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संपादकीयः लापरवाह पुलिस

सर्वोच्च अदालत की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि जब हिंसा भड़काने वाले बयान दिए जा रहे थे, तभी पुलिस ने जरूरी और सख्त कदम क्यों नहीं उठाए। अगर कोई भी नेता या व्यक्ति भड़काऊ बयान दे रहा है या लोगों को हिंसा के लिए उकसा रहा है तो पुलिस की पहली जिम्मेदारी यह बनती है कि किसी की भी मंजूरी लिए बिना कानून के मुताबिक कदम उठाए। लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया।

Author Updated: February 27, 2020 1:09 AM
दिल्ली में हिंसा पर उतारू भीड़। (Express Photo: Praveen Khanna)

राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में दो दिन तक सांप्रदायिक हिंसा का जो तांडव मचा, उसने एक बार फिर से पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह सवाल उठ रहा है कि पुलिस करती क्या रही, क्यों नहीं समय रहते कदम उठाए, ताकि हालात इतने बिगड़ते नहीं। संशोधित नागरिकता कानून को लेकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाकों में चल रहे धरने-प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में बाईस से ज्यादा लोग मारे गए हैं। करोड़ों की संपत्ति बर्बाद हुई सो अलग। सोमवार और मंगलवार को दंगाइयों ने लोगों को जिस तरह से निशाना बनाया, उनकी दुकानें फूंकीं, घरों को आग के हवाले कर दिया, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहंचाया, उससे यह साफ है कि सब कुछ सुनियोजित था। इस हिंसा को रोक पाने में पुलिस तंत्र जिस कदर विफल रहा, वह एक बड़ा और गंभीर सवाल है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि दंगे को रोक पाने में पुलिस को जिस पेशेवर तरीके से काम करना चाहिए था, उसने नहीं किया। हालांकि पुलिस का यह रवैया कोई नया नहीं है। जब-जब ऐसे भयावह दंगे हुए हैं, पुलिस की कार्यप्रणाली विवादों और संदेह के घेरे में आती रही है।

सर्वोच्च अदालत की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि जब हिंसा भड़काने वाले बयान दिए जा रहे थे, तभी पुलिस ने जरूरी और सख्त कदम क्यों नहीं उठाए। अगर कोई भी नेता या व्यक्ति भड़काऊ बयान दे रहा है या लोगों को हिंसा के लिए उकसा रहा है तो पुलिस की पहली जिम्मेदारी यह बनती है कि किसी की भी मंजूरी लिए बिना कानून के मुताबिक कदम उठाए। लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया। भाजपा के एक नेता कपिल मिश्रा पुलिस की मौजूदगी में भीड़ को हिंसा के लिए उकसाते रहे और पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इससे साफ था कि पुलिस ऐसे लोगों को बच निकलने देना चाहती थी या फिर किसी के इशारे का इंतजार कर रही थी। पुलिस का यह रवैया बताता है कि दंगों को रोकने के लिए उसने शुरुआती स्तर पर कोई प्रयास नहीं किए। ऐसा कई जगह हुआ, जहां स्थानीय नेता भीड़ की अगुआई करते हुए लोगों को हिंसा के लिए उकसाने वाली बातें कहते मिले और इनके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे। हालात बेकाबू होने से बचाने के लिए पुलिस को सबसे पहले लोगों को उकसाने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने थे, जो नहीं उठाए गए।

दिल्ली का यह दंगा पुलिस के खुफिया तंत्र की नाकामी को भी उजागर करता है। एक साथ कई बड़े इलाकों में जिस व्यापक पैमाने पर हिंसा और आगजनी हुई, वह कोई अचानक होने वाली घटना तो नहीं कही जा सकती। घरों की छतों से लेकर सड़कों तक पर र्इंट-पत्थरों और कांच की टूटी बोतलों से भरी बोरियां मिलना इस बात का प्रमाण है कि दंगा कराने की यह खिचड़ी कई दिनों से पक रही थी और दंगाई केवल हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहे थे। हर राज्य की पुलिस का अपना खुफिया तंत्र होता है, हर थाने का अपने इलाके में खुफिया और सूचना तंत्र काम करता है। इसलिए सवाल उठता है कि क्या पुलिस को जरा भी भनक नहीं लगी होगी कि क्या होने जा रहा है, खासतौर से तब जब दिल्ली सहित देश में कई जगह नागरिकता संशोधन कानून को लेकर धरने-प्रदर्शन चल रहे हैं। कहा यह भी गया कि दिल्ली पुलिस के पास पर्याप्त बल नहीं होने की वजह से हालात बिगड़े। अगर पुलिस पेशेवर तरीके से काम नहीं कर रही, उसका खुफिया तंत्र लापरवाह और लाचार है और उसके पास पर्याप्त संख्या में जवान भी नहीं हैं तो फिर नागरिकों की सुरक्षा कौन करेगा?

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