भावी पीढ़ी इसी तरह शर्मनाक ‘अग्नि परीक्षा’ देती रहेगी या फिर इस पुरुष व्यवस्था में चरित्रहीन होने के आरोप से बचने के लिए आॅपरेशन का सहारा ले रही होगी!

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