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यूपी: बदहाली के कगार पर हैं बीएड कॉलेज

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से संबंद्ध 427 कॉलेजों में करीब 47 हजार बीएड की सीट हैं। इनमें से करीब 40-45 फीसद सीट खाली पड़ी हैं। इसी तरह लखनऊ विश्वविद्यालय से संबंद्ध कॉलेजों में 50 हजार से ज्यादा बीएड पाठ्यक्रम की सीट खाली हैं।

Author August 29, 2018 3:38 AM
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से संबंद्ध 427 कॉलेजों में करीब 47 हजार बीएड की सीट हैं।

कुछ सालों पहले तक प्रतिष्ठित और रोजगार उन्मुख माने जाने वाला बीएड कोर्स अब अपनी चमक खोता जा रहा है। पिछले दशक के दौरान मान्यता लेने वाले बीएड कॉलेजों की बाढ़ का नतीजा है कि मौजूदा सत्र में तकरीबन 40 फीसद से ज्यादा सीटें खाली रह गई हैं। कई कॉलेजों में तो इतने कम दाखिले हुए हैं कि वे कोर्स संचालित नहीं कर पा रहे हैं। जबकि पिछले साल मेरठ विश्वविद्यालय से संबद्ध काफी कॉलेजों ने बीएड कोर्स की मान्यता खत्म कराई है। उनकी जगह पर कॉलेजों ने अन्य प्रबंधन पाठ्यक्रमों की मान्यता ली है। जानकारों के मुताबिक स्नातक स्तर के बाद बीएड में दाखिला मिलता है। करीब 5-6 साल पहले तक बीएड करने के बाद सरकारी नौकरी लगना तय माना जाता था। नौकरियों की संख्या में कमी और हजारों की संख्या में कॉलेजों की मान्यता मिलने से ऐसे हालत पैदा हुए हैं कि सीटें भरने के लिए नाको चने चबाने पड़ रहे हैं।

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से संबंद्ध 427 कॉलेजों में करीब 47 हजार बीएड की सीट हैं। इनमें से करीब 40-45 फीसद सीट खाली पड़ी हैं। इसी तरह लखनऊ विश्वविद्यालय से संबंद्ध कॉलेजों में 50 हजार से ज्यादा बीएड पाठ्यक्रम की सीट खाली हैं। पूरे प्रदेश में बीएड की खाली सीटों की संख्या लाख से ज्यादा बताई गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले बीएड एक साल का था, जो अब दो साल का हो गया है। समयावधि बढ़ने के साथ ही फीस भी बढ़ी है। इस वजह से दाखिला लेने वालों की संख्या में कमी आई है। बीएड करने के बाद अध्यापक की नौकरी के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) अनिवार्य है। इसी तरह बीएड में प्रवेश लेने के लिए भी परीक्षा अनिवार्य की गई है। दाखिला लेने वालों की घटती संख्या के कारण बीएड प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होने वाले को भी निजी कॉलेज दाखिला दे रहे हैं। निजी कॉलेज में बीएड प्रथम वर्ष की फीस करीब 51 हजार और द्वितीय वर्ष में 30 हजार रुपए हैं। जबकि सरकारी कॉलेज में यह करीब 15 और 12 हजार रुपए है।

मेरठ विश्वविद्यालय के उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक बीएड के मुकाबले बीटीसी की तरफ दाखिला लेने वालों का रुझान बढ़ा है। बीटीसी में दाखिला 12वीं कक्षा के बाद हो जाता है। दो साल की बीटीसी करने वाला सरकारी शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन कर सकता है। भले ही उसकी नियुक्ति प्राथमिक शिक्षक के रूप में होगी, जबकि स्नातक के बाद बीएड में दाखिला मिलता है। बीएड कोर्स कर चुके लोगों की संख्या में लाखों में है। उस अनुपात में अब नौकरियां नहीं हैं। इस वजह बीएड के मुकाबले विद्यार्थी 12वीं के बाद बीटीसी या स्नातक के बाद किसी अन्य रोजगार उन्मुख कोर्स में दाखिला लेने को बेहतर मान रहे हैं।

4 साल का बीए-बीएड पाठ्यक्रम संचालित करने की तैयारी

आरवी हायर एजुकेशन एंड एजुकेशन संस्थान, दादरी के अध्यक्ष वेदराम शर्मा ने बताया कि दो साल पहले तक प्रदेश में बड़े पैमाने पर कॉलेजों को बीएड की मान्यता दी थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि बगैर इमारत और संसाधन वाले कॉलेजों ने भी बीएड के नाम पर दाखिले कर विद्यार्थियों से फीस ले ली। उनके पास ना तो बीएड पढ़ाने योग्य शिक्षक थे और न ही अन्य संसाधन थे। दाखिले कम होने से ज्यादातर ऐसे ही कॉलेज बंद हो रहे हैं। शर्मा के मुताबिक बीटीसी कराने वाले भी करीब 3 हजार से ज्यादा संस्थान हैं। वहां भी काफी सीटें खाली हैं। अगले सत्र से बीए-बीएड का संयुक्त चार वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना है। तब 12वीं के बाद ही 4 साल के इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थी दाखिला सकेंगे।

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