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यूरोप से अफगानों की मुश्किल घर वापसी

जर्मनी में अफगान शरणार्थियों को वापस भेजने के फैसले का विरोध हो रहा है। विरोधियों का कहना है कि आए दिन अफगानिस्तान में हमले हो रहे हैं, तो फिर इन शरणार्थियों को क्यों वापस भेजा जा रहा है। तालिबान का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है कि इस्लामिक स्टेट ने भी इराक और सीरिया में अपनी जमीन खोने के बाद अफगानिस्तान को अपना नया ठिकाना बनाया है।

Author October 13, 2018 8:37 PM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एपी फाइल फोटो)

यूरोप के अलग-अलग देशों से वापस अफगानिस्तान भेजे जा रहे शरणार्थी आए दिन सुर्खियों में रहते हैं। इस साल अब तक पांच सौ अफगान लोगों को उनके देश भेजा जा चुका है और इस साल के आखिर तक यह आंकड़ा 800 तक पहुंच सकता है। मानवाधिकार संस्थाएं इसका विरोध कर रही हैं, क्योंकि अफगानिस्तान में आज भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं जिनसे बचकर ये लोग यूरोप आए थे। लेकिन यूरोप में शरणार्थी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा हैं और सरकारों पर भी धुर दक्षिणपंथियों का दबाब है। सत्ताधारी पार्टियां अपना जनाधार खो रही हैं और ऐसा लगता है कि वे अपना जनाधार बचाने के लिए शरणार्थियों से बस पीछा छुड़ाना चाहती हैं। खासकर जर्मनी में अफगान शरणार्थियों को वापस भेजने के फैसले का विरोध हो रहा है। विरोधियों का कहना है कि आए दिन अफगानिस्तान में हमले हो रहे हैं, तो फिर इन शरणार्थियों को क्यों वापस भेजा जा रहा है। तालिबान का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है कि इस्लामिक स्टेट ने भी इराक और सीरिया में अपनी जमीन खोने के बाद अफगानिस्तान को अपना नया ठिकाना बनाया है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच साल के दौरान अफगानिस्तान में हिंसा का शिकार होने वाले आम लोगों की संख्या हर साल ढाई हजार से ज्यादा रही है। जबकि इस दौरान घायलों का आंकड़ा भी हमेशा पांच हजार के पार रहा है। पिछले दस साल के दौरान अफगानिस्तान में हालात बेहतर नहीं, बल्कि बदतर हुए हैं। कई मानवाधिकार कार्यकर्ता सवाल उठाते हैं कि इन हालात में अफगान शरणार्थियों को वापस भेजना क्या उन्हें हिंसा में झोंकने के बराबर नहीं है। पिछले दिनों ही 17 लोगों के एक और समूह को जर्मनी से अफगानिस्तान वापस भेजा गया। दिसंबर 2016 से यह सोलवहां जत्था है जिसे जर्मनी से डिपोर्ट किया गया है। ये सभी ऐसे लोग हैं जिनके शरण के आवेदन खारिज हो चुके हैं।

अफगानिस्तान आज से नहीं, बल्कि कई दशक से राजनीतिक रूप से ऐसे ही डांवाडोल है। इसलिए यूरोप के विभिन्न देशों में वहां से लंबे समय से शरणार्थी आते रहे हैं, जिनमें से बहुत से यहां पूरी तरह रच बस गए हैं। मानवीय आधार पर यूरोप की सरकारें ऐसे लोगों की तरफ मदद का हाथ बढ़ाती रही हैं। लेकिन 2015 के शरणार्थी संकट ने सब कुछ बदल दिया। सीरिया में कई साल से जारी युद्ध ने लोगों को जान बचाकर भागने के लिए मजबूर किया। इनमें से लाखों लोग रातों रात यूरोप के सफर पर निकल पड़े। जर्मनी समेत यूरोप के कई देशों ने शुरू में इन लोगों का खुले दिल से स्वागत किया। लेकिन जैसे जैसे आने वालों की संख्या बढ़ती गई, उस पर सियासत भी गर्म होती गई। अब ये हालात हैं कि शरणार्थियों का मुद्दा यूरोप के लिए गले में अटकी एक हड्डी बन गया है, जिसे ना निगलते बनता है और ना ही उगलते।

