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अलविदा 2016: राहुल के सामने पार्टी के साथ ही विपक्ष को धार देने की रही चुनौती

लगातार कमजोर हो रही कांग्रेस को 2017 की चुनौतियों के मद्देनजर किसी खास मुद्दे की तलाश थी और विमुद्रीकरण के मौके को पार्टी ने लपक लिया है।

Author नई दिल्ली | December 28, 2016 13:08 pm
नोटबंदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बाद मीडिया से बात करते कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी। (PTI Photo by Vijay Verma/ 8 Dec, 2016)

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों कुछ भी बोल रहे हैं तो या तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद या अमित शाह, राजनाथ सिंह, रविशंकर प्रसाद, अरुण जेटली जैसे भारतीय जनता पार्टी की पहली कतार के नेता प्रतिक्रिया जता रहे हैं। दो महीने पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी। राहुल गांधी के बयानों पर कोई प्रवक्ता बयान दे देता था। दो महीने में आए इस फर्क पर राजनीतिक गलियारों में गौर किया जा रहा है। विमुद्रीकरण के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, डीएमके, समाजवादी पार्टी आदि पाटिर्यां संसद में कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ दिखने लगी हैं। संकेत स्पष्ट हैं, 2016 पार्टी के अंतिम कुछ महीनों में बने ये समीकरण न सिर्फ 2017 में होने वाले विधानसभाओं के चुनाव पर असर डालेंगे, बल्कि 2019 के आम चुनावों को भी शिद्दत से प्रभावित करने वाले हैं।

खोल से बाहर आए राहुल: कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी कड़े शब्दों में प्रतिपक्षी भारतीय जनता पार्टी के इस अभियान का जवाब देते दिखने लगे हैं कि वे और कांग्रेस में उनके साथी अगंभीर राजनीति करते हैं, दिल्ली में राजनीति करते हैं और फिर छुट्टियां बिताने विदेश निकल जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कड़े प्रहार कर राहुल गांधी न केवल नए तेवर के साथ अपने खोल से बाहर आ रहे हैं, बल्कि विपक्ष को भी धार देते दिख रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव, सपा नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत महत्त्वपूर्ण क्षत्रपों के साथ वे नियमित संपर्क में हैं। अब वे आाक्रामक दिख रहे हैं।

नोटबंदी को लपका: दरअसल, पिछले कई वर्षों से लगातार कमजोर हो रही कांग्रेस को 2017 की चुनौतियों के मद्देनजर किसी खास मुद्दे की तलाश थी और विमुद्रीकरण के मौके को पार्टी ने लपक लिया है। बड़ा दांव उत्तर प्रदेश पर लगा है। उत्तर प्रदेश में पहले प्रियंका गांधी को उतारे जाने को लेकर ऊहापोह की स्थिति थी। नोटबंदी के मुद्दे पर राहुल गांधी की सक्रियता में यह सवाल भी खत्म हो गया लेकिन चुनौतियों की डगर आसान नहीं है।

प्रशांत किशोर का पेच: उत्तराखंड और पंजाब में कांग्रेस चुनावी सर्वेक्षणों से खुश है। हालांकि उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर की सक्रियता से कांग्रेस के दिग्गज नाराज चल रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान ने संकेत दे दिया है कि प्रशांत किशोर जो कहेंगे, पार्टी में वही नहीं होगा। हालांकि, गुटबाजी असर डाल रही है।

सूबे और सूबेदार:

उत्तर प्रदेश: इन हालात में अगला साल कांग्रेस और राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। पार्टी ने उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित किया है और सांसद राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। कांग्रेस वहां सपा या बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन की संभावना पर भी काम कर रही है। अखिलेश राहुल गांधी से हाथ मिलाने को तैयार हैं।

उत्तराखंड: त्तराखंड में मुख्यमंत्री हरीश रावत से नाराज होकर दस विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय और हरीश रावत के आपसी समीकरण ठीक नहीं बताए जा रहे। इसके बावजूद कांग्रेस उत्तराखंड में बढ़त में दिख रही है। कांग्रेस ने अपना जो सर्वे कराया है, उसमें कांग्रेस को 33 सीटें आने का अनुमान है।

पंजाब: पंजाब कांग्रेस में अमरिदर सिह मजबूत दिखाई दे रहे हैं। पंजाब में भी प्रशांत किशोर का पार्टी के कुछ असंतुष्टों के साथ बैठक करना अमरिंदर को नहीं भाया और उन्होंने राहुल गांधी से शिकायत भी की। उसके बाद अमरिंदर और अन्य प्रदेश नेताओं की सक्रियता बढ़ी है। आप के कई नेताओं को कांग्रेस में शामिल कराया गया है। अकाली दल के कुछ प्रमुख नेता भी आए हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से खुश पंजाब कांग्रेस के नेताओं ने पानी के बंटवारे पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने से इनकार कर दिया।

मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में कांग्रेस 13 साल से सत्ता से बाहर है। दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुरेश पचौरी अलग-अलग गुट लेकर चल रहे हैं। शहडोल लोकसभा और नेपानगर विधानसभा उपचुनाव में गुटबाजी उभर कर सामने आई।

कांग्रेस की चुनावी चुनौती:

131 साल की हो गई है कांग्रेस पार्टी इस बरस। हालांकि यह पार्टी छह राज्यों तक सिमट कर रह गई है।
2017 में इस पार्टी ने पंजाब और यूपी के विधानसभा चुनावों से काफी उम्मीद लगा रखी है।
2018 में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा के चुनावों पर पार्टी की निगाहें होंगी।

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