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चर्चाः शिक्षा से रोटी का सवाल

अगर पाठ्यक्रम में रोजगार को भी अन्य विषयों की तरह शामिल कर रहे हैं, तो सर्वप्रथम रोजगार के आवश्यक उपकरण और प्रशिक्षित शिक्षक या पारंपरिक कारीगरों की व्यवस्था करनी होगी, शिक्षा और रोजगार के संयुक्त काम के निष्पादन का लगातार मूल्यांकन करना होगा और उसे परिणाम-मूलक बनाना होगा।

अगर पाठ्यक्रम में रोजगार को भी अन्य विषयों की तरह शामिल कर रहे हैं, तो सर्वप्रथम रोजगार के आवश्यक उपकरण और प्रशिक्षित शिक्षक या पारंपरिक कारीगरों की व्यवस्था करनी होगी, शिक्षा और रोजगार के संयुक्त काम के निष्पादन का लगातार मूल्यांकन करना होगा और उसे परिणाम-मूलक बनाना होगा।

रमेश दवे

शिक्षा को रोजगारपरक बनाने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है। इस दिशा में कुछ प्रयास भी हुए हैं, पर उल्लेखनीय नतीजे नजर नहीं आते। इसलिए पूरी शिक्षा व्यवस्था पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं। इससे पार पाने के मकसद से विज्ञान और तकनीकी पाठ्यक्रमों पर जोर दिया गया, मगर वहां भी अनुसंधान, शोध और उनसे रोजगार सृजन के क्षेत्र में उत्साहजनक परिणाम नहीं दिखते। शिक्षा और विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में अनुसंधान आदि को लेकर क्या स्थिति है, इस बार की चर्चा इसी पर।  – संपादक

शिक्षा का अर्थ तो है आगे बढ़ना, लेकिन पीछे मुड़-मुड़ कर देखने की ऐसी आदत हो गई है कि हमें वेदों में शिक्षा-शास्त्र और गणित के दर्शन होते हैं, उपनिषद हमारी चेतना पर तने हुए हैं और पुराणों की कथाओं से हम समाज को छलने लगे हैं। हमारा यह अतीत प्रेम हमें अपने समय का कोई कथा-पुराण रचने ही नहीं देता। नीतियों में भूख, रोटी और कर्म के बजाय आदर्शों का एक जादुई पिटारा रच दिया जाता है, जिसमें से सब कुछ तो निकलता है, लेकिन रोटी नहीं निकलती। समाज इतना संवेदन-शून्य है कि उसे सड़क के गड्ढों की जितनी चिंता है उतनी शिक्षा, शिक्षक, पाठ्यक्रम, परीक्षा आदि द्वारा किए गए गड्ढों की चिंता नहीं होती।

अब कोई भी दल, नेता, राजनीति या सरकार देश की राजनीति नहीं करती। वे देश की राजनीति के बजाय द्वेष की राजनीति में लगे हैं, इच्छाशक्ति के बजाय ईर्ष्या-शक्ति आजमा रहे हैं। आजादी के बाद का समाज भी अपने पुराने राजाओं, नवाबों और सामंतों के सजदे, सलाम और गुणगान से मुक्त नहीं हो पाया। शिक्षा ने प्रसार-प्रचार कर अपना विस्तार तो खूब किया, लेकिन ऐसी शिक्षा क्यों नहीं बनी कि समाज युद्ध मुक्त होता, आतंक मुक्त होता, अपराध मुक्त होता, घृणा-मुक्त होता? हम तो अच्छे काम की प्रशंसा भी इसलिए नहीं कर पाते कि अच्छा काम करने वाली सरकार हमारे दल की नहीं है। जब कोई सरकार जनता द्वारा बना दी जाती है तो वह दल की सरकार न होकर, देश, प्रदेश और जनता की सरकार होती है। मगर हम इसे भूल ही गए हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति कई बार बनी। वर्ष 1968 में, 1986-92 में और अब शायद 2020 में भी लागू हो जाए। पहले की दो नीतियों ने शब्द तो अच्छे दिए, विचार भी ठीक-ठाक दिए, लेकिन शब्द-बल, आत्मबल बन कर कलम से कर्म पैदा न कर सका, विचार हमें उदार नहीं बना सका। इसलिए नीतियों के पन्नों से अलग-अलग दलों के चेहरे तो झांकते नजर आते हैं, लेकिन इस देश की बालक, किशोर, युवा पीढ़ी और उनके वर्तमान या भविष्य के चेहरे दिखाई नहीं देते।

