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बेबाक बोलः बेरहम बिसात

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के मेधावी छात्र रोहित वेमुला की मौत से दर्दनाक कुछ हो नहीं सकता। लेकिन उससे भी ज्यादा हौलनाक है भारतीय राजनीति का वो अहंकारी चेहरा जो इस घटना के बाद नुमायां हो रहा है।

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के मेधावी छात्र रोहित वेमुला की मौत से दर्दनाक कुछ हो नहीं सकता। लेकिन उससे भी ज्यादा हौलनाक है भारतीय राजनीति का वो अहंकारी चेहरा जो इस घटना के बाद नुमायां हो रहा है। सत्ता के घमंड के खौफ से एक कमजोर तबके का आदमी खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है। एक अदने से विद्यार्थी के खिलाफ पूरी सरकार खड़ी हो जाती है। एक होनहार की मौत के दोषियों को सजा दिलाने के बजाए एक पक्ष की तरह खड़ी सरकार कह रही है कि इसमें हमारा कोई हाथ नहीं।

पिछले दिनों संसद में संविधान निर्माण में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के योगदान पर चर्चा के दौरान अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार अधिनियम में जाति के आधार पर क्रूरता बरतने को लेकर नए प्रावधान पास किए गए थे। इसके तहत जाति के आधार पर क्रूरता बरतने वालों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान है। और इसके कुछ समय बाद रोहित की मौत होती है। उसकी खुदकुशी के पच्चीस दिन पहले से यह मामला उबल रहा था। लेकिन तब तो न कांग्रेस ने और न अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर कोई सवाल उठाया।

देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा विज्ञान संस्थान एम्स में पिछले दिनों कमजोर तबके से आए छात्रों की खुदकुशी के मामलों के बाद बनी सुखदेव थोराट कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कहा था कि देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव जारी है। इस रिपोर्ट के आने के बाद किसी भी सियासी दल ने समाज के समीकरण सुधारने के लिए कोई पहल तो नहीं की, हां रोहित की मौत की जमीन पर अपनी सियासत चमकाने जरूर चले गए। क्या हमारे समाज में जाति ऐसी भुलाई गई सी चीज है कि उस पर बोलने के लिए सियासी दलों को रोहित की मौत का इंतजार करना पड़ा।

अपनी आंखों में कार्ल सगान जैसा विज्ञान लेखक बनने का ख्वाब संजोए रोहित ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रांगण में पदार्पण किया। लेकिन जल्द ही उसका यह ख्वाब धुंधला पड़ना शुरू हो गया और उसकी पराकाष्ठा अगस्त 2015 में हुई जब केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय और एक अन्य केंद्रीय मंत्री के दबाव में विश्वविद्यालय के कुलपति ने उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की। कारण रोहित और उसके चार साथियों द्वारा मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के खिलाफ किया गया एक प्रदर्शन था। उसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेताओं से झगड़ा और रोहित का विश्वविद्यालय से निलंबन उसे अकेला करता गया। छात्रों को राजनीति न करने की सलाह देने वाले विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक खास तरह की राजनीति के आगे समर्पण करते हुए रोहित को हर तरफ से अकेला छोड़ दिया। जकड़े गए जनतंत्र से ऊब कर रोहित मौत के रास्ते पर बढ़ गया।

देश जातिवाद के चंगुल में किस तरह से जकड़ा हुआ है इसका सबूत दिखाने के लिए शायद रोहित की मौत भी नाकाफी रही। तभी तो केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी रोहित की मौत की इंसाफ कराने का भरोसा दिलाने के बजाए कहती हैं कि रोहित की मौत को जाति से न जोड़ा जाए। हम यह उम्मीद नहीं करते कि ईरानी जी अखबारों में सैकड़ों की संख्या में छपी उन खबरों को खुद पढ़ें जो बताती हैं कि देश के सैकड़ों स्कूल में सवर्ण परिवारों के बच्चे मिड डे स्कूल का खाना इसलिए नहीं खाते कि खानसामा दलित है।

