ताज़ा खबर
 

अपना-अपना सत्य

चित्रकार और कवि ही नहीं, हम सभी मूल सत्य की छवि को ही अपने आसपास देखते हैं और इसे देखना हमारे दृष्टिकोण और नजरिए पर निर्भर करता है। किसी भी एक वस्तु को सभी एक ही नजरिए से नहीं देखते। तभी एक का सच दूसरे के सच से भिन्न होता है। जो है और जो नजर आ रहा है।

प्लेटो का यह कहना था कि सभी कलाकार जो कुछ आसपास देखते हैं, उसी का चित्रण या वर्णन करते हैं। इसलिए उनके द्वारा दिखाई जाने वाली सभी वस्तुएं मूल प्रति की कॉपी की कॉपी हैं। (Photo: Creative Commons)

ग्रीस के महान दार्शनिक प्लेटो की मान्यता थी कि सत्य केवल एक है और वह स्वर्ग में है। आप यह भी कह सकते हैं कि सभी की मूल प्रति स्वर्ग में है और भौतिक संसार में जो है, वह उस मूल प्रति की फोटो कॉपी है, भले ही वह मनुष्य हो या फिर पहाड़, फल, फूल, नदी, कुर्सी, टेबल- सभी का मूल विचार स्वर्ग में है। प्लेटो का यह कहना था कि सभी कलाकार जो कुछ आसपास देखते हैं, उसी का चित्रण या वर्णन करते हैं। इसलिए उनके द्वारा दिखाई जाने वाली सभी वस्तुएं मूल प्रति की कॉपी की कॉपी हैं। तर्क को कुतर्क की हद तक खींचने वाले लोग यहां तक कहते हैं कि ऐसे फूलों के चित्रण या वर्णन करने से लाभ ही क्या, जिनमें कोई खुशबू ही न आती हो! उनके हिसाब से उपयोगिता सौंदर्यबोध से अधिक जरूरी और महत्त्वपूर्ण है।

चित्रकार और कवि ही नहीं, हम सभी मूल सत्य की छवि को ही अपने आसपास देखते हैं और इसे देखना हमारे दृष्टिकोण और नजरिए पर निर्भर करता है। किसी भी एक वस्तु को सभी एक ही नजरिए से नहीं देखते। तभी एक का सच दूसरे के सच से भिन्न होता है। जो है और जो नजर आ रहा है। यह फर्क विविधता का कारण भी है। कलाकार किसी चीज को किस दृष्टिकोण से देख रहा है, उसके प्रति वह कितना ईमानदार और समर्पित है, यही उसकी कला को कालजयी बनाता है। अपने नजरिए के प्रति सौ फीसद समर्पण और उसे आत्मसात करने का जज्बा ही उसकी प्रतिबद्धता की कसौटी है। जो वह देख रहा है और जो वह अपनी कला में दिखा रहा है, उसमें फर्क नहीं होना चाहिए। इसे ही सत्य के प्रति समर्पित एहसास भी कहा जा सकता है। मैं अपने नजरिए के प्रति समर्पित रहूं और आप अपने नजरिए के प्रति, इसी में कला की विशिष्टता है।

गुलाब के फूल को कोई उसके समग्र सौंदर्य के लिए पसंद करता है तो कोई उसकी गंध के लिए तो कोई उसके रंग के लिए उसे सराहता है। संभव है कि कोई गुलाब के फूल पर पड़ीं ओस की बूंदों को देख कर उसमें गुलाब के फूल के दुख-दर्द और अपने दिल में छिपे दुख-दर्द की झलक देखता हो। यानी वस्तु एक है, पर उसे चाहने और पसंद करने वालों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं। यही कारण है कि मृत्यु, वेदना और सामाजिक चेतना पर लिखी गई सभी कविताएं एक-दूसरी से भिन्न हैं। सभी में कवियों ने अपने-अपने सच, यानी अपने नजरिए से देखी गई बातों को व्यक्त किया है। अलग-अलग लोग जब किसी एक ही वस्तु में अलग-अलग चीजें देखना पसंद करते हैं और उसे अपने-अपने नजरिए से देखते हैं तो विभिन्न चीजों को लेकर तो दायरा और भी बड़ा होगा। और सभी हर चीज में अपना सच ही देखते हैं। मसलन चांद को ही लें। उसमें भी लोग क्या-क्या नहीं देखते! चांदनी, चरखा कातती हुई बुढ़िया, जिसे वे उसके धब्बे में देखते हैं, आशिक का जला-भुना दिल, उम्मीद की रोशनी, अमृत की वर्षा और न जाने क्या-क्या!

दरअसल, कला की दुनिया ही कुछ अलग होती है। खुद को खोकर प्राप्त करने का कौशल यानी डूब कर और खुद को अपने सच के साथ आत्मसात करने का सुख तभी मिल पाता है, जब उसे पाने के लिए आप खुद को खो देने के लिए तैयार हैं। अधिकतर लोग तो जो देखते हैं, वही सच मान लेते हैं। वे कभी उस विशेष नजर से चीजें नहीं देख पाते, जो सृजन के लिए जरूरी है। सर्जक की नजर सभी के पास भला कहां होती है! अलग-अलग नजरिया, अलग कोण से देखने की इच्छा और उद्देश्य, अपने-अपने सच का अलग पैमाना ही तो कला-साहित्य की आत्मा है। समीक्षा करते समय कलाकार के सच का ध्यान रखा जाना जरूरी है। उसका सच समझे बिना उसकी कला की समग्रता नहीं परखी जा सकती। मूल सच और जो आप अपने नजरिए से पूरी तन्मयता से देख रहे हैं, उसे अंग्रेजी साहित्य में ‘फैक्ट’ और ‘सेंस ऑफ फैक्ट’ कहा जाता है। स्थायी सच के परिप्रेक्ष्य में उसकी छाया को सामने दिख रही भौतिक जीवन की वस्तुओं को अपने-अपने नजरिए से देखकर बताना ही कला का मूल ध्येय है। हर कलाकार अपने-अपने देखे हुए सच को ईमानदारी से व्यक्त करता है। तभी हर कविता, हर चित्र और हर अभिव्यक्ति एक-दूसरे से अलहदा होती है। यही विविधिता सौंदर्यबोध और अभिव्यक्ति का संतोष कला को आकर्षक रूप देते हैं। सच का मूल रूप और उसका वास्तविक रूप यानी यथार्थ, ये दो अलग चीजें हैं। भौतिक दुनिया में हम सच का वास्तविक रूप ही देखते हैं। इसलिए ‘ये ही सच हैं’ के बजाय यह भी सच है का विचार रखना अधिक विवेकपूर्ण है। दरअसल, हर कलाकार अपनी कृति में खुद को तलाशता है, फिर वह चित्रकार हो, मूर्तिकार, कवि या संगीतकार हो या कोई और। मगर खुद को पाने के लिए पहले खुद को खोना भी तो पड़ता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App