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जीएसटी का बोझ

जीएसटी क्षतिपूर्ति व्यवस्था की अवधि बुधवार को खत्म हो रही है।

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पिछले साल फरवरी के मुकाबले जीएसटी कलेक्शन में 18 फीसदी का इजाफा हुआ है।(सांकेतिक फोटो)

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर और दायरा बढ़ाते हुए जीएसटी परिषद ने खानपान और रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली कई चीजों को कर दायरे में लाकर आम लोगों को बड़ा झटका दे दिया। जबकि कैसीनो, घुड़दौड़, आनलाइन गेमिंग और लाटरी पर अट्ठाईस फीसद कर लगाने के फैसले को यह कहते हुए टाल दिया कि संबंधित पक्षों के साथ अभी और विचार-विमर्श करने की जरूरत है। परिषद की सैंतालीसवीं बैठक में दरों को तार्किक बनाने, और वस्तुओं को इसके दायरे में लाने और जीएसटी क्षतिपूर्ति व्यवस्था को आगे बढ़ाने की राज्यों की मांग पर विचार करना था।

जीएसटी क्षतिपूर्ति व्यवस्था की अवधि बुधवार को खत्म हो रही है। लेकिन इसे आगे बढ़ाने पर तो कोई फैसला नहीं हो पाया, पर इतना जरूर हुआ कि डिब्बाबंद मांस-मछली, पैकेट में आने वाले दही, छाछ, पनीर, शहद, पापड़, गेहूं, सोयाबीन, मोटे अनाज, गुड़, मुरमुरे जैसे साधारण खाद्य पदार्थों को पांच फीसद जीएसटी के दायरे में रख दिया गया। इन चीजों को कर दायरे में लाने की सिफारिश समिति के ही मंत्रियों के एक समूह ने की थी। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि आम लोगों को खानपान की सामान्य चीजों पर भी अब खासा खर्च करना होगा। वैसे ही महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ रखी है, ऐसे में दही, छाछ, गेहूं जैसी चीजों पर भी पांच फीसद जीएसटी लगाने को कैसे तर्कसंगत ठहराया जा सकता है?

दरअसल, स्थिति यह है कि जीएसटी को लेकर अभी भी ज्यादातर राज्य सहज नहीं हैं। आर्थिक हालात का रोना चल ही रहा है। राज्यों की शिकायत है कि कई चीजों को कर दायरे से बाहर रखने की वजह से उन्हें राजस्व नहीं मिल पा रहा है। इसलिए अब उन चीजों को भी जीएसटी दायरे में कर दिया गया जो गरीब तबके के भी इस्तेमाल वाली हैं, जैसे मुरमुरा, गुड़। इसके अलावा चैक जारी करने पर बैंक जो शुल्क वसूलते हैं, उस पर अब जीएसटी अठारह फीसद कर दिया गया है। गौर करने लायक यह है कि करोड़ों लोग बैंक चैकों का उपयोग करते हैं।

ऐसे में राजस्व जुटाने का यह बड़ा जरिया साबित होगा। बच्चों की पढ़ाई में काम आने वाले एटलस, नक्शों को भी बारह फीसद कर दायरे में ला दिया है। इसी तरह कई सेवाओं पर भी परिषद ने कैंची चला दी है। जैसे एक हजार रुपए रोजाना से कम किराए वाले होटल के कमरे पर जीएसटी बढ़ा कर बारह फीसद कर दिया है। इससे भी छोटा तबका ही प्रभावित होगा। कम आय वाले लोग जो जरूरत पर होटल में ठहरते हैं, उन पर यह बोझ कम नहीं है। इतनी ही नहीं, हर लेखन और छपाई में इस्तेमाल होने वाली स्याही, एलईडी लाइट और लैंप, शोधित चमड़ा, सौर गीजर आदि पर करों की दर में संशोधन का सुझाव दिया है।

हैरानी की बात यह है कि आनलाइन गेमिंग, लाटरी, घुड़दौड़ जैसे मुद्दों पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। इन सभी पर जुए और सट्टे के बराबर अट्ठाईस फीसद जीएसटी लगाने की उम्मीद की जा रही थी। मंत्री-समूह ने इसकी सिफारिश भी की थी। यह राजस्व का बड़ा स्रोत भी बनता। अभी आनलाइन गेमिंग पर अठारह फीसद कर लगता है। जीएसटी व्यवस्था को लागू हुए पांच साल हो गए हैं।

लेकिन इन पांच सालों में ज्यादातर राज्य कर दरों और क्षतिपूर्ति व्यवस्था को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। वैसे भी पिछले दो सालों में महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। कई राज्यों की माली हालत तो बेहद खराब है। बेरोजगारी के संकट ने लोगों की आय एक तरह से खत्म कर दी है। ऐसे में उन चीजों को जीएसटी के दायरे में फिलहाल लाने से बचा जा सकता था जो गरीब की थाली से जुड़ी हैं।

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