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हिंदी भावना भी संभावना भी

एक ऐसे दौर में जब लोकतंत्र से आगे का खुलापन बाजार के हिस्से है, तो भाषा और संस्कृति भी नए सिरे से परिभाषित हो रही है। इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रही है सूचना क्रांति का वाहक बनकर आई तकनीक, जो रोज अपडेट हो रही है, यूजर फ्रेंडली हो रही है।

हिंदी पखवाड़े के दौरान हिंदी पर विशेष लेख।

हिंदी भारत की ऐसी भाषा है जिसका न सिर्फ प्रसार भौगोलिक सीमाओं से आगे जाता है बल्कि इसने तारीखी तौर पर हिंदी जनमानस में ‘नवजागरण’ के संस्कार गढ़े हैं। एक ऐसे दौर में जब समाज, संस्कृति से लेकर शिक्षा और राजनीति तक बाजार के दबाव में नए चारित्रिक संस्कार में ढल रहे हैं, यह देखना खासा दिलचस्प है कि हिंदी भाषा की दुनिया नई सूचना तकनीक और नए कुबेरी तकाजों के बीच किस तरह बदल रही है। हिंदी के इस्तेमाल और उसके सामर्थ्य का नए समय में मूल्यांकन इस लिहाज से भी अहम है कि यह कहीं से भी हमें निराश नहीं करता बल्कि रचनात्मक तौर पर हिंदी की नई दुनिया से हमें अवगत कराते हैं। हिंदी की इस नई दुनिया की यात्रा मृणाल वल्लरी और प्रेम प्रकाश के साथ।

कई मीडिया संस्थानों और कारोबारी गतिविधियों से जुड़ीं कम्युनिकेशन गुरु नैंसी ड्यूरेट अपने भाषणों में अकसर यह बात दोहराती हैं कि भाषा का सबसे ज्यादा दोहन समाज में नहीं, बाजार में होता है। उनके मुताबिक बाजार की निर्मिति ही ऐसी है कि यहां भाषा महज संवाद या अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल यहां एक उपकरण की तरह होता है।

एक ऐसे दौर में जब लोकतंत्र से आगे का खुलापन बाजार के हिस्से है, तो भाषा और संस्कृति भी नए सिरे से परिभाषित हो रही है। इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रही है सूचना क्रांति का वाहक बनकर आई तकनीक, जो रोज अपडेट हो रही है, यूजर फ्रेंडली हो रही है। हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री अनामिका ‘भूमंडलीकरण’ के लिए ‘भूमंडीकरण’ शब्द का इस्तेमाल करती हैं।

इस भूमंडीकरण ने जिस तरह नागरिक को महज एक उपभोक्ता के रूप में तब्दील कर दिया, वह एक बड़ी परिघटना है। ऐसे में एक ऐसी भाषा जो आज भी अपनी आंचलिकता के लिए मचलती है, परंपरा और संस्कृति में अपनी देशज जड़ें देखती है, उसके ऊपर बाजार का प्रभाव और दबाव बहुत ज्यादा है। लिहाजा, बात अगर हिंदी की करें तो हमें सबसे पहले उस परिवेश और परिदृश्य को समझना और स्वीकार करना होगा, जिसकी जद में आज भाषा और अभिव्यक्ति का हर संभावित अभ्यास है। ऐसे में अगर कोई तारीख के सौ-पचास साल पुराने पन्ने भर पलटकर हिंदी के विकास की युक्ति समझ-समझा रहा हो, तो वह वास्तविकताओं से कितनी दूर खड़ा है, समझा जा सकता है।

साल दर साल एक ही विलाप
अपने देश में हर साल 14 सितंबर से शुरू होने वाले हिंदी पखवाड़े के दौरान यह रूदन-विलाप चलता रहता है कि हिंदी पत्रिकाएं लगातार बंद हो रही हैं, साहित्य के पहले की तरह पाठक नहीं रहे या कि हमारी नई पीढ़ी अपने भाषाई संस्कारों में किस कदर अपने जातीय बोध और इतिहास से दूर है। जिस हिंदी के खाते में डॉ. रामविलास शर्मा जैसे विद्वान आलोचक ने ‘नवजागरण’ जैसा यश लिखा, आज उस भाषा से जुड़ा विद्वत समाज अपने आसपास की हलचलों को देखने-परखने के बजाए इतिहास के किसी पुराने बहाव में डूबकर अपनी बौद्धिकता को तर-बतर करने में लगा है।

ज्यादा पीछे लौटने की जरूरत नहीं, महज पिछले पांच सालों में हिंदी में संभावनाओं से भरे इतने बदलाव रेखांकित हुए हैं कि कोई भी इनके बारे में जानकर दंग रह जाए। अगर हिंदी के तकाजों और सरोकारों की बात करें तो इस भाषा के पास अब भी वो सामर्थ्य है जो नए समय में बने ढांचे के लिए तैयार है। यह भी कि यह सामर्थ्य अब सर्वोत्सर्ग से आगे स्वावलंबन और कुबेरी अर्जन का माद्दा भी रखता है।

विकल्प नया, मंच नया
पिछले सालों में हिंदी के ढेरों लोकप्रिय मंच तैयार हुए। इनके बनने का कारण यही था कि हिंदी के पारंपरिक गढ़ इन्हें काम नहीं करने दे रहे थे। न ढंग से खबरें दे रहे थे, न विचार दे रहे थे और न साहित्य दे रहे थे। आज आलम यह है कि अचानक से कोई यू-ट्यूब चैनल हमें सत्यजीत रे भी समझा देता है और लगे हाथ यह किस्सा भी साझा कर देता है कि कैसे फणीश्वरनाथ रेणु ने ‘तीसरी कसम’ के बनने के दौरान राज कपूर के व्यवसायी प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

