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जीएसटी और चुनौतियां

वायदे पर पूरी तरह खरा नहीं उतर रहा है तो 2022 के बाद क्या होगा जब क्षतिपूर्ति देने की जिम्मेदारी से केंद्र मुक्त हो जाएगा।

सांकेतिक फोटो।

सुशील कुमार सिंह

राज्य जीएसटी को महंगाई का भी कारण मानते हैं। सवाल यह भी है कि एक देश-एक कर वाला जीएसटी जब अभी राज्यों से किए गए वायदे पर पूरी तरह खरा नहीं उतर रहा है तो 2022 के बाद क्या होगा जब क्षतिपूर्ति देने की जिम्मेदारी से केंद्र मुक्त हो जाएगा।

भारतीय राजनीति के सामने सुशासन की दिशा में अभी विविध प्रकार की चुनौतियों की भरमार है। मौजूदा समय में आर्थिक चुनौतियां सबसे अधिक विकराल रूप धारण किए हुए हैं। इन्हें पटरी पर लाने की कवायदे जारी हैं। मगर इन सबके बीच सुखद पक्ष यह है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में उगाही की दर बढ़त बनाए हुए है। इससे यह तो पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियां तुलनात्मक बेहतर हो रही हैं। मगर रिजर्व बैंक की ताजा समीक्षा रिपोर्ट पर गौर करें तो महंगाई अभी एक साल पीछा नहीं छोड़ने वाली। पर विकास प्राथमिकता में रहेगा। वित्त बगैर ऊर्जा नहीं और ऊर्जा बगैर कुछ नहीं, यह नारा दशकों पहले कहीं पढ़ने को मिला था।

आज के दौर में यह कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। सुशासन तभी संभव कहा जाएगा जब जनहित की समस्याएं निर्मूल हों, समावेशी विकास की राह हो और शांति व खुशहाली का वातावरण हो। और यह तब हो सकता है जब सुशासन हो और सुशासन तभी होगा जब समुचित वित्त होगा। इसी धारा में एक व्यवस्था अप्रत्यक्ष कर जीएसटी है जो चार साल पहले आर्थिक इंजन के तौर पर देश में लागू की गई थी। सुशासन की दृष्टि से जीएसटी को देखा जाए तो यह बल इकट्ठा करने का एक आर्थिक परिवर्तन था। मगर सफलता कितनी मिली, यह पड़ताल से पता चलेगा। हालांकि 24 जुलाई 1991 को जब उदारीकरण एक बड़े नीतिगत आर्थिक बदलाव का स्वरूप लेकर प्रकट हुआ था तब उम्मीदें भी बहुत थीं और कहना गलत न होगा कि तीन दशक पुरानी इस व्यवस्था ने निराश नहीं किया, बल्कि इसी दौर के बीच सुशासन को 1992 में सांस लेने का अवसर मिला, जिसकी धड़कनें कमोबेश आज सुनी और समझी जा सकती हैं।

कई सारे अप्रत्यक्ष करों को समाहित कर एक जुलाई 2017 को एक नया आर्थिक कानून वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुआ था। इस एकल कर व्यवस्था से राज्यों को होने वाले राजस्व कर की भरपाई के लिए पांच साल तक मुआवजा देने का प्रावधान भी इसमें शामिल था। इसके लिए एक कोष भी बनाया गया जिसका संग्रह पंद्रह फीसद तक के उपकर (सेस) से होता है। नियम संगतता की दृष्टि से जीएसटी के उक्त संदर्भ सुशासन की समग्रता को परिभाषित करते हैं। मगर वक्त के साथ व्याप्त कठिनाइयों ने इस पर सवाल भी खड़े किए हैं।

गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने से पहले ही केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आपस में इस बात पर सहमति का प्रयास हुआ था कि इसके माध्यम से प्राप्त राजस्व में केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व का बंटवारा किस तरह किया जाएगा। गौरतलब है कि पहले इस तरह के राजस्व का वितरण वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया जाता था।

जीएसटी का एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ यह रहा है कि इस प्रणाली के लागू होने से कई राज्य इस आशंका से घिर गए कि इसके लागू होने से उनकी आमदनी घट सकती है। यह बात काफी हद तक सही भी थी। हालांकि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए केंद्र ने राज्यों को यह भरोसा दिलाया था कि वर्ष 2022 तक उनके नुकसान की भरपाई की जाएगी। मगर पड़ताल बताती है कि बकाया निपटाने के मामले में केंद्र सरकार पूरी तरह खरी नहीं उतर पा रही है और यह सुशासन के नजरिए से यह समुचित नहीं है। समझने वाली बात यह भी है कि पिछले साल दो लाख पैंतीस हजार करोड़ रुपए की राजस्व कमी पर केंद्र सरकार ने राज्यों को सुझाव दिया था कि वे इस कमी को पूरा करने के लिए उधार लें। लेकिन राज्यों में इस पर सहमति का अभाव देखा जा सकता है।

