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संपादकीयः पाला और बिसात

कुछ दिनों से रीता बहुगुणा जोशी के भाजपा में शामिल होने की जो अटकलें लगाई जा रही थीं, वे आखिरकार सच निकलीं। जाहिर है, यह कांग्रेस के लिए झटका है और भाजपा के लिए उत्साह बढ़ाने वाली बात।

कुछ दिनों से रीता बहुगुणा जोशी के भाजपा में शामिल होने की जो अटकलें लगाई जा रही थीं, वे आखिरकार सच निकलीं। जाहिर है, यह कांग्रेस के लिए झटका है और भाजपा के लिए उत्साह बढ़ाने वाली बात। लेकिन यह वाकया हमारी राजनीति के किसी उजले पहलू को उजागर नहीं करता। ‘कांग्रेस-मुक्त’ भारत का दम भरते या जुमला उछालते भाजपा नहीं थकती, पर कांग्रेसियों से उसे कोई परहेज नहीं है। रीता बहुगुणा से पहले उनके बड़े भाई और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भाजपा पहले ही गले लगा चुकी है, जिन्होंने हरीश रावत सरकार को गिराने का विफल प्रयास किया था। रीता बहुगुणा ने अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा का दामन थामते ही कहा कि उन्होंने राष्ट्र-हित और प्रदेश-हित में यह फैसला किया है। लेकिन राष्ट्र का हित और प्रदेश का हित किस बात में है, इसका इलहाम उन्हें इतनी देर से क्यों हुआ, जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की गहमागहमी शुरू हो चुकी है? इसी अवसर पर उन्होंने यह भी कहा कि देश राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने को इच्छुक नहीं है। इसका भी अहसास उन्हें अब जाकर क्यों हुआ? अपने सत्ताईस साल लंबे राजनीतिक कैरियर में चौबीस साल वे कांग्रेस में रहीं। 2007 से 2012 तक प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष भी। इस दौरान उन्होंने जाने कितनी बार भाजपा पर हमला बोला होगा। पर अब शायद वे उन सब बातों को याद न करना चाहें न भाजपा याद करना चाहेगी। जाहिर है, उनके भाजपा में शामिल होने के पीछे की असल वजहें कुछ और होंगी।


अटकलें लगाई जा रही हैं कि कांग्रेस की तरफ से शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना उन्हें रास नहीं आया। संभव है दशकों से प्रदेश की राजनीति में जमे होने के कारण उन्हें लगा हो कि उनकी दावेदारी की अनदेखी कर दी गई। फिर, राज्य में प्रचार अभियान और चुनावी रणनीति की कमान प्रशांत किशोर को पार्टी ने दे दी। रीता बहुगुणा को यह भी हजम नहीं हुआ होगा। संभव है पार्टी या पार्टी नेतृत्व से उनकी कुछ और भी शिकायतें रही हों। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश को हर हाल में जीतने को बेचैन भाजपा दूसरे दलों में सेंध लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती, भले इससे बाद में पार्टी के भीतर रार पैदा हो। बसपा के स्वामी प्रसाद मौर्य के बाद अब रीता बहुगुणा के जरिए उसने जातिगत समीकरण भी साधने की कोशिश की है। इस झटके से बिफरी कांग्रेस ने कहा कि रीता बहुगुणा का पारिवारिक इतिहास ही दलबदल का रहा है। इशारा बड़े भाई विजय बहुगुणा के अलावा उनके पिता दिवंगत हेमवती नंदन बहुगुणा की तरफ भी रहा होगा, जो कांग्रेस में रहते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे, पर 1977 में इंदिरा गांधी का साथ छोड़ कर जनता पार्टी के पाले में चले गए, और दो-तीन साल बाद कांग्रेस में फिर लौट भी आए थे। यह दिलचस्प है कि कोई एक महीना पहले उन्हीं हेमवती नंदन बहुगुणा को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए राहुल गांधी इलाहाबाद पहुंचे थे, और रीता बहुगुणा भी उनके साथ थीं। हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश में सेक्युलर राजनीति के झंडाबरदार थे और अल्पसंख्यकों में खासे लोकप्रिय भी। लेकिन उनकी इस विरासत से न उनके बेटे को कोई वास्ता रह गया है न बेटी को। यह निखालिस सत्ता और चुनाव का गणित है, जिसमें अपना स्वार्थ साधने के अलावा और कोई बात मायने नहीं रखती।

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