इसी बीच, बिहार की बाढ़ और आकाशीय बिजली गिरने से मरने वालों का आंकड़ा भी इंटरनेट पर तैरने लगता है तो उसी क्षण रिया और कंगना के जरिए सूचना के जरूरी माध्यमों को किस कदर खत्म करने की जो कवायद चल रही है, यह आगाह भी हमारे स्मार्टफोन के एक कोने में नए नोटिफिकेशन के जरिए हमारा ध्यान खींच रहा होता है।

बड़े और दिलचस्प प्रयोग
सिर्फ भाषा ही नहीं संस्कृति के कई क्षेत्रों में आज बड़े और दिलचस्प प्रयोग हो रहे हैं। सिनेमा एक महंगा माध्यम है। पर अच्छा और सार्थक सिनेमा बनाने वालों के लिए सामूहिक फंडिंग एक नए विकल्प के तौर पर सामने आया है। देश ने ताजा-ताजा उदाहरण देखा है कि पहले एक संगठन और बाद में बनी राजनीतिक पार्टी ने दावा किया कि हम लोकतंत्र को बचाएंगे। नए तरीके से बात कही तो लोगों ने उसकी झोली पैसों से भर दी।

जिस देश में लोग लोकतंत्र को बचाने के लिए पैसे देते हैं, वहां अब सीधा-सीधा सवाल है कि हिंदी के नाम पर आप देंगे क्या? जवाब यह कि जैसे ही आप नए समय की जरूरतों, उसके सरोकारों, मानसिकता के साथ योग्यता दिखाएंगे आपकी पूरी जमीन खाली है। पर हमारे रचनात्मक पुरुषार्थ में शायद थोड़ी कमी रही। यही वजह है कि इस खाली जमीन पर तो चेतन भगत जैसे लोग अपनी इमारत बना बैठे हैं।

जब कहा जा रहा है कि यह देश 18 से 35 वालों का हो गया है तो उसे देने के लिए आपके पास नया क्या है? आप भाषण में कहेंगे आइटी की दुनिया। आइटी की दुनिया के पास कहानी नहीं है क्या, उसके पास प्रेम नहीं है क्या। उसका औसत अंग्रेजी संस्करण लोग पढ़ने को तैयार हैं तो आप बढ़िया वाला लेकर आइए, गुणवत्ता है तो लोग फेसबुक पोस्ट तक पैसे देकर पढ़ने को तैयार हैं। अलबत्ता इस दौरान हिंदी की तरफ से जो भी अच्छा खिलाड़ी आया वो शानदार पारी खेल कर गया।

बाजार और हिंदी
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसद की मातृभाषा हिंदी है। हिंदी को दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले अन्य भारतीयों को मिला लिया जाए तो देश के लगभग 75 फीसद लोग हिंदी बोल सकते हैं। भारत के इन 75 फीसद हिंदी भाषियों सहित पूरी दुनिया में तकरीबन 80 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो इसे बोल या समझ सकते हैं। बाजार के लिहाज से हिंदी एक ऐसी दुनिया है, जहां बड़ी आबादी तो रहती ही है, उसमें परंपरा और संस्कृति का एक बड़ा मेल भी है।

इसलिए बाजार में हिंदी के सामने किसी और भाषा का आकर्षण रचने से ज्यादा उपक्रम हिंदी और हिंदीभाषियों को ही साधने की चल रही है। आलम यह है कि दो दशक पहले तक ग्रीटिंग कार्ड पर हिंदी के संदेश आपवादिक तौर पर छपते थे। आज प्रसाद से लेकर दुष्यंत और नीरज की पंक्तियों के साथ शुभकामनाओं का बाजार आनलाइन से लेकर मॉल-मोहल्ले तक सजा है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत में करीब 40 करोड़ लोगों का मध्यवर्गीय उपभोक्ता बाजार है, जो दुनिया के बहुत सारे देशों की आबादी से कहीं अधिक बड़ा है।

विज्ञापनों से लेकर नए रचनात्मक प्रयोगों तक बाजार के पूरे चलन में हिंदी के बढ़े प्रभाव में अगर कोई उस हिंदी का भविष्य देखना चाहेगा, जो राजभाषा है या भाषा-व्याकरण के अनुशासन के बोझ से लदी है तो उसे निराशा होगी। यह प्रसार और रुतबा तो उस हिंदी का है, जिसकी ताकत को जैसे कभी लोक कवियों ने पहचाना था, आज एड गुरु और अभिव्यक्ति के प्रयोगकर्ता पहचान रहे हैं।

यह हिंदी उस नए स्वभाव-संस्कार की हिंदी है, जो भारत और भारत से बाहर एक वैश्विक हिंदी समाज के रूप में लगातार आकार लेता जा रहा है। इस विश्व समाज से बाहर अपनी-अपनी छतरी और पुराने तिरपाल ओढ़े वे लोग ही खड़े हैं, जो बात तो हिंदी की करते हैं पर बदलाव और तकनीक के बीच कैसे कोई भाषा या बोली पुल-पुलिया के तौर पर काम करती हैं, वे इस भाषाई सामर्थ्य को या तो समझते नहीं या फिर अपने किसी पूर्वग्रह के कारण इसे समझना नहीं चाहते हैं।

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