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जर्मनी में भी अदालत और सरकार के अधिकारों पर बहस

जर्मनी में यह पहला मामला है जब सरकार के एक अंग ने दूसरे अंग पर इतना बड़ा जुर्माना किया हो। बोखुम शहर को प्रांतीय सरकार और कंज़रवेटिव राजनीतिज्ञों का भी समर्थन मिला है क्योंकि सामी ए को इस्लामी कट्टरपंथी और समाज के लिए भावी खतरा माना जा रहा है। उसने ऊंची अदालतों में अपील कर मामले को अपने पक्ष में करने की कोशिश की पर नाकाम रहा।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

जर्मनी संघीय संसदीय लोकतंत्र है। यहां के लोग देश को कानून आधारित राज्य कहते नहीं अघाते। हालांकि इस समय एक मामले में न्यायपालिका और कार्यपालिका में सही मायने में द्वंद्व छिड़ा है। मामला अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के संदिग्ध बॉडीगार्ड रहे एक शरणार्थी को अदालत की अवहेलना कर वापस उसके देश ट्यूनिशिया भेजने का है। दोनों के अपने अपने रुख पर टिके रहने के कारण मामला कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की शक्ल लेता जा रहा है। जर्मनी की सार्वजनिक बहस में अक्सर जर्मनी के कानूनसम्मत राज्य होने की चर्चा होती है। इसका मतलब एक ओर कानून में भरोसे से है कि हर हाल में अपराध की जाँच होगी और हर अपराध के लिए अपराधी को सजा मिलेगी तो दूसरी ओर लोकतंत्र में सत्ता के बँटवारे के सिद्धांत से भी है कि विधायिका का काम कानून बनाना, कार्यपालिका का काम उन्हें लागू करना और न्यायपालिका का काम क़ानून की संवैधानिकता और कार्यपालिका के फैसलों के कानूनसम्मत होने की जाँच या पुष्टि करना है।

आम तौर पर लोकतंत्र के अलग अलग खंभों के प्रतिनिधि एक दूसरे का सम्मान करते हैं, एक दूसरे की बेवजह आलोचना नहीं करते और संस्थाओं को नुकसान पहुँचाने से बचते हुए मतभेदों की स्थिति में बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं, लेकिन टकराव की स्थिति नियमित रूप से पैदा होना लोकतांत्रिक दायित्व के बँटवारे में निहित है। अदालतों को कानून की संवैधानिकता या प्रशासनिक फैसले की क़ानूनी वैधता की पुष्टि का अधिकार है। चूंकि हर उलट फैसला संसद और सरकारों के लिए मुश्किलें पैदा करता है, फिर टकराव की संभावना स्वाभाविक है। जर्मनी के रुअर इलाक़े में बोखुम शहर में एक शरणार्थी से जुड़ा मामला ताजा टकराव की वजह है। रुअर घाटी में कभी औद्योगिक केंद्र रहे बोखुम शहर के करीब पौने चार लाख की आबादी में 21 प्रतिशत लोग विदेशी मूल के हैं। बेरोजगारी लगभग दस फीसदी है और शरणार्थी संकट के दौर में वहाँ भी शरणार्थियों के मुद्दे पर ध्रुवीकरण हुआ है। विदेशी विरोधी पार्टी एएफडी की सक्रियता बढ़ी है और ठुकराए गए शरणार्थियों को वापस भेजने की माँग ने भी जोर पकड़ा है। इसी राजनैतिक माहौल में बोखुम शहर ने ओसामा बिन लादेन के संदिग्ध बॉडीगार्ड रहे सामी ए को ट्यूनिशिया भेजने का फ़ैसला किया। समस्या ये थी कि अदालत में यह मुक़दमा चल रहा था कि सामी ए को ट्यूनिशिया भेजे जाने पर वहाँ उसके उत्पीड़न और यातना का खतरा है। कानून किसी को ऐसे देश में भेजने की अनुमति नहीं देता जहाँ हिरासत में उत्पीड़न का खतरा हो, लेकिन अदालत के फैसले से पहले ही सामी ए को वापस भेज दिया गया। शहर प्रशासन की कार्रवाई से नाराज अदालत ने सामी ए को सरकारी खर्च पर वापस लाने का आदेश दिया और ऐसा नहीं करने पर 10,000 यूरो का जुर्माना भी किया।

जर्मनी में यह पहला मामला है जब सरकार के एक अंग ने दूसरे अंग पर इतना बड़ा जुर्माना किया हो। बोखुम शहर को प्रांतीय सरकार और कंज़रवेटिव राजनीतिज्ञों का भी समर्थन मिला है क्योंकि सामी ए को इस्लामी कट्टरपंथी और समाज के लिए भावी खतरा माना जा रहा है। उसने ऊंची अदालतों में अपील कर मामले को अपने पक्ष में करने की कोशिश की पर नाकाम रहा। अब प्रांतीय हाई कोर्ट ने भी सामी ए को ट्यूनिशिया से वापस लाने के निचले अदालत के फ़ैसले की पुष्टि कर दी है। ऐसा पहली बार नहीं है जब अदालत ने शरणार्थियों के मामले में सरकारी फ़ैसले को उलट दिया हो। इसी साल कुछ मामलों में वापस भेजे गए लोगों को फिर से जर्मनी लाया गया है क्योंकि उनके शरण आवेदन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। यह मामला इसलिए भी सुर्ख़ियाँ बटोर रहा है कि सामी ए को वापस भेजने की ज़िम्मेदारी नॉर्थराइन वेस्टफेलिया प्रदेश के रिफ्यूजी मामलों के मंत्री योआखिम स्टांप ने खुद अपने ऊपर ली थी और इसे कानूनसम्मत बताया था। जबकि हाई कोर्ट ने उसे गैरकानूनी बताया है। अब प्रांत के गृहमंत्री हर्बर्ट रॉयल ने यह कहकर बहस को और हवा दे दी है कि जजों को फैसला सुनाते हुए इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि फैसला लोगों की न्याय भावना के अनुरूप हो।

प्रशासनिक कानून के प्रोफ़ेसर हाइनरिष वोल्फ इसे संविधान के खिलाफ बताते है जहाँ लिखा है कि जजों को सिर्फ न्याय और कानून के हिसाब से फैसला करना है। जर्मनी के वकीलों के संघ ने भी रॉयल के बयान की आलोचना की तो जजों के संघ के प्रमुख येंस ग्नीजा ने प्रांतीय गृहमंत्री पर जीवंत लोकतंत्र के लिए जरूरी न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला करने का आरोप लगाया। हालाँकि रॉयल ने इस बीच अपना बयान वापस ले लिया है लेकिन सोशल मीडिया पर भी उनकी कड़ी आलोचना हुई है और आलोचकों ने ध्यान दिलाया है कि नाजी तानाशाही के दौरान फैसले लोगों की “न्याय भावना” के अनुरूप लिए जाते थे। बात बिगड़ता देखकर जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल को भी इस बहस में कूदना पड़ा। अपनी पार्टी के सदस्य हर्बर्ट रॉयल के बयान को काटते हुए चांसलर ने कहा, “हमारे लिए तथ्य ये है कि स्वतंत्र अदालतों के फैसलों को मानना है और उन्हें हमें लागू करना है।”

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