लेकिन उनके भारी-भरकम मंत्रालय के नौकरशाह और सलाहकार तो उन्हें बता सकते हैं कि पेट में भूख होने के बाद भी बच्चा स्कूल परिसर में अपनी जातिगत शुद्धता बनाए रखने की जद्दोजहद करता है। स्कूल परिसर में उसे जाति व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करना नहीं अपने उपनाम पर गर्व करना सिखाया जाता है। तो क्या ऐसे बच्चे महज बड़े होकर और हैदराबाद विश्वविद्यालय में पहुंचने भर से ही जात-पात को भुलाकर सिर्फ आधुनिक और वैज्ञानिक मूल्यों के साथ सोचने लगेंगे। अगर मानव संसाधन मंत्री की मुखिया ऐसा मानती हैं तो उन्हें आगे भी ऐसे विरोधाभासों को झेलने के लिए तैयार रहना होगा।

जरा इस पर भी ध्यान दें कि मामले को जाति के नजरिए से नहीं देखने की गुहार लगाने वालीं मंत्री जी रोहित की जाति की स्थिति पर भी गलतबयानी कर बैठती हैं, मंत्रियों और फैक्ट फाइंडिंग सदस्यों का जातिवार आंकड़ा भी देना नहीं भूलती हैं आधे-अधूरे होमवर्क के साथ। इतने अहम महकमे की मुखिया इतने संवेदनशील मुद्दे पर कमजोर तबकों के बीच भरोसा पैदा करने के बजाए उन्हें एक नए खौफ में डाल देती हैं।

इससे बड़ी त्रासदी और क्या होगी कि रोहित की योग्यता उसकी खासियत न बन सकी लेकिन अस्मिता आधारित राजनीति उसका अपराध जरूर बन गई। अपराध भी इतना बड़ा कि प्रदेश के एक ताकतवर राजनेता ने उस पर राष्ट्रविरोधी होने तक का इल्जाम लगाया और फिर इसी आरोप को मानव संसाधन मंत्रालय ने भी अनुमोदित कर दिया। और विश्वविद्यालय प्रशासन भी भावनाएं भड़काने की राजनीति वाले एजंडे के आगे झुकने के बजाए लेट गया। रोहित मामले में एक ही प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने दो तरह की रिपोर्ट दी। क्या यह दो तरह की रिपोर्ट यह बताने के लिए काफी नहीं है कि संस्थानों को सियासत किस तरह प्रभावित कर रही है।

इस घटना ने यह कड़वा सच भी सामने ला दिया कि देश में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता सिर्फ कागजी है। विरोध को दबाने के लिए हैदराबाद के राजनेता दिल्ली तक पहुंच गए, वहीं देश के दिल में बसे दिल्ली विश्वविद्यालय में राम मंदिर पर सेमिनार का आयोजन हुआ। यह सोचना होगा कि देश में उच्च शिक्षा किस दिशा में जा रही है? यह तय है कि देश में स्वायत्तता के बावजूद विश्वविद्यालयों को केंद्र और राज्य सरकारों पर आश्रित बना कर रखा गया है। आर्थिक निर्भरता के कारण ही सरकारें विश्वविद्यालयों के प्रशासन में अपना पूर्ण दखल रखती हैं। ऐसे उदाहरण भी हैं जहां किसी एक विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति में इसलिए विलंब किया गया कि एक खास जाति का प्रत्याशी नहीं मिल पा रहा था। फिर एक सेवानिवृत्त फौजी को लगाया गया।

मुद्दा यह है कि ऐसा दखल देश की शिक्षा को किस दिशा में ले जाएगा? इसकी शुरुआत तो खैर बहुत पहले ही हो गई थी। विश्वविद्यालयों के कामकाज और उनके प्रशासन में दखलअंदाजी से कांग्रेस समेत कोई भी पार्टी अछूती नहीं। चूंकि इस हमाम में सब नंगे हैं इसलिए उनके एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप बस हास्यास्पद ही हैं। जरूरत यह है कि विश्वविद्यालयों को सही मायनों में स्वायत्तता देने की पहल हो। अभी तो विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था में भी धड़ल्ले से राजनेताओं की घुसपैठ है जिसका खत्म होना शायद ही संभव नहीं। लेकिन इतना तो हो ही सकता है कि यहां के रोजमर्रा के कामकाज में राजनेताओं का जबरन दखल न हो।