हम शिक्षा में आगे बढ़े तो क्या शिक्षा से एक चरित्रवान देश के रूप में आगे बढ़े? क्या हम अधिक ईमानदारी में बढ़े या सरकारी कामकाज में कथित रिश्वत और विलंब में आगे बढ़े? आगे बढ़ने का अर्थ है एक खुशहाल राष्ट्र का निर्माण। यह खुशहाल राष्ट्र क्या हमारी शिक्षा से बना? क्या हमने अपने बच्चों को राष्ट्र माना? क्या लोकतंत्र में संविधान, सरकार, न्याय-व्यवस्था, जन-प्रतिनिधि, सरकारी संस्था और संपत्ति और सर्वधर्म-समभाव आदि का सम्मान और उनकी रक्षा का ऐसा पाठ्यक्रम बनाया, जिससे लगता कि हमारा लोकतंत्र, लोक-आस्था का लोकतंत्र है?

जो भी शिक्षा व्यवस्था आज है, उसे अच्छी या खराब कह देने से शिक्षा का सही मूल्यांकन नहीं होता। जब तक हर सरकारी स्कूल, वहां की व्यवस्था, वहां का शिक्षक, बच्चों को राष्ट्र समझ कर काम नहीं करता और निजी स्कूलों से बेहतर नहीं हो जाता, तब तक यह कैसे कहा जा सकता है कि हमारा स्कूल आगे बढ़ा, शिक्षक आगे बढ़े, छात्र आगे बढ़े और इन सबसे मिल कर शिक्षा आगे बढ़ी। अगर हमारी सरकारी व्यवस्था अपने उपलब्ध बजट का ही सही इस्तेमाल करे, शिक्षक और शैक्षिक प्रशासन ईमानदार और संकल्पवान हो उठें तो इससे हमारी तेजस्वी पीढ़ी आगे बढ़ कर दिखा देगी। अगर हमारे उच्च-अध्ययन संस्थानों से निकलने वाले छात्र विश्व भर में जाकर भारतीय शिक्षा का गौरव बढ़ा रहे हैं, तो हमारे स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान क्या उत्कृष्टता का शिखर नहीं छू सकते?

सच पूछा जाए तो हमारा मानवीय चरित्र बिगड़ा है और राष्ट्रीय चरित्र, राष्ट्र शिक्षा और जन के प्रति ईमानदार नहीं रहा है। शिक्षा आज स्वैच्छिक और आत्मज्ञान का साधन बनने के बजाय संस्थागत ज्ञान में बदल गई है। संस्था का होना व्यवस्था का होना है। व्यवस्था का होना संसाधन, संरचना और समान अवसरों के नियमानुसार संयोजन का नाम है। देश का नागरिक अब प्रश्न करना भूल गया है या प्रश्न करना उसने छोड़ दिया है। आम नागरिक की शिक्षा-नीति और उसके क्रियान्वयन में कोई खास भूमिका भी नहीं होती। कुछ संभ्रांत वर्ग के उच्चाधिकार प्राप्त शिक्षाविद्, वैज्ञानिक, समाजकर्मी, राजनीतिक और प्रशासक नीति तय करते हैं, जिनमें दो-चार शिक्षक अपनी मौन उपस्थिति से बड़े अधिकारियों से सहमे-सहमे मूर्तिवत दिखाई देते हैं। संवाद अंग्रेजी में होने से जो जन-प्रतिनिधि, शिक्षक, समाजसेवी अंग्रेजी कम जानते हैं, वे हीन भावना से ग्रस्त होकर अपना मुंह नहीं खोल पाते। तात्पर्य यह कि शिक्षा नीति संभ्रांत समाज और भ्रांत प्रशासकों की मिलीजुली आत्म-सुविधायुक्त नीति होती है। बावजूद इसके नीति सिद्धांत रूप में आकर्षक और स्वीकृति योग्य मान कर लागू कर दी जाती है।

