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विशेष: नीति, दृष्टि और भारतीय भाषाएं

नीति में एक तरफ शास्त्रीय भाषाओं तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम एवं उड़िया से जुड़े संस्थाओं के अकादमिक महत्त्व के देखते हुए उनको विभिन्न विश्वविद्यालयों से जोड़ने का सुझाव है, तो पालि, प्राकृत एवं फारसी भाषाओं के लिए नए संस्थान बनाने पर भी जोर दिया गया है, ताकि देश के कला, इतिहास एवं परंपरा आदि पर बेहतर शिक्षण एवं शोध हो सके।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह पहला राष्ट्रीय प्रयास है, जिसमें भारतीय भाषाओं के बारे में समग्रता से विचार किया गया है।

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी
राष्ट्रीय शिक्षा नीति लगभग पांच वर्षों की तैयारियों के बाद सामने आई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह पहला राष्ट्रीय प्रयास है, जिसमें भारतीय भाषाओं के बारे में समग्रता से विचार किया गया है। नीति में भाषा की केंद्रीयता को इस बात से भी समझा जा सकता है कि 66 पन्ने के इस प्रारूप में 206 बार ‘भाषा’ शब्द आया है, जिनमें से 126 बार बहुवचन के रूप में और 80 बार एकवचन के रूप में। यहां बहुवचन रूप के आधिक्य का होना इस बात को स्थापित करता है कि किसी एक भाषा और संस्कृति की बात न करके सभी भाषाओं पर केंद्रित बहुलता पर जोर दिया गया है। शिक्षा नीति में यह आत्म-स्वीकृति कि ‘विगत वर्षों में भाषाओं के प्रति यथोचित ध्यान नहीं दिया गया है’ एक महत्त्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु की तरह दिखता है।

देश में भाषाओं के भी कई स्तर हैं, जिनमें राजभाषा, शास्त्रीय भाषा, आठवीं अनुसूची की भाषा जैसी कोटियां तो अब तक अपना स्थान बना पाई थीं, लेकिन संकटग्रस्त भाषा का जिक्र समेकित रूप से नीतिगत दस्तावेज में पहली बार सामने आया है। इस नीति में यूनेस्को द्वारा घोषित 197 भाषाओं की चर्चा के साथ लिपिहीन और संकटग्रस्त भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की चिंता दिखती है। हालांकि यूनेस्को की सूची से इतर देखें, तो भाषाई संकटग्रस्तता एक अवस्था है, जो भारतीय बहुभाषिकता की अधिक्रमिकता में अधिक स्पष्ट दिखती है। ऐसा नहीं है कि भाषाई संकटग्रस्तता का दबाव सिर्फ सुदूर की जनजातीय भाषाओं पर है, बल्कि यह कमोबेश सभी भारतीय भाषाओं पर है। इसमें आठवीं अनुसूची की भाषाएं तो हैं ही, वे भाषाएं भी हैं जिन्हें शास्त्रीयता का दर्जा मिल चुका है।

यदि जनगणना के आंकड़ों के आधार पर देखें तो विगत 30-40 वर्षों में प्राय: बड़ी भाषाओं के बोलने वालों की संख्या क्रमश: कम हुई है, जबकि देश और उस क्षेत्र की आबादी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में यह उचित ही है कि आठवीं अनुसूची सहित सभी भाषाओं को शिक्षण एवं अध्ययन की भाषाओं के रूप में विकसित किए जाने के प्रावधान इस शिक्षा-नीति में हैं। इसके लिए उच्च गुणवत्ता की मुद्रण-सामग्री के निर्माण के साथ पाठ्यपुस्तकें, वीडियो-निर्माण, नाटक, कहानी, कविताएं, कोश, उपन्यास, पत्रिकाएं, वेब-सामग्री आदि के सृजन एवं प्रसार पर जोर दिया गया है।

