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महिला विज्ञानी: मुक्कमल माहौल और महत्त्व की मांग

हर विज्ञानी का सपना होता है कि उसे उसके शोध की वजह से पहचाना जाए और नोबेल पुरस्कार मिले। इसे पाने की चाह में हजारों विज्ञानी दिन-रात शोध करते हैं। लेकिन इसमें सफलता कुछ को ही मिलती है। कई बार पर्याप्त संसाधनों के अभाव में भी शोध प्रभावित होते हैं। करीब 55 साल बाद किसी महिला विज्ञानी ने नोबल पुरस्कार जीता है। इससे 1903 में मैरी क्यूरी उनके बाद मारिया गोपर्ट-मेयर ने 1963 में भौतिकी का नोबेल जीता। इस साल डॉक्टर स्ट्रिकलंैड ने इस पुरस्कार को अमेरिका के आर्थर अश्किन और फ्रांस के जेरार्ड मरू के साथ साझा किया है। हमने भी यह जानने की कोशिश की कि भारत में महिलाओं के लिए इस क्षेत्र में क्या संभावनाएं हैं और ऐसी क्या दिक्कतें है जिनकी वजह से भारत नोबल की रेस में खड़ा नहीं हो पाता है।

Author Published on: October 11, 2018 3:41 AM
भारत का पुराना खगोल विज्ञान काफी उन्नत था लेकिन हमें जरूरत है कि उनकी उपयोगिता के लिए नए सिरे से जांच की जाए।

सुमन केशव सिंह

दिल्ली के नेहरू प्लेनेटोरियम की खगोल विज्ञानी डॉक्टर रत्नाश्री का मानना है कि महिलाओं के लिए कई बार ऊंचे पदों पर पहुंचने में दिक्कतें हैं। रत्नाश्री की मानें तो भारत में खगोल विज्ञान का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। जिसे सरकार के स्तर पर और विकसित करने की आवश्यकता है। भारत में अब तक खगोलीय वेदशालाओं को टूरिस्ट स्पॉट या घूमने की जगह के रूप में देखा जाता है जबकि इसे खगोल विज्ञान के शोध केंद्र के रूप में विकसित किए जाने की आवश्यकता है। डॉक्टर रत्नाश्री ने तारों की उत्पत्ति और रेडियो पल्सार पर शोध कार्य किए हैं। इसमें उन्होंने पाया कि हमारी आकाश गंगा में ज्यादातर तारे बाइनरी यानी एक दूसरे से ही बनें हैं। रेडियो पल्सार के शोध में वह इस नतीजे पर पहुंची तारों से निकलने वाली तरंगों में पोलराइजेशन होता है। रत्नाश्री अभी कई शोध जारी हैं जैसे वो मध्यकाल के खगोलीय यंत्रों की एक्यूरेसी (आकलन की सटीकता) पर काम कर रही हैं। इस पर अब तक काम नहीं हुआ है। ये खगोलीय यंत्र हमारे अजायबघरों और किलों में अब भी मौजूद हैं। नोबल पुरस्कार की दौड़ में भारत के पिछड़ने के कारण पर रत्नाश्री का कहना है कि कई बार भारत में शोध और उसमें आने वाले छात्रों के लिए जो तंत्र है वह काफी संकीर्ण है। इस क्षेत्र में अक्सर ऐसे लोग आते हैं जो अच्छा काम कर सकते हैं। उनकी दिलचस्पी भी है पर उन्हें तंत्र से मदद नहीं मिलती।

कहां है कमी : भारत का पुराना खगोल विज्ञान काफी उन्नत था लेकिन हमें जरूरत है कि उनकी उपयोगिता के लिए नए सिरे से जांच की जाए। इसके अलावा भारत के पास दुनिया के मुकाबले बड़े और उन्नत टेलीस्कोप नहीं हैं। इस कारण शोध प्रभावित होते हैं। हालांकि भारत 30 मीटर टेलिस्कोप स्थापित करने के समझौते किए हैं लेकिन शोध का माहौल बनाना सबसे जरूरी है।

