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संपादकीयः पद के खेल

देश में अलग-अलग खेल संघों में प्रमुख पदों पर राजनीतिकों या खेल की दुनिया से इतर दूसरे क्षेत्र के लोगों के काबिज रहने पर सवाल उठते रहे हैं।

Author Published on: November 2, 2017 3:14 AM
अगर खेल संघों के चुनावों से संबंधित आचार संहिता में यह शर्त है कि इसमें कोई पदाधिकारी एक पद पर चार-चार साल के दो कार्यकाल बिताने के बाद अगले चार साल तक उसी संघ में किसी और पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकता, तो प्रफुल्ल पटेल को किस आधार पर एआइएफएफ का अध्यक्ष तीसरी बार चुन लिया गया था!

देश में अलग-अलग खेल संघों में प्रमुख पदों पर राजनीतिकों या खेल की दुनिया से इतर दूसरे क्षेत्र के लोगों के काबिज रहने पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन इसे दुरुस्त करने के लिए अब तक कोई ठोस पहलकदमी नहीं हो सकी है। बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने एआइएफएफ यानी अखिल भारतीय फुटबॉल संघ के अध्यक्ष पद पर पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल के चुनाव को जिन बिंदुओं पर रद्द किया है, उससे स्वाभाविक ही यह सवाल फिर से उठा है कि खेल संघों पर राजनीतिकों, पूर्व नौकरशाहों या कारोबारियों के कब्जे का हासिल क्या रहा है! गौरतलब है कि एआइएफएफ के चुनाव में प्रफुल्ल पटेल को तीसरी बार अध्यक्ष चुना गया था, जिसकी मान्यता अदालत ने इस आधार पर रद्द कर दी कि चुनाव प्रक्रिया में राष्ट्रीय खेल संहिता का पालन नहीं किया गया।

सवाल है कि क्या चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोग आचार संहिता में दर्ज नियम-कायदों से इतने अनजान थे? अगर खेल संघों के चुनावों से संबंधित आचार संहिता में यह शर्त है कि इसमें कोई पदाधिकारी एक पद पर चार-चार साल के दो कार्यकाल बिताने के बाद अगले चार साल तक उसी संघ में किसी और पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकता, तो प्रफुल्ल पटेल को किस आधार पर एआइएफएफ का अध्यक्ष तीसरी बार चुन लिया गया था! अगर हाईकोर्ट को उनके चुनाव को रद्द करना पड़ा, तो क्या यह एक असहज करने वाली स्थिति नहीं है?

जाहिर है, ताजा मामला फुटबॉल संघ में शीर्ष पद पर काबिज होने के लिए नियमों को दरकिनार करने का है। लेकिन इसके अलावा भी ज्यादातर खेलों के विकास के लिए गठित संगठनों या संघों में ऊपर के पदों पर काबिज होने के लिए नेताओं, नौकरशाहों और बड़े कारोबारियों के बीच एक तरह की होड़ मची रहती है। यह राज्य से लेकर केंद्रीय स्तर तक के खेल संगठनों में दिखता है। युवा मामलों का मंत्रालय, खेल मंत्रालय, भारतीय खेल प्राधिकरण, भारतीय ओलंपिक संघ, राज्य ओलंपिक संघ और राष्ट्रीय खेल फेडरेशन आदि पर वित्त और संसाधन मुहैया कराने के अलावा खेल प्रतिभाओं की तलाश और उन्हें निखारने की जिम्मेदारी है। लेकिन यह छिपा नहीं है कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में हमारी क्या स्थिति रही है। इन संघों में जवाबदेही वाले पदों पर बैठे लोग उससे जुड़े लाभ उठाने में नहीं हिचकते, मगर इस पर गौर करना उन्हें जरूरी नहीं लगता कि खेल की एक सम्मानजनक तस्वीर तैयार हो।

इस हालत में सुधार के लिए सामने आए सुझावों में यह बात मुख्य रूप से कही जाती रही है कि विभिन्न खेल संघों में शीर्ष पदों पर राजनीतिकों के बजाय संबंधित खेलों के अनुभवी विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाए। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट भी अफसोस जता चुका है कि खेल का प्रशासन वैसे लोगों के हाथों में होता है जिनका खेलों से कोई लेना-देना नहीं होता; खेल की कीमत पर खेल संघों को संचालित किया जाता है। लेकिन लंबे समय से यह सवाल बहस के केंद्र में होने के बावजूद आज भी ज्यादातर खेल संघों में शीर्ष पदों पर संबंधित खेलों के विशेषज्ञ चेहरे शायद ही कहीं दिखते हैं। यह बेवजह नहीं है कि अलग-अलग खेलों में काबिल खिलाड़ी तो हैं, लेकिन उनके उचित प्रशिक्षण के इंतजाम से लेकर बाकी सुविधाएं उन्हें इस स्तर का नहीं बना पातीं कि वे विश्व स्तर के खिलाड़ियों को मैदान में मात दे सकें। अगर कोई खिलाड़ी अपने बूते अच्छा प्रदर्शन करता है तो समूचे देश को खुशी मिलती है, लेकिन यह सवाल पीछे रह जाता है कि खिलाड़ियों को मुकाबले के लिए तैयार करने में खेल संघों की जिम्मेदारी बनती है या नहीं!

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