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सदाकत के सोपान

सात दशकों का इतिहास उठा कर देखें तो भारत की इस धरा पर कई ऐसे सर्वोच्च पदधारक शख्सियतें हैं जो यूरोप और अमेरिका के ऐसे समकक्ष पदधारकों की तुलना में कहीं से कमतर नहीं हैं। कमाई उनका कभी मकसद नहीं रहा। सादगी से भरा जीवन और निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करते हुए अपने जीते जी ही उन्होंने तारीखी मिसाल रच दी।

Author Updated: December 9, 2020 1:47 AM
पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद। फाइल फोटेा।

भारत में हर चौथा व्यक्ति अशिक्षित है और कमोबेश यही गरीबी रेखा की भी स्थिति है। यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी विकास के साथ समावेशी दृष्टिकोण अभी भी दूर की कौड़ी है। यही कारण है कि कौशल, उद्यम और उपार्जन का कोई मजबूत साझा अपने यहां विकसित नहीं हो पाया है। शायद यही कारण है कि राजनीति यहां आर्थिक राजमार्ग से गुजरती है और इसके प्रति समाज के हर वर्ग में बड़ा आकर्षण है। भविष्य संवारने का यह एक जरिया बन जाता है। पर बात सार्वजनिक जीवन में शुचिता को लेकर करें तो हमारा इतिहास हमें निराश नहीं होने देता है।

सात दशकों का इतिहास उठा कर देखें तो भारत की इस धरा पर कई ऐसे सर्वोच्च पदधारक शख्सियतें हैं जो यूरोप और अमेरिका के ऐसे समकक्ष पदधारकों की तुलना में कहीं से कमतर नहीं हैं। कमाई उनका कभी मकसद नहीं रहा। सादगी से भरा जीवन और निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करते हुए अपने जीते जी ही उन्होंने तारीखी मिसाल रच दी।

12 वर्ष के राष्ट्रपति के कार्यकाल के बाद जब डॉ राजेंद्र प्रसाद से नए आवास के बारे में पूछा गया तो न केवल उन्होंने कोई सरकारी आवास लेने से मना कर दिया बल्कि पटना के सदाकत आश्रम लौट गए और वे जीवन के अंत तक यहीं रहे। गौरतलब है कि 1921 में महात्मा गांधी ने इस आश्रम की स्थापना की थी और राजेंद्र बाबू भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में यहीं रहते थे।

दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपना कार्यकाल खत्म करने के बाद चेन्नई चले गए और आठ बरस यानी जीवन के अंत तक वे अपने परिवार के साथ रहे। इसी श्रेणी में नीलम संजीव रेड्डी का भी नाम है, जो राष्ट्रपति भवन छोड़ने के बाद अपने गृह राज्य आंध्र प्रदेश लौट गए थे।

ये उन पूर्व राष्ट्रपतियों की गाथा है जो दिल्ली के रायसिना पहाड़ी की छाती पर 340 कमरों के बने भव्य आलीशान भवन में रह चुके थे और जब यहां से विदा हुए तो देश के जनमानस को यह संदेश दिया कि वहां रहना देश का प्रथम नागरिक होने के नाते नैतिक और वैधानिक था पर उसके बाद एक नागरिक के तौर पर वे कहीं भी रहने के लिए स्वतंत्र तो हैं ही, आम जनमानस के लिए विशिष्ट और सामान्य भी। साफ है कि सेवा और संयम जैसे पाठ भारतीय सार्वजनिक जीवन में नए नहीं हैं। स्वाधीनता संघर्ष के दौरान तो खास तौर पर इसके कई सर्ग और कई सोपान तारीखी तौर पर रचे गए।

भारत से बाहर निकलें तो इसी तर्ज पर एक उदाहरण दक्षिण अमेरिका का उरुग्वे के राष्ट्रपति का है। होजे मुजिका को सबसे गरीब राष्ट्रपति कहा जाता था। 2015 में सेवानिवृत्त होकर वे अपने खेत में बने दो कमरे के मकान में रह रहे हैं। किसानी का काम करते हैं, खेत में ट्रैक्टर चलाते हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आम नागरिकों की तरह लाइन में लगे होते हैं।

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