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तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्ज़ः दोहरे पैमाने

प्रधानमंत्री ने चुनाव के दौरान काला धन वापस लाने का वादा किया था, वह न सिर्फ ‘चुनावी जुमला’ था, बल्कि झूठी बात थी। वैसे भी जीत रहे थे तो इस झूठी बात को कहने की जरूरत पता नहीं क्यों महसूस की! अब ये चुनावी जुमला हत्यारा बन गया है मोदी के दुश्मनों के हाथों में।

Author March 13, 2016 8:40 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

जब वित्तमंत्री ने सोनिया गांधी के पुराने मित्र ओतावियो क्वात्रोकि का नाम राज्यसभा में पिछले सप्ताह लिया तो मुझे बहुत खुशी हुई। इसलिए नहीं कि शायद अब राहुल गांधी ‘फेयर एंड लवली’ कहना बंद कर देंगे या इस व्यक्ति का नाम लेकर अरुण जेटली ने याद दिलाया है कांग्रेस पार्टी को कि भारत की गरीब जनता के धन की चोरी बड़े पैमाने पर कब से शुरू हुई थी। बोफर्स घोटाले की अहमियत आज भी उतनी ही है जितनी तब थी, क्योंकि इस घोटाले ने नींव रखी उस प्रथा की, जिसके कायम रहते हुए राजनीति में लोग आते हैं पैसा बनाने के लिए। जनता की सेवा करने नहीं। अब तो इस प्रथा को हम पंचायतों से लेकर केंद्र सरकार की ऊंचाइयों तक देख सकते हैं, लेकिन 1987 में जब बोफर्स कंपनी की रिश्वतखोरी का पर्दाफाश स्वीडन के एक रेडियो स्टेशन ने किया था, तब इस तरह का भ्रष्टाचार बहुत कम हुआ करता था भारतीय राजनीति में।

बोफर्स की अहमियत यह भी है कि पहली बार रिश्वत लेने वाले प्रधानमंत्री के खास दोस्त निकले। क्या यही वजह थी कि राजीव गांधी ने बोफर्स अधिकारियों को उनके नाम बताने से रोका, जिनको उन्होंने रिश्वत दी थी? जिनको याद नहीं हैं, उनको याद दिलाना चाहूंगी कि बोफर्स घोटाले का खुलासा जब हुआ तो इस कंपनी के उच्च अधिकारी दिल्ली पहुंचे और सारे नाम बताने का प्रस्ताव रखा प्रधानमंत्री के सामने। लेकिन राजीव गांधी ने बोफर्स के इस प्रस्ताव को यह कह कर ठुकराया कि राष्ट्र की सुरक्षा के लिए हानिकारक होगा।

उस समय राजीव को यकीन था कि ऐसा करने से नाम कभी निकलेंगे नहीं और लोग बोफर्स घोटाले को भूल जाएंगे। ऐसा शायद होता भी अगर मेरी दोस्त चित्रा सुब्रमणियम की खोजी पत्रकारिता द्वारा उन स्विस बैंक खातों का पता लगा जिनमें बोफर्स के रिश्वत का पैसा पाया गया और जिन पर नाम थे क्वात्रोकि और उनकी पत्नी मरिया के। जिस दिन चित्रा की ये स्टोरी छपी उसी दिन क्वात्रोकि भारत से फरार हो गए 29 जुलाई 1993 की रात। याद रखिए कि उस समय भारत के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे जिनको इस पद पर नियुक्त किया था सोनिया गांधी ने।

हो सकता है, उस समय राहुल राजनीतिक मसलों में दिलचस्पी नहीं रखते थे, सो मैं अपना फर्ज़ समझती हूं उनको याद दिलाना कि क्वात्रोकि का पैसा पूरी तरह से काला धन था। विजय माल्या के फरार होने का दोष जब लगाते हैं मोदी सरकार पर तो जरूरी है उनको इस बात की भी याद दिलाना कि माल्या एक जायज उद्योगपति हैं। उनके कारोबार, उनकी कंपनियां जायज हैं। उन्होंने बैंकों से पैसा लेकर लगाया किंगफिशर एयरलाइंस में इस उम्मीद से कि किंगफिशर एयरलाइंस को वे देश की सबसे बड़ी एयरलाइंस बना सकेंगे। ऐसा नहीं हुआ और यह पैसा डूब गया, लेकिन कम से कम उन्होंने क्वात्रोकी की तरह भारत की गरीब जनता का पैसा चोरी तो नहीं किया।

