ताज़ा खबर
 

संपादकीयः दंगों का दर्द

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई पेशेवर आपराधिक समूह इतने बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाता है तो इसके पीछे निश्चित रूप से कोई हाथ होगा, साजिश होगी। अब दंगों की जांच पुलिस के दो विशेष जांच दलों (एसआइटी) को सौंपी जा चुकी है, ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि सच सामने आएगा।

Author Published on: February 29, 2020 12:43 AM
दिल्ली में हुई हिंसा की वजह से अबतक 39 लोगों की मौत हो चुकी है। (AP Photo)

यों तो वक्त के साथ सारे दुख-दर्द भुलाए जा सकते हैं, लेकिन दिल्ली के दंगों ने जो जख्म दिए हैं, उन्हें शायद ही भुलाया जा सकेगा। जिस तरह से चौरासी के सिख दंगों और 2002 के गुजरात दंगों के घाव आज भी हरे हैं और पीड़ितों की आंखों में आज भी आंसू हैं, उसी तरह इस हफ्ते के शुरू में उत्तर-पूर्वी दिल्ली की बस्तियों में हुए दंगों ने भी लोगों के मन में हमेशा के लिए टीस पैदा कर दी है। इससे भी ज्यादा दुख इस बात का है कि तीन दिन तक चले हिंसा के इस तांडव को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया, जबकि हिंसा फैलाने वालों के बारे में अब तक यही कहा जा रहा है कि यह शरारती तत्त्वों का काम था और किसी के इशारे पर इसे अंजाम दिया गया है। इस बात के भी संकेत मिले हैं कि यह कुछ पेशेवर आपराधिक समूहों का काम था। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई पेशेवर आपराधिक समूह इतने बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाता है तो इसके पीछे निश्चित रूप से कोई हाथ होगा, साजिश होगी। अब दंगों की जांच पुलिस के दो विशेष जांच दलों (एसआइटी) को सौंपी जा चुकी है, ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि सच सामने आएगा।

दिल्ली के दंगा पीड़ित खासतौर से दिन लोगों ने अपनों को हमेशा के लिए खो दिया है, वे सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर हमने किसी का क्या बिगाड़ा था, जिसकी वजह से आज ये दिन देखना पड़ा है। लेकिन दंगों का इतिहास बताता है कि ऐसे सवालों का किसी के पास के पास कोई जवाब नहीं होता और ये सवाल वक्त के साथ चले जाते हैं। दंगों में किसी ने अपने जवान बेटों को खोया, तो किसी ने अपनी बूढ़ी मां को। दंगाइयों ने ये भी नहीं देखा कि पिच्यासी साल की बूढ़ी महिला को जिंदा जलाने से उन्हें क्या हासिल होने जा रहा है, क्योंकि नफरत के उन्माद में उन्हें तो बस मारकाट मचा कर अपना मकसद पूरा करना था।

जो लोग तेजाबी हमले में झुलस गए या तलवार और गोलियों के हमले में जख्मी हो गए, वे शायद ही इन खौफनाक क्षणों को भूल पाएं। तीन दिन के दंगों में जिस तरह से दुकानें लूटी गईं, तोड़फोड़ कर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया, उससे अब लोगों के सामने रोजी-रोटी का बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कैसे लोग फिर से अपना काम-धंधा शुरू करेंगे, यह बड़ा सवाल है। ज्यादातर दंगा पीड़ित रोज कमाने-खाने वाले हैं, मजदूरी करने वाले हैं, जिनके पास अब न रहने को ठिकाना बचा है, न अगले दिन के लिए काम।

दंगों का दर्द कब तक रुलाएगा, कोई नहीं जानता। पांच दिन से लोग अपनों की तलाश में इधर से उधर भटक रहे हैं। अस्पतालों से लेकर थानों तक के चक्कर लगा रहे हैं, आसपास के नालों में खोजबीन करवा रहे हैं। रह-रह कर लाशें मिलने का सिलसिला जारी है। हालत ये है कि अस्पतालों में शवों का पोस्टमार्टम तक नहीं हो पा रहा है। लोग इसी इंतजार में हैं कि उनके अपने का पोस्टमार्टम हो जाए और अंतिम संस्कार तो ठीक से हो जाए। पर दंगों से जो सवाल फिर से निकले हैं, वे वहीं के वहीं हैं, जैसे दंगाई कौन थे, किसके इशारे पर दंगे हुए, शुरुआत में पुलिस मूकदर्शक-सी क्यों बनी रही? हमेशा की तरह इन सवालों के जवाब भी शायद ही मिलें।

Next Stories
ये पढ़ा क्या?
X