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कांग्रेस की राह

चिंतन शिविर में मंथन के बाद कोई ऐसा फैसला सामने नहीं आया है, जिससे यह लगे कि कांग्रेस अपनी राजनीति में बचाव की मुद्रा के भाव से बाहर आकर नए तेवर के साथ मैदान में उतर रही है।

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कांग्रेस के चिंतन शिविर में सोनिया गांधी (Photo Source- twitter)

देश में ज्यादातर समय सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस आज अगर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बचाने की जद्दोजहद से गुजर रही है तो इसकी वजहें भी रहीं। विडंबना यह है कि इस हालत में पहुंचने के बावजूद अपनी दशा और दिशा में सुधार या बदलाव के लिए पार्टी कोई ठोस रास्ते तैयार करने के बजाय कई स्तरों पर ऊहापोह की हालत से गुजरती दिखी।

लेकिन राजस्थान के उदयपुर में संपन्न हुए नवसंकल्प चिंतन शिविर में पार्टी ने आत्ममंथन करने और भविष्य की राजनीति के लिए जैसी इच्छाशक्ति दिखाई है, अगर वह अन्य जमीनी हकीकतों की पहचान और उसके मुताबिक व्यावहारिक राजनीति में लक्षित हो सकी, तो संभव है कि आने वाले सालों में वह अपने लिए उम्मीद के नए सिरे की तलाश कर सके।

यों चिंतन शिविर में मंथन के बाद कोई ऐसा फैसला सामने नहीं आया है, जिससे यह लगे कि कांग्रेस अपनी राजनीति में बचाव की मुद्रा के भाव से बाहर आकर नए तेवर के साथ मैदान में उतर रही है। लेकिन कुछ ऐसे फैसले जरूर लिए गए, जिसमें पार्टी के ढांचे को नया स्वरूप देने से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में जनमत निर्माण वाले मुद्दों पर नए सिरे से विचार और जोर देने की कोशिश दिखती है।

अब तक कांग्रेस के ढांचे में आयुवर्ग से लेकर अलग-अलग सामाजिक तबकों के प्रतिनिधित्व के मसले पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इस मसले पर अब तक पार्टी का कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आया था। यह स्थिति पार्टी के लिए कई बार मुश्किल पैदा करती रही। मगर इस बार चिंतन के बाद पार्टी में संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर पहले के मुकाबले अपेक्षया साहसपूर्ण फैसला दिखा, जिसमें मुख्य रूप से युवाओं और वरिष्ठ दिग्गजों को साथ लेकर एक सलाहकार समिति के गठन के अलावा संगठन में भिन्न सामाजिक वर्गों और युवाओं को पचास फीसद प्रतिनिधित्व देने की पहलकदमी शामिल है।

ढांचे से इतर जमीनी स्तर पर यात्राएं निकाल कर जनता को फिर से पार्टी से जोड़ने की कवायदों को अहमियत दी जाएगी। निश्चित रूप से जमीनी गतिविधियां ही लोगों के बीच किसी पार्टी की मौजूदगी का मुख्य औजार बनती हैं, लेकिन सवाल है कि पिछले कुछ सालों में जिन मुद्दों पर उथल-पुथल की वजह से जनता के राजनीतिक रुख में बदलाव आया है या असमंजस की स्थिति बनी है, उन मसलों पर पार्टी कौन-सा रुख अख्तियार करेगी? क्या वह अपनी मुख्य चुनौती भाजपा के राजनीतिक मुद्दों पर ही नरम संस्करण का सहारा लेगी? या फिर नए तेवर के साथ कोई अलग विकल्प पेश करेगी?

कई मसलों पर मंथन और नए फैसलों के बावजूद फिलहाल नेतृत्व और अलग-अलग स्तरों पर कार्यशैली पर स्पष्टता नहीं सामने आई, लेकिन कुछ अहम मुद्दों पर अपने रुख में बदलाव के जरिए कांग्रेस ने नया संकेत देने की कोशिश की है। मसलन, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण के मसले पर अब तक पार्टी का रुख यही बना रहा कि इसमें अन्य सामाजिक वर्गों के लिए कोटे के सवाल से वह असहमत रही।

लेकिन चिंतन शिविर में इस मसले पर पार्टी ने उसी मांग के पक्ष में खड़े होने का फैसला किया है, जो महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने की सबसे बड़ी बाधा रही। यानी पार्टी ने अब महिला आरक्षण की व्यवस्था में अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अलग से आरक्षण देने का समर्थन किया है। बहरहाल, राष्ट्रीय राजनीति में सत्ता की लड़ाई में कांग्रेस के सामने खुद को खड़ा करने की चुनौतियां काफी गहरी हैं और पार्टी उससे जूझती दिखती है, लेकिन चिंतन शिविर में लिए गए फैसलों की असली परीक्षा जमीनी राजनीति के मैदान में होगी!

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