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रास्ता नया तय कर लिया

‘आजाद फाउंडेशन’ महिलाओं को गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण देता है और ‘सखा’ उन्हें नौकरी। सखा कैब सर्विस केवल महिलाओं के लिए है। आजाद फाउंडेशन जिन शहरों में काम करता है वहां करीब 400 से ज्यादा महिलाएं प्रशिक्षित चालक के रूप में काम कर रही हैं। ‘

Author June 20, 2019 1:31 AM
एक्टर आमिर खान के साथ मीना

मीना

रात का अंधेरा, सूनी सड़क, स्टेयरिंग पर हाथ और पीछे बैठी अनजान सवारी। महिला कैब ड्राइवर अब शहरों के लिए अजूबा नहीं रही हैं। अपने पांवों पर खड़े होने के लिए बहुत सी हिम्मती महिलाओं ने इस पेशे को चुना है। कैब चलाने जैसे चुनौती भरे पेशे को अपनाने वाली महिलाओं से बातचीत।

मुझे पहली बुकिंग रात दो बजे की मिली थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे करूंगी। मैं कैसे रात में बाहर जाऊंगी। वापस कैसे आऊंगी, लेकिन हिम्मत के साथ किया तो सब हो गया। मेरे पति ने मुझे गाड़ी तक छोड़ा। रात का वो सूनसान माहौल पहली बार देखा। रात की वो पहली ड्यूटी करके जो सुकून मिला उसे बयां नहीं कर सकती। ऐसा लग रहा था कि आज मैंने दुनिया जीत ली। ये कहना है जयपुर में ‘सखा’ कैब सर्विस के साथ काम करने वाली मधु का। 29 साल की मधु का कहना है कि एक समय था जब मैं रात के सूनेपन से डरती थी और आज का समय है कि मुझे रात में ही ड्यूटी करना पसंद है। रात में सड़कें खाली होती हैं और गाड़ी एकदम मस्त चलती है। मधु कहती हैं कि मैं कभी घर से बाहर नहीं निकलती थी और रात के समय तो बिल्कुल नहीं। और आज का समय है कि मैं जयपुर के अलावा आगरा और दिल्ली भी सवारी लेकर जाती हूं। मधु का कहना है कि हर काम की कुछ चुनौतियां होती हैं। मेरी भी हैं। रात में काम करने पर नींद खराब होती है। इस वजह से मैं अपने बच्चों से अलग कमरे में सोती हूं। मेरे लिए पहले नौकरी है फिर नींद। उनके लिए कैब चलाना सिर्फ नौकरी नहीं है बल्कि खुद की पहचान बनाने का जरिया है।

‘आजाद फाउंडेशन’ महिलाओं को गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण देता है और ‘सखा’ उन्हें नौकरी। सखा कैब सर्विस केवल महिलाओं के लिए है। आजाद फाउंडेशन जिन शहरों में काम करता है वहां करीब 400 से ज्यादा महिलाएं प्रशिक्षित चालक के रूप में काम कर रही हैं। ‘सखा’ कंसल्टिंग विंग की आॅपरेशन प्रमुख शीबा का कहना है कि पुरुष प्रधान समाज में आम धारणा है कि महिलाएं सुरक्षित ड्राइव नहीं करती बल्कि सच ये है कि लड़कियां ट्रैफिक के सभी नियमों को मानती हैं और सुरक्षित गाड़ी चलाती हैं। शीबा का कहना है कि हमारी कैब में पैनिक बटन होता है। इसके अलावा 24 घंटे चलने वाला ऐप। महिलाएं जब भी किसी दिक्कत में होती हैं तो इस बटन का प्रयोग कर सकती हैं। हमारे यहां लगभग 90 फीसद महिलाएं रात में गाड़ी चलाना पसंद करती हैं। हम महिलाओं की काउंसलिंग करते हैं। रात में कैब चलाने के लिए शुरू के कुछ दिन उनके साथ किसी वरिष्ठ चालक को भेजते हैं। जब उनमें आत्मविश्वास आ जाता है तब उन्हें गाड़ी देते हैं। दूसरा, लोगों को लगता है कि रात में गाड़ी चलाने में खतरा है लेकिन सच ये है कि खतरा केवल घर से बाहर नहीं होता बल्कि घर में भी होता है।

‘मेरे बच्चों को गर्व है कि मैं ड्राइवर हूं’

‘सखा’ के साथ गीता 2013 से काम कर रही हैं। वे कहती हैं कि हमारे यहां कंपनी से जो संपर्क मिलते हैं, उन्हीं के लिए हम गाड़ी चलाते हैं। जो भी ड्यूटी होती है वो एक दिन पहले बता दी जाती है। मैं रात में अच्छे से काम कर लेती हूं। मुझे रात में डर नहीं लगता। गाड़ी को हम अपनी जिम्मेदारी समझकर चलाते हैं। गाड़ी चलाते समय हमारा एक ही लक्ष्य होता है कि सवारी को सुरक्षित घर पहुंचाना है। गीता कहती हैं कि जब मुझे पहली बार रात में गाड़ी चलाने का मौका मिला था तब मैं उत्साहित थी। उस रात मैंने सात से आठ घंटे लगातार गाड़ी चलाई थी। मैं बहुत खुश थी उस दिन। मेरे बच्चों को भी आज गर्व है कि मैं ड्राइवर हूं। बच्चों को लगता है कि मैं कुछ अलग काम कर रही हूं। घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में मेरा बहुत बड़ा सहयोग है।

‘लोग अपनी बेटियों को मुझ जैसी बनने को कहते हैं’

दिल्ली की रहने वालीं मीना का कहना है कि मुझे रात में गाड़ी चलानी थी और घर से इजाजत मिल नहीं रही थी। फिर मैंने दफ्तर में कह दिया था कि अगर मेरे घर से फोन आए और पूछें कि रात में गाड़ी चलाना जरूरी है तो कह देना हां। वैसे दफ्तर की तरफ से हमें पूरी आजादी थी कि हम दिन में काम करें या रात में, लेकिन मुझे रात में ही काम करना था। जब दफ्तर के लोगों ने घरवालों से कहा कि हां रात में ही ड्यूटी मिलेगी। तब घर वालों ने मुझे रात में भी काम करने की इजाजत दे दी। रात में सीएनजी पंप खाली होते हैं, ट्रैफिक और भीड़भाड़ नहीं होती। इसलिए गाड़ी चलाने में मजा आता है। आज मुझे आठ साल हो गए हैं ये काम करते हुए। इन आठ सालों में बड़े-बड़े अभिनेताओं को अपनी गाड़ी में बैठाया है। जब आमिर खान आते हैं तो उन्हें भी हवाईअड्डे से लेकर आती हूं। मुझे आज मेरे मोहल्ले और मेरे परिवार के अलावा बहुत से लोग जानते हैं। रात में जब गाड़ी चलाने के लिए जाती थी तो मेरे पड़ोस के लोग मेरे बारे में न जाने क्या-क्या सोचते थे, मां परेशान हो जाती थीं। तब मैं उन्हें समझाती थी कि जब कोई कामयाबी पाता है तो लोग जलते हैं। आज मेरा ही मोहल्ला मेरी कहानी अपनी बेटियों को सुनाता है और मेरे जैसी बनने को कहता है। अपने काम को लेकर 26 साल की मीना कहती हैं कि अव्वल तो कोई ग्राहक हमारे साथ गलत व्यवहार नहीं करता। अगर कभी कोई बदतमीजी करता है या शराब पीकर आता है तो हमें उसे गाड़ी से उतारने का पूरा अधिकार होता है ।

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