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रिहाई का मतलब

मुंबई हमले के मुख्य आरोपी जकी-उर-रहमान लखवी की रिहाई के बाद उचित ही आतंकवाद से लड़ने को लेकर पाकिस्तान की इच्छाशक्ति पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। दो दिन पहले पेशावर के सैनिक स्कूल पर हुए हमले के बाद पूरे पाकिस्तान में शोक का माहौल है। पाकिस्तान सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कोई रियायत न […]

Author December 20, 2014 1:27 PM
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मुंबई हमले के मुख्य आरोपी जकी-उर-रहमान लखवी की रिहाई के बाद उचित ही आतंकवाद से लड़ने को लेकर पाकिस्तान की इच्छाशक्ति पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। दो दिन पहले पेशावर के सैनिक स्कूल पर हुए हमले के बाद पूरे पाकिस्तान में शोक का माहौल है। पाकिस्तान सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कोई रियायत न बरतने का मंसूबा बांध रही थी। ऐसा लग रहा था कि पाकिस्तान अब दहशतगर्दी से निपटने की नई रणनीति बनाएगा, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। लश्करे-तैयबा का सरगना हाफिज सईद हमले के तुरंत बाद से इसमें भारत का हाथ बताते हुए बदले की कार्रवाई करने की खुली धमकी देता फिरने लगा। उसके बाद लखवी को वहां की अदालत ने पुख्ता सबूत न होने की दलील पर रिहा कर दिया। इससे स्वाभाविक ही भारत की चिंता बढ़ गई है। अब उसने पाकिस्तान सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया है कि वह इस फैसले के खिलाफ अपील करे। पाकिस्तान सरकार ने ऐसा करने की घोषणा भी कर दी है, मगर इसके नतीजे क्या निकलने हैं, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। लखवी के खिलाफ पर्याप्त सबूत थे। मुंबई हमलों के दौरान हमालावरों को फोन पर निर्देश देते हुए उसकी बातचीत के टेप सौंपे गए थे। खुद अजमल कसाब ने स्वीकार किया था कि लखवी ने ही उसके दल के लोगों को प्रशिक्षित किया था। इन्हीं सबूतों के आधार पर उसे गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया। मगर वहां की सरकार की ढिलाई के चलते इस मामले में अदालत अपेक्षित नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। समस्या यह है कि पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद और लखवी को आतंकवादी मानती ही नहीं, समाजसेवी मानती है। इसी की आड़ में वे खुलेआम घूमते और भारत-विरोधी गतिविधियां चलाते रहे हैं।

पाकिस्तान यह कह कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता कि यह अदालत का मामला है और वह इसमें कुछ नहीं कर सकती। स्थिति यह है कि पाकिस्तान ने जो आतंकवाद निरोधक नया कानून पारित किया, उसके तहत पिछले छह महीनों में महज दो दहशतगर्दों को गिरफ्तार किया जा सका है, जबकि पुराने कानून के तहत एक हजार से ऊपर आतंकियों को पकड़ा जा चुका है। पुराना कानून इस कदर लचर है कि इसके तहत गिरफ्तार आतंकियों में से ज्यादातर अदालत में पहुंच कर रिहा हो जाते हैं। पिछले सात सालों में वहां करीब दो हजार आतंकी रिहा हो गए और उनमें से ज्यादातर फिर से आतंकवादी संगठनों में शामिल हो गए। लखवी के मामले में भी यही कानूनी शिथिलता जिम्मेदार रही। अगर सरकार की तरफ से ठीक से उसके खिलाफ तर्क रखे जाते तो उसे इतनी आसानी से जमानत न मिल पाती। मगर हकीकत यह है कि पिछले पांच सालों में उसकी सुनवाई करने वाले आठ जज और दस सरकारी वकील बदले गए या उन्होंने इस मामले से खुद को अलग कर लिया। उन्हें लगातार धमकियां मिलती रहीं, मगर उन्हें माकूल सुरक्षा-व्यवस्था नहीं मुहैया कराई गई। अब लखवी के जेल से बाहर आने के बाद उसके लोगों को सबूतों को नष्ट करने और अपने पक्ष में तथ्यों को पेश करने का मौका मिल गया है। फिर यह भी छिपी बात नहीं है कि लखवी कश्मीर में लश्करे-तैयबा का स्वयंभू कमांडर है। जिस तरह लश्कर पेशावर हमले का बदला भारत से लेने की बात कह रहा हैं, उसमें भारत के लिए अपनी सुरक्षा-व्यवस्था पुख्ता करने की चुनौती बढ़ गई है। मगर इससे पाकिस्तान को क्या हासिल होगा! जिस गम में वह इन दिनों डूबा है, उससे बाहर निकलने का रास्ता यह तो नहीं हो सकता।

 

 

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