भारत की महिलाओं में भी वह क्षमता है जिसके बूते वे नोबल पुरस्कार जीत सकती हैं। यहां भले ही प्रतिभाओं की कद्र और सरकार के स्तर पर उपलब्ध करवाए गए संसाधनों की कमी हो लेकिन देश की महिला वैज्ञानिकों के लिए इस क्षेत्र में संभावनाओं की कमी नहीं है। ऐसा कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की विज्ञानी प्रोफेसर वीना अग्रवाल का। वीना कहती हैं कि आप यहां चुपचाप अपने काम को करते जाएं तो सफलताएं कदम चूमती हैं, भले ही आपको उसका उतना श्रेय न मिले जिसकी आप हकदार हैं। वे कहतीं हैं कि विज्ञान और वैज्ञानिकों के इस पेशे की खास बात यह है कि इससे ज्यादा मनोरंजक और रोमांचक पेशा कोई और नहीं है। आप अपने शोध के जरिए आए बदलावों के परिणाम को साफ देख सकते हैं। प्रोफेसर वीना ने कैंसर, मलेरिया, डेंगू समेत कई बीमारियों के इलाज में प्रयोग होने वाले सोरेलीन तत्व को खोज निकालने का नया तरीका विकसित किया है। उन्हें इस शोध के लिए दस साल बाद 2017 में पेटेंट भी मिला। इस नई तकनीक के जरिए जो सोरेलीन तत्व निकाले जाते हैं उनकी लागत काफी कम होती हैं, यानी ये दवाएं सस्ती भी हैं। पौधों की पत्तियों से निकाले गए ये तत्व फेफड़े और दिमाग के कैंसर की कोशिकाओं पर नष्ट करने में ज्यादा असरदार हैं। पौधों से निकाले गए इस तत्त्व का मानव शरीर पर कोई बुरा असर नहीं होता, जैसा कीमोथेरेपी में होता है। उन्होंने कहा कि हम प्राकृतिक विधि से रोगों के उपचार की तकनीक की खोज करते हैं। प्रोफेसर बतातीं है कि भारत में इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं और यह क्षेत्र महिलाओं के लिए बहुत अच्छा भी है। यह रचनात्मक होने के अलावा धैर्य और लगन वाला है जो कि महिलाओं के लिहाज से पूरी तरह फिट बैठता है।

क्या हैं संभावनाएं : प्रोफेसर वीना कहती हैं नेट और जेआरएफ निकलाने के बाद इस क्षेत्र में कदम रखा जा सकता है। सरकार की ओर से 25000 रुपए पीएचडी करने के लिए मिलते हैं। इसके बाद ज्यादातर लोग फार्मा इंडस्ट्री में लग जाते हैं। कुछ कृषि में लग जाते हैं। इसके अलावा आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों और फार्मा कंपनी में भी जा सकते हैं। जिन लोगों को हर्बल ड्रग निकालने में दिलचस्पी है वे संसाधन प्रबंधन के तहत कच्ची सामग्री निकाल कर उससे भी पैसे कमा सकते हैं। इसके लिए छोटी विधि होती है जिसका प्रशिक्षण देकर पौधों से क्रूड कंपाउंड निकाला जा सकता है। इसके बाद इन क्रूड कंपाउंड को दूसरे देश भेजकर उनके आइसोलेटेड कंपाउंड प्राप्त कर सकते हैं। इन आइसोलेटेड की एक ग्राम की कीमत 5 लाख रुपए तक होती है।

कहां है कमी : भारत में आइसोलेटेट कंपाउंड बनाने की क्षमता नहीं। यहां से क्रूड या रॉ कंपांउड विदेशों को भेजते हैं। वहां इन कंपाउंड को आइसोलेट किया जाता है इसके लिए एनालिटिक टूल की जरूरत होती है। कंपाउंड निकालने के बाद उस आइसोलेटेड तत्त्व की क्षमता का आकलन किया जाता है। इन तत्त्वों का दवाओं और शोध में प्रयोग होता है जहां भारत पिछड़ा है। इसके अलावा भारत में मौजूद सभी संस्थाएं जो शोध करती हैं वे एक केंद्रित रूप से एक इकाई के रूप में काम नहीं करती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि कई बार उन जगहों पर वे उपकरण एक से होते हैं जहां उनकी कोई जरूरत नहीं और जहां उनकी जरूरत होती है वहां उसकी उपलब्धता ही नहीं है। प्राफेसर कहती हैं कि भारत में इसके अलावा सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां किसी शोध को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। शोध का प्रमोशन हो या उपकरणों की जरूरत पर किया गया व्यय आंतरिक लाभ हानि और निजी स्वार्थ की भेंट चढ़ जाता है।

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