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संपादकीयः लाचारी का शोषण

महाराष्ट्र के बीड़ जिले में इतनी बड़ी तादाद में महिलाओं के गर्भाशय निकलवाने की घटना कोई अचानक नहीं हुई होगी। सवाल है कि जब किसी नियम पर अमल के सिलसिले में पड़ताल करनी होती है तो प्रशासन की नजर से कोई छोटी घटना भी नहीं छिप पाती, तो महिला मजदूरों के शोषण की पृष्ठभूमि में इतनी बड़ी अमानवीय गतिविधि कैसे और किसकी शह से चलती रही?

महाराष्ट्र के बीड़ जिले में गन्ने की कटाई के समय ठेकेदार ऐसी मजदूर महिलाओं को काम पर रखना बेहतर समझते हैं, जिनके गर्भाशय निकाले जा चुके हों, क्योंकि ऐसे में माहवारी उनके काम में बाधा नहीं बनती। यही वजह है कि पैसों की खातिर लाचार महिलाएं अपने गर्भाशय निकला रही हैं।

कुछ समय पहले महाराष्ट्र के बीड़ जिले से जब बड़ी संख्या में महिलाओं के गर्भाशय निकलवाने की खबर आई तो इसे गरीबी और मजबूरी की मार झेलती महिलाओं के खिलाफ एक अमानवीय बर्ताव के तौर पर देखा गया, लेकिन मसले की गंभीरता के अनुपात में इस पर चर्चा कम हुई। खबर के मुताबिक बीड़ जिले में बीस से तीस साल की चार हजार छह सौ पांच महिलाओं ने इसलिए अपने गर्भाशय निकलवा लिए कि उन्हें काम मिलने में बाधा नहीं आए। इसकी वजह यह है कि वहां गन्ने की कटाई के समय ठेकेदार ऐसी मजदूर महिलाओं को काम पर रखना बेहतर समझते हैं, जिनके गर्भाशय निकाले जा चुके हों, क्योंकि ऐसे में माहवारी उनके काम में बाधा नहीं बनती। यही नहीं, अगर माहवारी की वजह से महिला काम पर नहीं आती है तो ठेकेदारों के मुताबिक यह ‘काम में अड़चन’ है और इसके बदले में उन्हें बतौर जुर्माना ठेकेदार को पांच सौ रुपए देने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में फंसी महिलाओं के सामने गर्भाशय निकलवाने की मजबूरी आम है। अब राज्यसभा में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सदस्य वंदना चव्हाण ने यह मुद्दा उठाते हुए इस घटना की पूरी जांच कराने की मांग की।

यह अपने आप में एक गंभीर स्थिति है कि किसी तरह गुजारा करने वाली महिलाओं के सामने वहां गन्ने के खेतों में मजदूरी करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था, दूसरे वहां के ठेकेदारों को ऐसे नियम-कायदे बनाने से रोकने-टोकने वाला कोई नहीं, जो महिलाओं के सामने ऐसे लाचार हालात पैदा करते थे। देश और राज्य में बने श्रम कानूनों के बरक्स कुछ ठेकेदारों को अपनी मनमानी चलाने की छूट कैसे मिली हुई थी? इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि आजादी के सत्तर सालों बाद अब देश में मजदूरों के हक में बने कानून बेहद कमजोर नजर आ रहे हैं। बात शायद अब इससे आगे जा रही है जिसमें किसी ठेकेदार ने मजदूर महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाते हुए निजी स्तर पर ऐसे नियम बना रखे थे कि अगर कोई महिला माहवारी की वजह से किसी दिन अनुपस्थित रहे तो उसके लिए उसे जुर्माना भरना पड़े। इतना तय है कि इतनी बड़ी तादाद में महिलाओं के गर्भाशय निकलवाने की घटना कोई अचानक नहीं हुई होगी। सवाल है कि जब किसी नियम पर अमल के सिलसिले में पड़ताल करनी होती है तो प्रशासन की नजर से कोई छोटी घटना भी नहीं छिप पाती, तो महिला मजदूरों के शोषण की पृष्ठभूमि में इतनी बड़ी अमानवीय गतिविधि कैसे और किसकी शह से चलती रही?

रोजी-रोटी की खातिर और जिंदा रहने के लिए जिन महिलाओं को ठेकेदार की मनमानी का शिकार होना पड़ा, उन्हें असंगठित क्षेत्र में दर्ज किया जाएगा। हालत यह है कि संगठित क्षेत्र की महिलाओं को भी रोजगार के क्षेत्र में अक्सर कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। जबकि दुनिया भर में श्रमशक्ति के मामले में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान है। अलग-अलग देशों में महिलाओं के अनुकूल नियम-कायदे बनाए जा रहे हैं। कई जगहों से माहवारी को ध्यान में रख कर उनके लिए सवैतनिक छुट्टी की भी व्यवस्था की खबरें आती हैं। लेकिन हमारे देश में कई बार महिलाओं को अनेक तरह के प्रतिकूल हालात का सामना करना पड़ता है। हालांकि बिहार में नब्बे के दशक में राजद सरकार के दौरान महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए दो दिनों के ‘विशेष अवकाश’ की व्यवस्था लागू की गई थी। जरूरत इस बात की है कि महिलाओं की विशेष शारीरिक स्थिति को देखते हुए इस तरह की मानवीय दृष्टि से लैस कानून सभी क्षेत्रों की महिला कामगारों के लिए लागू किए जाएं और इसमें बाधा पैदा करने वाले रोजगारदाताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।

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