कुछ दार्शनिक किस्म के शिक्षाविदों, कुलपतियों, विचारकों का यह मत है कि शिक्षा क्षमता पैदा करने का माध्यम है, रोजगार देने का नहीं। यह धारणा अब बदलनी होगी, क्योंकि अधिकांश अच्छे रोजगार तो शिक्षा ही पैदा कर रही है। गरीब तो अपना रोजगार या तो खुद पैदा कर लेता है या भीख मांग लेता है। इस देश में आजादी के पहले भी गरीब भूखा था और आज भी पूरा भूखा न सही, आधा भूखा तो है ही, पूरा घर उसके पास नहीं तो रैन बसैरे का चबूतरा तो उसके पास है ही। शिक्षा न तो भूख से लड़ने का हथियार है, न रोजी कमाने का हाथ। अक्षरों और अंकों की दुनिया में आकर सीखने वाला बाल, किशोर, युवा अपने आसपास की दुनिया से सीखना ही भूल जाता है।

अगर पाठ्यक्रम में रोजगार को भी अन्य विषयों की तरह शामिल कर रहे हैं, तो सर्वप्रथम रोजगार के आवश्यक उपकरण और प्रशिक्षित शिक्षक या पारंपरिक कारीगरों की व्यवस्था करनी होगी, शिक्षा और रोजगार के संयुक्त काम के निष्पादन का लगातार मूल्यांकन करना होगा और उसे परिणाम-मूलक बनाना होगा। माना कि शिक्षा से समाज का सशक्तिकरण होता है, लेकिन समाज को शक्ति के वे उपकरण भी देने होंगे, जो पढ़ने, खेलने और कुछ काम करने को प्रेरित करें। नीतियां तब तक बुरी नहीं होतीं, जब तक उन्हें इरादतन बुरा न बनाया जाए। शिक्षा में जबसे सवर्ण, अवर्ण, अल्पसंख्यक, दलित, जनजाति आदि के भेद किए गए, तबसे शिक्षा में भी जातिवाद उभरा और सामाजिक तनाव पैदा होने लगे।

इसी प्रकार भाषाओं को सीमित क्षेत्र में कैद कर दिया गया। गांधी, तिलक, रवींद्रनाथ, सुनीति कुमार चटर्जी, सुभाष बोस आदि सभी महान विचारकों ने आजादी के पहले हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात कही थी, लेकिन आज तो राष्ट्र, राष्ट्रीयता, राष्ट्रभाषा, राष्ट्रगान, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक सबके सब विवाद का विषय बन गए हैं। हम चाहे जिस धर्म का पालन करें, धर्म हमें उदार बनाने के बजाय संकीर्ण बना रहा है। इसका स्पष्ट अर्थ है शिक्षा मनुष्य में मनुष्यगत गुणों के निर्माण और विस्तार में विफल हो गई है।

अब फिर तीसरी बार एक संपूर्ण शिक्षा नीति आ रही है। सामयिक परिवर्तनों, विकास और चुनौतियों के आधार पर नीति में भी परिवर्तन आवश्यक तो है, लेकिन नीतियों की आंखों पर दलों, विचारधाराओं, जातियों आदि का चश्मा न लगाया जाए। शिक्षा से अच्छे इंसान का निर्माण हो, वे इंसानियत का पाठ्यक्रम पढ़ें और इंसानियत आजमाने के इम्तहान में पास हों, तभी देश आगे बढ़ेगा। शिक्षा-नीति आज तक ऐसा रूप क्यों न ले सकी कि हर हाथ में रोटी कमाने की ताकत और क्षमता हो। हमारी शिक्षा को ऐसा होना चाहिए, जिसमें एक पाठ्यपुस्तक रोटी कमाने के हुनर भी दे। रोटी जीवन की मांग है और देश की हर छात्रा-छात्र अगर रोटी के पाठ्यक्रम में सफल हो जाए तो शिक्षाशास्त्र वास्तव में रोटी-शास्त्र बन कर देश को बेरोजगारी और बेरोजगारों की निराश भीड़ से मुक्त कर सकता है।

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