जर्मन सरकार ने अफगानिस्तान को 2018 में आर्थिक विकास के लिए 23.4 करोड़ यूरो के पैकेज की घोषणा की है। इस मदद को वहां मुख्य तौर पर नौकरियों के अवसर पैदा करने पर खर्च किया जाएगा। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में बिजली और पानी की आपूर्ति बेहतर बनाना, महिलाओं का सशक्तिकरण और सुशासन को भी इस आर्थिक पैकेज के उद्देश्यों में शामिल किया गया है। जर्मनी ने 2001 से अब तक अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण पर 4.6 अरब यूरो से ज्यादा की रकम खर्च की है। उद्देश्य अफगानिस्तान में हालात बेहतर करना है ताकि वहां से लोग यूरोप की तरफ आने के लिए मजबूर ना हों। सरकारी मुलाकातों और बयानों में तो यह बात सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन जमीन पर इसे उतारना कितना मुश्किल है, इसकी गवाही अफगानिस्तान के मौजूदा हालात देते हैं।

एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि अफगानिस्तान में 75 हजार महिलाओं के लिए रोजगार पैदा करने के लिए चलाई गई अमेरिकी योजना किस कदर विफल रही। अमेरिका ने तीन साल के दौरान इस योजना पर लगभग नौ करोड़ यूरो खर्च किए लेकिन आखिर में नतीजा ‘खोदा पहाड़ निकला चूहा’ रहा। इरादा जहां 75 हजार महिलाओं के रोजगार का था, वहीं आखिर में सिर्फ 55 महिलाओं के स्थायी रोजगार का इंतजाम हो पाया। इससे पता चलता है कि अफगानिस्तान में बेहतरी और पुनर्निर्माण का काम कितना चुनौतीपूर्ण है। दुनिया के दस सबसे भ्रष्ट देशों में शामिल अफगानिस्तान का तंत्र अरबों डॉलर डकार चुका है।

मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन अफगान लोगों का ब्यौरा दर्ज किया है जिन्हें जर्मनी, नीदरलैंड्स, नॉर्वे और स्वीडन से वापस भेजा गया है। संस्था का कहना है कि कुछ लोग तो अफगानिस्तान में वापस जाने के बाद मारे जा चुके हैं जबकि बाकी लोग भी लगातार डर में जीते हैं। इन लोगों को समझ ही नहीं आ रहा है कि वे अफगानिस्तान में क्या करें। बेशक अफगानिस्तान उनका अपना देश है, लेकिन इनमें से कई लोग ऐसे भी हैं जिनके लिए यह एकदम नया देश है। इसकी वजह यह है कि जब वे यूरोप गए थे तो बहुत छोटे थे। वहीं उन्होंने होश संभाला और वे उसी को अपना घर मानने लगे थे। अब बदले हालात से तालमेल बिठाना उनके लिए मुसीबत बन रहा है।

इन्हीं बदले हालात ने यूरोप को भी बदल दिया है। चंद साल पहले तक मानवीय मूल्यों और सरोकारों के लिए दुनिया भर में जिन देशों की आवाज सबसे बुलंद होती थी, वहीं शरणार्थियों के मुद्दे पर सियासी कुचक्र का शिकार हैं। शरणार्थियों के खिलाफ धुर दक्षिणपंथियों की आवाजें लगातार बढ़ती जा रही हैं और इसी से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ चढ़ रहा है। खुद को उदारवादी समझने वाली पार्टियां भी दक्षिणपंथ की तरफ झुक रही हैं। और सियासी पार्टियों के लिए सत्ता से जरूरी कुछ नहीं। जो पार्टियां अपने मूल्यों से समझौता नहीं कर रही हैं, उन्हें जनाधार गंवाना पड़ रहा है। इसीलिए ज्यादातर पार्टियां अब शरणार्थियों के खिलाफ या तो मुखर हैं या फिर चुप। उनके समर्थन में बोलने वालों की संख्या घट रही है। इसीलिए विरोध की चंद आवाजों के बावजूद अफगान लोगों को वापस उनके देश भेजा जा रहा है।

(लेखक डॉयचे वेले, बॉन, जर्मनी में पत्रकार)

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