आत्महत्या से पहले लिखे खत की रोशनी में रोहित की मौत से खुद को बरी करने वाली भारतीय जनता पार्टी कितनी सुविधा से उस खत को भूल गई जो कुछ अरसा पहले रोहित ने ही विश्वविद्यालय के कुलपति को लिखा और गुजारिश की कि दलित छात्रों के साथ जो व्यवहार हो रहा है उसके कारण हर दलित छात्र के कमरे में एक रस्सी या जहर मुहैया कराया जाए ताकि वह अपने प्राण ले सके। और मंत्री जी इसी बात पर खुश हैं कि पत्र में उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। व्यवस्था बनाने के जिम्मेदार रोहित की मौत के जिम्मेदार आरोपियों में अपना सीधा नाम खोज रहे हैं।

किसी भी तरह के विरोध को राजसमर्थन या राजद्रोह से जोड़ना अपनी तरह का अतिवाद है जिसका बेशर्म प्रदर्शन हैदराबाद में हुआ और जिस पर किसी को क्षोभ भी नहीं। ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ दिखाना इतना भारी पड़ सकता है कि आपको हॉस्टल से निकाला जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखपत्र ‘पाञ्चजन्य’ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बता कर खुद को स्वत: सत्यापित राष्ट्रभक्ति का प्रमाण पत्र जारी कर देता है। गांधीवादी प्रोफेसर संदीप पांडेय को नक्सली बताकर बीएचयू से बेदखल कर दिया जाता है। इस तरह वैचारिक मतभेद को राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रद्रोह से जोड़ना राजनीतिक मोतियाबिंद से अधिक कुछ भी नहीं।
विश्वविद्यालय परिसरों में पसरा वैचारिक मतभेद ही वहां की खूबसूरती है। एकरूपता तो तानाशाही और फासीवाद की निशानी है। मुद्दों पर मतभेद अगर उच्च शिक्षा केंद्रों में नहीं होंगे तो कहां होंगे? लेकिन भाजपा के सुप्रीम वकील सुब्रमण्यम स्वामी तो हर मतभेद के स्वर को नक्सली और राष्टÑविरोधी की संज्ञा दे बैठते हैं। पूरी दुनिया में अपनी साख बना चुके जेएनएयू को राष्टÑविरोधियों का अड्डा कहने का चलन दिल्ली से शुरू होता है और देश के हर कोने में सत्ता से अलग सोच रखने वालों के खिलाफ बागी-बागी का हल्ला बोल शुरू हो जाता है।

यह सच है कि समाज की व्यवस्था राजनीति से चलती है और राजनीति की चाल समाज तय करता है। तो फिर आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि विश्वविद्यालय परिसर सियासी और राजनीतिक तनाव से अलग रहेंगे। और फिर यह कौन तय करेगा कि एबीवीपी जो करे वह राजनीति नहीं और जय भीम बोलने वाले राजनीतिज्ञ हो गए। हां, विश्वविद्यालयों में अगर कुछ सवालिया है तो वह है राजनीतिक दखल और राजनीतिक मौकापरस्ती जिसका इस मामले में भद्दा प्रदर्शन हुआ है।