इसी दौरान सरकार ने दो और विकल्प सुझाए थे। पहला यह कि राजस्व की भरपाई के लिए राज्य सरकारें कुल राजस्व का आधा उधार उठाएंगी और उसके मूल और ब्याज दोनों की अदायगी भविष्य में विलासिता वाली वस्तुओं पर लगाए जाने वाले क्षतिपूर्ति उपकर से की जाएगी। दूसरा विकल्प यह था कि राज्य सरकारें पूरे नुकसान की राशि को उधार लेंगी। लेकिन उस सूरत में मूल की अदायगी क्षतिपूर्ति उपकर से की जाएगी, मगर ब्याज के बड़े हिस्से की अदायगी राज्यों को स्वयं करनी होगी। पहले विकल्प को भाजपा शासित और उनके गठबंधन वाली सरकारों ने तो स्वीकार किया, लेकिन बाकी राज्यों ने इसे खारिज किया। केंद्र-राज्य संबंधों की दृष्टि से यदि सुशासन को तराजू के दोनों पलड़ों पर रखा जाए तो यह संघीय ढांचे पर बराबर उतरता दिखाई नहीं देता।

वित्तीय संबंधों के मामले में संघ और राज्यों के बीच समय-समय पर मुश्किलें आती रही हैं। सहकारी संघवाद के अनुकूल ढांचे की जब भी बात होती है तो यह भरोसा बढ़ाने का प्रयास होता है कि समरसता का विकास हो। आरबीआइ के पूर्व गर्वनर डी. सुब्बाराव ने कहा था कि जिस प्रकार देश का आर्थिक केंद्र राज्यों की ओर स्थानांतरित हो रहा है, उसे देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में भारत का आर्थिक विकास सहकारी संघवाद पर टिका देखा जा सकता है। गौरतलब है कि संघवाद अंग्रेजी शब्द फेडरेलिज्म का हिंदी अनुवाद है और इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई है जिसका अर्थ समझौता या अनुबंध है। जीएसटी संघ और राज्य के बीच एक ऐसा अनुबंध है जिसे आर्थिक रूप से सहकारी संघवाद कहा जा सकता है।

मगर जब अनुबंध पूरे न पड़ें तो विवाद का होना लाजिमी है और सुशासन को यहीं पर ठेस पहुंचती है। वित्तीय लेन-देन के मामले में अभी भी समस्या समाधान पूरी तरह हुआ नहीं है। जुलाई 2017 में जब जीएसटी आया था तब उस महीने का राजस्व संग्रह पनचानवे हजार करोड़ के आसपास था। धीरे-धीरे गिरावट के साथ यह अस्सी हजार करोड़ पर भी पहुंचा था और यह उतार-चढ़ाव चलता रहा। पिछले अड़तालीस महीनों में बहुत कम मौके रहे जब जीएसटी संग्रह एक लाख करोड़ रुपए के ऊपर गया। महामारी के चलते अप्रैल 2020 में इसका संग्रह बत्तीस हजार करोड़ पर आकर सिमट गया था, जबकि दूसरी लहर के बीच अप्रैल 2021 में यह आंकड़ा एक लाख इकतालीस हजार करोड़ रुपए का है जो पूरे चार साल में सर्वाधिक है। हालांकि बीते आठ महीने से जीएसटी का संग्रह एक लाख करोड़ से अधिक का बना हुआ है। जब जीएसटी शुरू हुआ था तब करदाता छियासठ लाख से थोड़े ही अधिक थे, लेकिन आज यह संख्या सवा करोड़ से अधिक है। जाहिर है अप्रत्यक्ष कर के साथ कई तकनीकी समस्याएं हो सकती हैं, पर जीएसटी संग्रह का लगातार बढ़ना और करदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि इसके सुशासनिक पक्ष की मजबूती को इंगित करता है।

संघ और राज्य के वित्तीय मामलों में संवैधानिक प्रावधानों को भी संविधान में देखा जा सकता है। जीएसटी एक राष्ट्र-एक कर के सिद्धांत पर आधारित है जो एकल अप्रत्यक्ष कर संग्रह व्यवस्था है। इसमें संघ और राज्य आधी-आधी हिस्सेदारी रखते हैं। जीएसटी केंद्र और राज्यों के बीच झगड़े की एक बड़ी वजह उसका एकाधिकार होना भी है। क्षतिपूर्ति न होने के मामले में तो राज्य केंद्र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात कह चुके हैं। राज्य जीएसटी को महंगाई का भी कारण मानते हैं। सवाल यह भी है कि एक देश-एक कर वाला जीएसटी जब अभी राज्यों से किए गए वायदे पर पूरी तरह खरा नहीं उतर रहा है तो 2022 के बाद क्या होगा जब क्षतिपूर्ति देने की जिम्मेदारी से केंद्र मुक्त हो जाएगा।

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