साथ ही शब्द-संपदा को अनवरत अद्यतित करने और उनके प्रसार का प्रस्ताव है, जिससे हमारी भाषाएं अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, हिब्रू, कोरियाई और जापानी भाषाओं के समक्ष खड़ी हो सकें। इसके साथ ही मातृभाषा या प्रथम भाषा में न्यूनतम प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के व्यवस्था की परिकल्पना की गई है। बच्चों में समझ विकसित करने एवं आगे की शिक्षा के लिए क्षमता का निर्माण करने की बात तो निहायत सराहनीय है। शिक्षा-मनोविज्ञान और भाषाई संवर्धन की दृष्टि से मातृभाषा या प्रथम भाषा में न्यूनतम कक्षा पांच तक की पढ़ाई का भी प्रस्ताव 2030 तक ‘समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करना और सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को बढ़ावा देना जैसे लक्ष्यों को पाने के लिए ऐसे प्रस्ताव महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन चुनौतियां बहुत हैं। देश में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति दयनीय है। छात्र शिक्षक का अनुपात, ढांचागत सुविधाएं, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल के सामान आदि की स्थिति दयनीय है। जबकि शिक्षकों के प्रबंधकीय कौशल का बढ़ा हिस्सा मध्याह्न भोजन की व्यवस्था में चला जाता है।

अभी एक स्थिति ऐसी भी आएगी, जिसमें मातृभाषा के चिह्नांकन के प्रश्नों से प्रशासन को गुजरना पड़े, साथ ही एक बहुभाषिक कक्षा का प्रबंधन हमेशा से चुनौती पूर्ण रहा है। सघन बहुभाषिकता वाले अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम या नगालैंड जैसे राज्यों में किसी प्राथमिक विद्यालय की एक कक्षा में मातृभाषा में शिक्षण निसंदेह बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में भाषा शिक्षकों का समूह तैयार किए जाने पर जोर दिया जाना भी महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ ही बचपन से ही बच्चों में कला, साहित्य, संगीत, शिल्प के साथ आगे के अध्ययनों अनुवाद एवं निर्वचन, संग्रहालय प्रशासन, पुरातत्व, कला संरक्षण, ग्राफिक डिजाइन और वेब-डिजाइन में उच्च गुणवत्ता वाले कार्यक्रम के विकास के साथ छात्रों में रचनात्मक क्षमता का निर्माण किए जाने का प्रस्ताव महत्वपूर्ण है। साथ ही इन्हें सीधे रोजगार से जोड़े जाने की भी बात है, जिससे न सिर्फ स्थानीय संस्कृति, ज्ञान एवं भाषाओं का विकास होगा, बल्कि रोजगार के नए क्षेत्र सृजित होंगे।

त्रिभाषा सूत्र और बहुभाषिकता को स्थानीय शिक्षा प्रणाली में सहेजने पर जोर दिया गया है। यह पाया गया है कि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के भाषा के विभाग सिर्फ साहित्य पढ़ाने में संलग्न है और पूरे पाठ्यक्रम के ढांचे में भाषा की प्रयोजनमूलकता, भाषा-शिक्षण एवं व्यवहार, व्याकरण, कोश, भाषा-शास्त्रीय आलोचना या पाठ-विश्लेषण की प्रवृत्ति से अपने आप को दूर रखे हुए हैं। ध्यान रहे कि इन्हीं विश्वविद्यालयों में यदि विदेशी भाषा में पढ़ाई हो रही हो, तो उनमें सिर्फ साहित्य नहीं, बल्कि साहित्येतर प्रसंगों एवं भाषा संरचना पर भी जोर दिया जाता है।

इस नीति में एक तरफ शास्त्रीय भाषाओं तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम एवं उड़िया से जुड़े संस्थाओं के अकादमिक महत्त्व के देखते हुए उनको विभिन्न विश्वविद्यालयों से जोड़ने का सुझाव है, तो पालि, प्राकृत एवं फारसी भाषाओं के लिए नए संस्थान बनाने पर भी जोर दिया गया है, ताकि देश के कला, इतिहास एवं परंपरा आदि पर बेहतर शिक्षण एवं शोध हो सके। साथ ही इसमें अनुवाद के नाम पर एक अलग से संस्थान बनाने की पेशकश की गई है। हालांकि 2005 में स्थापित राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के सुझाव के अनुरूप राष्ट्रीय अनुवाद मिशन पहले से कार्यरत है और इसी को एक संस्थान का रूप दिया जा सकता है। भारत एक बहुभाषिक देश है और इस बहुभाषिकता से न्याय करना इस राष्ट्रीय नीति का एक उचित प्रस्ताव दिखता है। अब आगे देखना है कि इसका अमल किस रूप में होता है क्योंकि इनमें से कुछ नीतियां जैसे मातृभाषा पर जो देना, त्रिभाषा सूत्र आदि तो पहले से भी सामने थे, लेकिन उनके अनुपालन का कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ है।

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