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चौपालः कथनी बनाम करनी

मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार पर संपादकीय (6 जुलाई) पढ़ा। यह बिलकुल सही है कि मई 2014 में जब प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा के नेतृत्व में केंद्र सरकार का गठन हुआ था...

Author July 9, 2016 2:07 AM

मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार पर संपादकीय (6 जुलाई) पढ़ा। यह बिलकुल सही है कि मई 2014 में जब प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा के नेतृत्व में केंद्र सरकार का गठन हुआ था तब मोदीजी ने ‘न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन’ (मिनिमम गवर्मेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस) की बात जोर-शोर से कही थी, एक नारे की तरह। लेकिन दो साल पूरे करते ही मंत्रिपरिषद का आकार चौवालीस से बढ़कर अठहत्तर हो गया। संवैधानिक बाध्यता है कि इसे लोकसभा की वर्तमान सदस्य-संख्या 542 के पंद्रह प्रतिशत, अर्थात बयासी से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। जो बात महत्त्व की है वह यह कि भारत में चाहे केंद्र सरकारें हों या राज्यों की सरकारें, मंत्रिपरिषद का आकार सुशासन की जरूरत के अनुसार नहीं तय होता। यह सत्तारूढ़ पार्टी के वर्तमान और भावी हितों तथा राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रख कर तय होता है। देश-हित और समाज-हित की भावना निरंतर घाट रही है और समाज में व्यक्तिगत हित की सोच हावी हो रही है। ऐसे में पार्टी को टूटने से बचाने के लिए असंतुष्टों को खुश करना जरूरी होता है। मंत्रिपरिषद में जगह मिलने से ज्यादा खुशी और कहां मिलेगी?

गठबंधन सरकारों के बढ़ते रुझान के कारण भी मंत्रिपरिषदों के आकार बढ़ रहे हैं। अगर इसमें सारे नाखुश नहीं भर पाते हैं तो सरकारें ‘लोकहित’ को बढ़ाने के लिए तरह-तरह के आयोग, परिषदों, समितियों का गठन करके उनको इनमें ‘एडजस्ट’ करने की पूरी कोशिश करती हैं- आलू विकास समिति, दुग्ध विकास समिति, गन्ना विकास समिति, मंदी विकास समिति…..! आश्चर्य नहीं होगा अगर भविष्य में हरेक सब्जी और फल के लिए ‘लाल-बत्ती’ लगी कार की सवारी करने वाला हो। मीडिया, विशेषकर प्रादेशिक अखबारों और टीवी चैनलों में भी ये मुद्दे उठाए जाते हैं कि फलां जिले से एक को भी ‘लाल-बत्ती’ नहीं मिली या फलां इलाका लाल-बत्ती से वंचित है। ताजुब होता है कि मूल अधिकारों या जरूरतों से वंचित लोगों की इतनी चिंता मीडिया को नहीं है!

मोदीजी ने जो विस्तार किया है, उसमें पार्टी के वर्तमान की मजबूरी नहीं दिखती, क्योंकि लोकसभा में भाजपा की स्थिति मजबूत है और गठबंधन के साझीदारों या पार्टी के नाखुशों से कोई डर नहीं है। उनकी चिंता आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर है और इसी को ध्यान में रखकर राज्यों और जातियों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। जो भी हो, कहने और करने के बीच गहरी खाई है।
’कमल जोशी, अल्मोड़ा

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