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अवैध की रिहाइश

दिल्ली में कुछ अवैध निर्माण पिछले दिनों ढहाए गए, कुछ और जगहों पर गिराए जाने हैं।

Bulldozer, Mano muntashir, jahangirpuri hinsa
सांकेतिक फोटो।

एक बार फिर शहरों में जगह-जगह उग आई अवैध कालोनियों को लेकर चर्चा गरम है। दिल्ली में कुछ अवैध निर्माण पिछले दिनों ढहाए गए, कुछ और जगहों पर गिराए जाने हैं। इसी कड़ी में सरोजिनी नगर इलाके में बनी दो सौ अवैध झुग्गियों को हटाने का आदेश दिया गया था। मगर एक याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की कि उसकी बोर्ड की परीक्षाएं शुरू हो रही हैं, इसलिए उसका घर टूटने से परीक्षा में बाधा उत्पन्न होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने वहां अवैध निर्माण हटाने पर रोक लगाते हुए कहा कि अवैध कालोनियां शहरी विकास में बड़ी बाधा हैं।

मगर लोगों को एकदम से उनकी रिहाइशों से बेदखल नहीं किया जा सकता। पहले उनके पुनर्वास का इंतजाम करना होगा। इसके लिए अदालत ने एक न्यायमित्र नियुक्त कर उनसे इस समस्या के हल के लिए सुझाव भी मांगे हैं। राज्य सरकारों को आदेश दिए गए हैं कि वे न्यायमित्र को सारे रिकार्ड उपलब्ध कराएं। दरअसल, अवैध निर्माण के चलते शहरों में पैदा होने वाली समस्याओं के लिए सरकारें ही मुख्य रूप से जिम्मेदार मानी जाती हैं। पर जब भी समस्या गंभीर होती है तो सरकारें अवैध निर्माण पर हथौड़ा चला कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती हैं। जबकि इसमें मानवीय पहलू यह भी है कि बिना पुनर्वास के किसी को बेघर नहीं किया जा सकता।

शहरों में अवैध निर्माण की समस्या बहुत पुरानी है। हर सरकार कभी न कभी ऐसे भवनों, कालोनियों को हटाने का अभियान चलाती रही है, इसमें कई बार उन्हें काफी संघर्ष भी करना पड़ा है। मगर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे और अतिक्रमण की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लग पाया है। बल्कि महानगरों में यह प्रवृत्ति पहले से कुछ बढ़ी हुई ही दिखती है। इसकी मुख्य वजह गांवों-कस्बों, छोटे शहरों से लोगों का पलायन और रोजी-रोजगार के लिए शहरों में सिर छिपाने के लिए खाली पड़ी सरकारी जमीन पर अपना तंबू तान लेना है।

ऐसा नहीं माना जा सकता कि जब ये बस्तियां बस रही होती हैं, तो नगर निकायों और प्रशासन की उन पर नजर नहीं जाती। सैकड़ों-हजारों की संख्या में किसी जगह घर या झुग्गियां रातोरात नहीं खड़ी हो जातीं। कई साल लगते हैं उन्हें बसने में। पहले वे कच्ची होती हैं, फिर धीरे-धीरे पक्की हो जाती हैं। फिर जब प्रशासन का हथौड़ा उन पर चलता है, तो विवाद स्वाभाविक रूप से उठता है। मामला अदालत में भी पहुंचता है। कुछ महीने पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा के खोड़ी वनक्षेत्र में बने हजारों घरों को हटाने का आदेश दिया था।

हकीकत यह भी है कि अवैध कालोनियां बसाने में राजनीतिक दलों के लोग भी शामिल होते हैं। राजनीतिक दल खुद अवैध कालोनियों को नियमित कराने के आश्वासन के साथ वहां बसे लोगों का वोट हासिल करने का प्रयास करते देखे जाते हैं। दिल्ली में यह काम बड़े पैमाने पर हुआ है। अब भी राजनीतिक दल ऐसे वादे करने से पीछे नहीं रहते। कई अवैध कालोनियों के तो बिना नियमित हुए ही सड़क, बिजली, पानी आदि की सुविधाएं पहुंचा दी गई हैं। उनमें राजनीतिक दलों से जुड़े कई लोग भी अपने लिए भूखंड चिह्नित कर लेते हैं। हरियाणा के खोड़ी में लोगों को बकायदा कुछ लोगों ने भूखंड बेचे थे। इस तरह अवैध निर्माण महानगरों में एक धंधे का रूप ले चुका है। जब तक निम्न आयवर्ग के लिए भवन निर्माण की योजनाएं सिरे नहीं चढ़ेंगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।

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