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संपादकीयः घाटी के जख्म

जम्मू-कश्मीर के शोपियां में एक युवा सैन्य अधिकारी की हत्या इस बात का संकेत है कि आतंकी गिरोहों के बीच तेजी से हताशा फैल रही है।

Author May 12, 2017 03:55 am
कश्मीर में स्थानीय लोगों को खदेड़ते पुलिस वाले (FIle Photo)

जम्मू-कश्मीर के शोपियां में एक युवा सैन्य अधिकारी की हत्या इस बात का संकेत है कि आतंकी गिरोहों के बीच तेजी से हताशा फैल रही है। यह तो पहले से दिख रहा था कि उनका मकसद लोगों को भारत के खिलाफ भड़काना है, लेकिन वे उन कश्मीरी युवाओं को भी मार डालने से परहेज नहीं करते जिन्हें वे ‘अपने लोग’ बताते फिरते हैं। कुलगाम जिले के सुरसोना गांव के रहने वाले लेफ्टिनेंट उमर फैयाज महज बाईस साल में ही सेना में अफसर बन गए थे और पहली छुट्टी में अपनी चचेरी बहन की शादी में शामिल होने आए थे। लेकिन वहां अचानक दस नकाबपोश आए, परिजनों के बीच से उन्हें अगवा करके ले गए और धमकी दी कि पुलिस को कुछ न बताया जाए। चूंकि कुछ समय पहले कई पुलिसकर्मियों को अगवा करने और चेतावनी देने के बाद छोड़ दिया गया था, इसलिए परिवार के लोग इस उम्मीद में थे कि उमर फैयाज भी उसी तरह लौट आएंगे। लेकिन अगले दिन फैयाज की गोलियों से छलनी लाश ही मिली।

हालांकि इस हत्या की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है, लेकिन जैसा कि जाहिर है, अब आतंकियों के निशाने पर कश्मीर का वह युवा है जो अपने को भारतीय नागरिक के रूप में सहज मानता है। गौरतलब है कि फौज के तीनों हिस्सों को मिला कर कश्मीरी पहचान वाले उनतीस अफसर हैं। इसके अलावा, लगभग पांच हजार कश्मीरी जवान सेना में दूसरे महत्त्वपूर्ण रैंक पर देश के लिए काम कर रहे हैं। कश्मीर में अलगाववादियों ने भावनाओं को भड़का कर बहुत सारे लोगों को सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाने में तो लगा दिया, लेकिन उनके लिए शायद सबसे बड़ी चुनौती उमर फैयाज जैसे युवा हैं जो उनका साथ न देने और उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाते हैं। एक विवाह समारोह में मौजूद बहुत सारे लोगों के बीच से अगवा करके की गई हत्या के पीछे इरादा स्थानीय लोगों के भीतर खौफ पैदा करने के साथ-साथ घाटी में तैनात फौज का मनोबल तोड़ना भी हो सकता है। लेकिन दशकों से पसरे आतंक के बावजूद वहां ऐसे तमाम लोग हैं जो बिना किसी हिचक और डर के आतंकियों के बरक्स खड़े हैं। खासतौर पर उमर फैयाज जैसे युवा ने जिस तरह अपने भविष्य के लिए फौज को चुना था, वह पत्थरबाजी में उलझे युवाओं के सामने एक मिसाल की तरह पेश किया जा सकता है, किया जाना चाहिए।

अलगाववादी हर रोज कश्मीरी युवाओं को भड़काने में लगे रहते हैं। इसमें उन्हें कुछ हद तक कामयाबी मिलती भी दिखी है। हाल के दिनों में कश्मीर में पसरती हिंसा के बीच युवाओं और यहां तक कि स्कूली लड़कियों का भी सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की घटनाओं में शामिल होना गहरी चिंता का विषय है। विडंबना यह है कि बेलगाम होती हिंसा के बीच लाचार नजर आ रही राज्य सरकार के पास कोई व्यावहारिक हल नहीं दिख रहा है। उमर फैयाज की हत्या के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भावुक होकर कहा कि यह जम्मू-कश्मीर के लोगों, खासतौर पर कश्मीर मुद््दे पर रोने वालों के लिए आत्मविश्लेषण का क्षण है; रक्षामंत्री अरुण जेटली ने इसे कायरता और नीचता से भरी हुई हरकत कहा। लेकिन हालात कब सुधरेंगे, इस सवाल का जवाब इस पर निर्भर करता है कि अपीलों या आईना दिखाने वाले बयानों से आगे समस्या के स्थायी समाधान के लिए क्या ठोस किया जा रहा है।

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