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खुशखबरी : बंद हुआ ओजोन परत छेद

वैज्ञानिकों का मानना है कि अप्रैल महीने से उत्तरी ध्रुव का तापमान बढ़ना शुरू हो जाता है। इस कारण आर्कटिक के ऊपर की समतापमंडल परत भी गर्म होने लगी और ओजोन परत में ओजोन की मात्रा बढ़ने लगी यानी वह छेद बंद हो गया।

अप्रैल महीने से उत्तरी ध्रुव का तापमान बढ़ना शुरू हो जाता है।

करीब तीन हफ्ते पहले वैज्ञानिकों ने दुनिया को बताया कि हमें सूर्य की घातक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने वाली ओजोन परत का छेद भरने लगा है। अब खबर आई है कि आर्कटिक क्षेत्र के ऊपर बना ओजोन का ये छेद पूरा बंद हो गया है। यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट के कोपरनिकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस (सीएएमएस) ने इस बात की पुष्टि की है कि यह ओजोन छेद अब समाप्त हो गया है। यह 10 लाख वर्ग किलोमीटर की परिधि वाला था।

सीएएमएस ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि वसंत में अंटार्कटिक के ऊपर विकसित होना वाला ओजोन छिद्र एक वार्षिक घटना है, उत्तरी गोलार्ध में इस तरह के मजबूत ओजोन क्षरण के लिए स्थितियां सामान्य नहीं हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण ऐसा हुआ है। ‘पोलर वोर्टक्स’ इसकी प्रमुख वजह है जो ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडी हवा लाने और ओजोन परत के बाद के उपचार के लिए जिम्मेदार हैं। वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह परिवर्तन मानवीय गतिविधियों में कमी आने के कारण नहीं हुआ है। यानी, इसके पीछे पूर्णबंदी या प्रदूषण के कम होने जैसी कोई वजह नहीं है।

वर्टेक्स के परिणामस्वरूप स्ट्रैटोस्फेरिक बादलों की उत्पत्ति हुई, जिसने सीएफसी गैसों के साथ प्रतिक्रिया करके ओजोन परत को नष्ट कर दिया। वैज्ञानिकों ने कहा, ‘वर्ष 2020 में उत्तरी गोलार्ध में बना ओजोन छेद बंद हो गया है। कम तापमान के कारण मार्च में बने इस बड़े छेद ने वैज्ञानिकों में हड़कंप मचा दिया था। इसकी वजह से अप्रिय घटनाएं होने की भी आशंका जताई गई थी। लेकिन ऐसा कुछ होने से पहले ही यह छेद बंद हो गया।’ सीएएमएस ने कहा कि लगातार बढ़ता हुआ छेद आकर्टिक के ऊपर असामान्य मौसम का नतीजा था। जब तेज हवाएं बर्फीली चोटियों के ऊपर की जमा देने वाली हवाओं में लगातार कई दिनों तक फंसती रहती हैं, तो वैज्ञानिकों की शब्दावली में एक ‘पोलर वोर्टक्स’ बनाती हैं। यह दबाव अपने ही चारों ओर घूमता है।

ओजोन परत एक रंगहीन गैस का स्तर है जो मुख्य रूप से पृथ्वी के समतापमंडल (स्ट्रैटोस्फियर) में पाई जाती है, जो सूर्य और धरती के बीच एक सुरक्षात्मक परत बनाती है और सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है। मानवीय गतिविधियों के कारण दशकों से ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है।

ओजोन परत में नुकसान का पहली बार 1985 में पता चला था। इसे अंटार्कटिक ओजोन छिद्र कहा गया। मानव निर्मित रासायनिक यौगिक, जिसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) कहा जाता है, स्ट्रैटोस्फियर में ओजोन की सांद्रता में कमी का कारण बना था। इसके बाद 1987 में सीएफसी के उत्पादन और खपत की जांच के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया, जिसने बाद में इस रासायनिक यौगिक पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था। क्लोरोफ्लोरोकार्बन का इस्तेमाल एअरोसोल स्प्रे, फोम, सॉल्वेंट और रेफ्रिजरेंट्स बनाने में होता है।

सीएएमएस के मुताबिक, हालांकि आर्कटिक क्षेत्र के वायुमंडल के ऊपर ओजोन परत पर छोटे छेद मिल चुके हैं, लेकिन यह पहली बार था जब ओजोन परत में इतना बड़ा छेद दिख रहा था और यह चिंता का विषय बन गया था। उत्तरी ध्रुव के ऊपर ओजोन में छेद एक दुर्लभ घटना है, लेकिन अंटार्कटिका के ऊपर पिछले 35 साल से हर साल इससे भी बड़ा छेद बार-बार पैदा हो जाता है। डब्ल्यूएमओ का कहना है कि अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन का छेद वर्ष 2000 से अब तक एक से तीन फीसद तक छोटा हो चुका है। 2019 में अंटार्कटिका में सबसे छोटा छेद रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन डब्ल्यूएमओ का कहना है कि वहां की ओजोन परत की छेद को भरने के लिए कम से कम 2050 तक इंतजार करना होगा।

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