यह बात सच है कि जब से सोनिया गांधी ने राजनीति में कदम रखा और भारत के असली प्रधानमंत्री का रोल अदा करना शुरू किया, तब से उन्होंने बहुत कोशिश की है यह साबित करने की कि क्वात्रोकि से उनकी सिर्फ जान-पहचान थी, दोस्ती नहीं। यह बात भी लेकिन सच है कि हम जैसे लोग जो उन दिनों को अच्छी तरह याद रखते हैं, यह भी याद रखते हैं कि सोनियाजी के माता-पिता जब दिल्ली आते थे तो क्वात्रोकि अंकल के मेहमान बन कर उनके घर में रहा करते थे। यह भी याद है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद क्वात्रोकि साहब और उनकी मेमसाहब का कितना आना-जाना था प्रधानमंत्री निवास से।

चलिए पुरानी बातों को छोड़ देते हैं। लेकिन इस बात को तो याद रखना चाहिए कि2006 में क्वात्रोकि के लंदन स्थित बैंक खाते भारत सरकार के आदेश पर उनके हवाले कर दिए गए थे। इन खातों में दस लाख डॉलर से ज्यादा था और भारत सरकार ने प्रतिबंध लगाया था यह मान कर कि यह बोफोर्स के रिश्वत का पैसा था। इस रकम को क्वात्रोकि के हवाले किसके कहने पर किया गया? यहां यह भी कहना जरूरी है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अगर क्वत्रोकि को पकड़ कर वापस भारत लाने की कोशिश दिल से की होती तो आसानी से ला सकते थे। ऐसा उन्होंने क्यों नहीं किया, भगवान जाने!

अब न क्वात्रोकि का काला धन वापस लाया जा सकता है और न किसी और का। इसमें कोई शक नहीं है कि भारतीय राजनेताओं का बेशुमार काला धन विदेशों में छिपा हुआ है, लेकिन इतनी चतुराई से छिपाया गया है कि इसे ढूंढ़ निकालना आसान नहीं। कुछ छिपा के रखा गया है दुबई, लंदन और न्यूयॉर्क की जमीन-जायदाद में और कुछ छिपा हुआ है नकली कंपनियों में। इनका पता लगाना तकरीबन असंभव है, सो जब प्रधानमंत्री ने चुनाव अभियान के दौरान इसको वापस लाने का वादा किया था, वह न सिर्फ ‘चुनावी जुमला’ था, बल्कि झूठी बात थी। वैसे भी जीत रहे थे तो इस झूठी बात को कहने की जरूरत पता नहीं क्यों महसूस की! अब ये चुनावी जुमला हत्यारा बन गया है मोदी के दुश्मनों के हाथों में।

प्रधानमंत्री अगर वास्तव में काला धन समाप्त करना चाहते हैं तो उनको नियम-नीतियां ऐसी बनानी होंगी, जिनके द्वारा सरकारी खर्चों और सरकारी खरीदारी में पारदर्शिता शीशे की तरह साफ हो। समस्या यह है उनकी कि अपने मंत्रियों को अगर काबू में रख सकते हैं पूरी तरह, मगर उन अधिकारियों का क्या करेंगे, जिनको आदत पुरानी लगी हुई है जनता का पैसा खाने की! उनकी दूसरी समस्या यह है कि सबसे भ्रष्ट अधिकारी टैक्स विभाग में हैं, जिनका औपचारिक काम है चौकीदारी करना, मगर असली काम है उद्योगपतियों को डरा-धमका कर पैसे बनाना। ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की।’

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