ताज़ा खबर
 

संपादकीयः सुनवाई से उम्मीद

तीन तलाक के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक सुनवाई गुरुवार को शुरू हो गई। न्यायालय ने इस मसले को कितना महत्त्व दिया है इसका अंदाजा दो बातों से लगाया जा सकता है

Author May 12, 2017 3:50 AM

तीन तलाक के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक सुनवाई गुरुवार को शुरू हो गई। न्यायालय ने इस मसले को कितना महत्त्व दिया है इसका अंदाजा दो बातों से लगाया जा सकता है। न्यायालय ने गरमी की छुट्टी में भी सुनवाई करना मंजूर किया। दूसरे, उसने इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया। पीठ में प्रधान न्यायाधीश समेत पांच वरिष्ठतम जज शामिल हैं। यह भी गौरतलब है कि पांचों जज अलग-अलग धर्म से ताल्लुक रखते हैं। तीन तलाक प्रथा से पीड़ित मुसलिम महिलाओं द्वारा दायर की गई सात याचिकाओं पर अलग-अलग विचार करने के बजाय अदालत को मुसलिम समुदाय में तीन तलाक के चलन की कानूनी वैधता पर विचार करना जरूरी लगा। पीठ को इस पर दो खास बिंदुओं से विचार करना है। एक, यह कि क्या तीन तलाक मजहब का अनिवार्य या अंतर्निहित अंग है? दूसरा, क्या यह संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों के आड़े आता है?

आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत अनेक मुसलिम संगठन और तमाम मौलाना मानते हैं कि तीन तलाक उनकी मजहबी व्यवस्था का अंग है और इसे बदलना या निरस्त करना उनके धार्मिक मामले में दखल देना होगा, जबकि संविधान ने सारे समुदायों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी दे रखी है। लेकिन याचिकाकर्ताओं और मुसलिम महिलाओं के कई संगठनों का कहना है कि तीन तलाक का इस्लाम के बुनियादी उसूलों या कुरान से कोई लेना-देना नहीं है; यह लैंगिक भेदभाव का मामला है और इसी नजरिए से इसे देखा जाना चाहिए। इस आग्रह में दम है। हमारा संविधान कानून के समक्ष समानता का भरोसा दिलाता है। जबकि तीन तलाक प्रथा तलाक के मामले में मुसलिम मर्द के एकतरफा व मनमाने अधिकार की व्यवस्था है। यही कारण है कि मुसलिम महिलाओं में शिक्षा तथा अपने हकों के प्रति जागरूकता के प्रसार के साथ-साथ मुसलिम समाज में भी तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठने लगी है, भले अभी उसे मुख्य स्वर न कहा जा सके। केंद्र सरकार ने जरूर इस मामले में दिए हलफनामे के जरिए अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि तीन तलाक मुसलिम महिलाओं की प्रतिष्ठा व सम्मान के खिलाफ है और इसे समाप्त होना चाहिए। बहरहाल, अगर मजहबी नजरिए से देखेंगे, तो तीन तलाक का विवाद अंतहीन बना रह सकता है। क्योंकि मजहबी मान्यताओं और परंपराओं की कई व्याख्याएं होंगी, फिर किस व्याख्या को माना जाएगा? इसलिए असल मसला तो यह है कि क्या यह कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत और नागरिक अधिकारों के आड़े आता है?

शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह के मामलों में संबंधित धार्मिक स्थलों के प्रबंधकों ने यही दलील दी थी कि वहां स्त्रियों के प्रवेश पर लगी पाबंदी सदियों पुरानी है तथा परंपरा का हिस्सा है। लेकिन मुंबई उच्च न्यायालय ने इस तर्क को नहीं माना और पाबंदी हटा लेने का आदेश देते हुए अपने फैसले में कहा कि विभिन्न समुदायों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी संविधान ने जरूर दे रखी है, पर वह असीमित नहीं हो सकती। धार्मिक स्वायत्तता तभी तक है जब तक वह नागरिक अधिकारों के आड़े न आए। तीन तलाक का मसला चूंकि मुसलिम महिलाओं के खिलाफ भेदभाव व अन्याय का मसला है, इसलिए इसे मजहबी चश्मे से न देख कर, सभी के समान नागरिक अधिकार तथा कानून के समक्ष समानता की दृष्टि से देखना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि मामले की सुनवाई कर रहे संविधान पीठ का फैसला जल्द आएगा और तीन तलाक के पीड़ितों को इंसाफ मिलने के साथ ही एक लंबे विवाद का तर्कसंगत पटाक्षेप होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App