जो भी सरकार आती है वह देश के शिक्षा संस्थानों की कलम में अपनी राजनीति के रंग की स्याही भरने की सियासत करती है। बेहतर हो कि सरकार विश्वविद्यालयों को राजनीतिक विचार का अड्डा ही बना रहने दे न कि उन्हें राजनीतिक मंच बना दे।
रोहित की मौत केंद्र सरकार के लिए एक बड़ा सबक है, अगर वह लेना चाहे तो। भाजपा की अगुआई वाली सरकार के आने के दिन से ही भावनाओं को भड़काने की राजनीति का खेल शुरू हो गया। गिरिराज सिंह हो, साध्वी प्राची या फिर कैलाश विजयर्गीय व सुब्रमण्यम स्वामी। ये तो एक बार किसी को राष्टÑद्रोही बताकर या पाकिस्तान जाने का आदेश सुना कर चुप हो जाते हैं। लेकिन इनके बयानों का असर दूर बैठे रोहित पर कैसे पड़ता है यह हमारे समाज और राजनीति के लिए नया अनुभव है। इसके साथ ही त्रासदी यह है कि ऐसे मामलों में केंद्र सरकार एक पक्ष की तरह काम करने लग जा रही है और उसका हाथ आरोपियों के साथ दिखने लगता है।

रोहित की मौत से एक बार फिर जातिवाद का जहर सामने आया है और तय है कि यह बहस दूर तक जाएगी, और इसे जाना भी चाहिए। जिस मुद्दे पर सड़क से लेकर संसद तक बहस शुरू होती है उस पर कुछ व्यवस्था और समाधान बनने की गुंजाइश भी होती है। दिल्ली के निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड ने भी इसी तरह की बहस छेड़ी थी और उसके बाद लंबी बहस चली और कुछ व्यवस्था बनी थी। अब यह अलग बहस का विषय है कि वह व्यवस्था और समाधान सही है या नहीं (नाबालिग अपराधियों की उम्र का मसला)। यह सच है कि रोहित की मौत पर राजनीति शुरू हुई है, और यही राजनीति इतनी बड़ी समस्या का समाधान भी ढूंढेÞगी हम इसी की उम्मीद करते हैं।

अंबेडकर को बनाएं आदर्श

खबर मिलती है कि मेरे ही देश के जवान बेटे रोहित को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। मां भारती ने अपना लाल खो दिया। कारण और राजनीति अपनी जगह पर होंगे लेकिन सच्चाई यह है। 21वीं सदी को भारत की सदी कहे जाने की खुशी थी क्योंकि यह दुनिया में सबसे युवा देश है, लेकिन इस तरह के घटनाक्रम से मुझे दुख हुआ है। हम देश को एक ऐसी दिशा में ले जाना चाहते हैं जहां नया उत्साह और आत्मविश्वास हो। आंबेडकर ने शिकायत करने और आक्षेप लगाने में समय नहीं गंवाया। उन्होंने दूसरों से कुछ नहीं मांगा। इसकी जगह उन्होंने सभी विपत्तियों का सामना किया और सभी बाधाओं पर जीत हासिल की। संविधान निर्माता ने हमेशा शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भारत और दलितों की सेवा करने का विकल्प चुना, जबकि उनकी उच्च शिक्षा की वजह से उनका विश्व के किसी भी देश में स्वागत होता। हाल में दलित उद्यमियों के साथ हुई अपनी बैठक में मैंने आंबेडकर का सपना देखा और चाहा कि देश के युवा रोजगार सृजित करने वाले बनें, न कि रोजगार मांगने वाले। अपने जीवन में आगे बढ़े अधिकतर महान लोगों का जीवन इतिहास दर्शाता है कि उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।
-नरेंद्र मोदी (बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में 22 जनवरी को दिए भाषण के मुख्य अंश)

जो दिखाई दे रहा है, बात उससे ज्यादा बड़ी
ईरानी और दत्तात्रेय दोनों को इस्तीफा देना चाहिए या प्रधानमंत्री को उन्हें बर्खास्त कर उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। जो दिखाई दे रहा है, बात उससे कहीं ज्यादा बड़ी है. प्रधानमंत्री को इस मामले पर बोलना चाहिए और मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
-कुमारी शैलजा, कांग्रेस प्रवक्ता

यह जातिगत मामला नहीं
रोहित वेमुला की खुदकुशी को जाति पर आधारित मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह जाति आधारित मामला कतई नहीं है। उनके सुसाइड नोट में किसी सांसद, विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या संगठन का नाम नहीं है। विपक्ष मामले को जाति से जोड़ कर लोगों को भड़काने का काम कर रहा है।
-स्मृति ईरानी, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री

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