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संपादकीयः रैगिंग का रोग

यह किसी से छिपा नहीं है कि गैरकानूनी होने के बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाली रैगिंग की घटनाओं में जूनियर विद्यार्थियों को कई बार बेहद अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है। प्रताड़ित किए जाने और यातना बर्दाश्त न होने की वजह से पीड़ित विद्यार्थियों के आत्महत्या तक कर लेने की खबरें आती रही हैं। हालांकि ऐसी घटनाओं पर हुई सामाजिक प्रतिक्रिया की वजह से ही इस ओर सरकार को संज्ञान लेना पड़ा और रैगिंग पर रोक लगाई गई।

Author Published on: August 23, 2019 2:11 AM
यह किसी से छिपा नहीं है कि गैरकानूनी होने के बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाली रैगिंग की घटनाओं में जूनियर विद्यार्थियों को कई बार बेहद अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश में सैफई चिकित्सा विश्वविद्यालय में हुई रैगिंग के मामले ने एक बार फिर यही साफ किया है कि कुछ लोगों के भीतर न केवल खुद को श्रेष्ठ मानने की ग्रंथि इस कदर हावी है कि वे ऐसा करते हुए कानूनों की भी परवाह नहीं करते। गौरतलब है कि विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष के करीब डेढ़ सौ विद्यार्थियों का सिर मुंड़ा कर गंजा करा दिया गया है। उन सबको एक लाइन में सड़क पर चलना पड़ता है। बीच में अगर कोई वरिष्ठ मिल जाता है, तो उसे झुक कर सलाम करना पड़ता है। बीच में अगर किसी वजह से लाइन टूट जाए तो वरिष्ठ से गालियां सुननी पड़ती हैं। इस घटना के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले पर परदा डालने का प्रयास कर रहा है। उसने इसे सामान्य घटना करार दिया है। डर की वजह से रैगिंग के शिकार विद्यार्थी भी जुबान खोलने से हिचकते रहे। जाहिर है कि कथित वरिष्ठ होने के नाम पर जिन्होंने पीड़ित विद्यार्थियों की रैगिंग को अंजाम दिया, उनका खौफ शायद सबके सिर पर चढ़ कर बोलता है। रैगिंग का यह मामला शायद परिसर में ही दब कर रह जाता, अगर उसकी तस्वीरें बाहर नहीं आतीं।

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय दिशा-निर्देशों के तहत बिल्कुल साफ है कि किसी भी हाल में रैगिंग की घटना बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों के साथ-साथ संस्थान तक के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। लेकिन यह एक गंभीर चिंता की बात है कि सर्वोच्च अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कुछ छात्र अपने भीतर गहरे पैठी श्रेष्ठता की सामंती ग्रंथि को दबा नहीं पाते हैं और एक तरह से रैगिंग की आपराधिक गतिविधि को अंजाम देते हैं। इससे इतर सवाल है कि परिसर के भीतर इतनी बड़ी घटना पर प्रशासन ने सख्त कार्रवाई करने के बजाय खुद ही लापरवाही क्यों बरती? हालत यह है कि किसी तरह बाहर आई तस्वीरों के बाद जब स्थानीय प्रशासन ने मामले में दखल दिया और एसडीएम की अगुआई में एक समिति ने जांच की तो उसमें सैफई चिकित्सा विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के साथ रैगिंग की पुष्टि की गई। यही नहीं, जांच में कुलपति और रजिस्ट्रार की ओर से बरती गई लापरवाही भी सामने आई।

यह किसी से छिपा नहीं है कि गैरकानूनी होने के बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाली रैगिंग की घटनाओं में जूनियर विद्यार्थियों को कई बार बेहद अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है। प्रताड़ित किए जाने और यातना बर्दाश्त न होने की वजह से पीड़ित विद्यार्थियों के आत्महत्या तक कर लेने की खबरें आती रही हैं। हालांकि ऐसी घटनाओं पर हुई सामाजिक प्रतिक्रिया की वजह से ही इस ओर सरकार को संज्ञान लेना पड़ा और रैगिंग पर रोक लगाई गई। लेकिन आज भी अगर किसी संस्थान में इस तरह की प्रवृत्ति देखी जा रही है तो यह कानून को लागू करने वाली एजेंसियों की भी नाकामी है। किसी संस्थान में भविष्य बनाने के सपने लेकर नवागंतुक विद्यार्थी आते हैं, तो वहां अपने साथ हुए शुरुआती व्यवहार का उनके मन-मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है और कई बार जीवन और समाज के प्रति उनका नजरिया भी निर्धारित हो जाता है। इसलिए यह सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है कि किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान में नवागंतुक विद्यार्थियों के साथ ऐसा बर्ताव हो, जिससे समाज और दुनिया के प्रति उनके भीतर सकारात्मक भाव पैदा हो।

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