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प्रतिबद्धता और रचनात्मकता

प्रगतिवाद के दौर में प्रतिबद्ध लेखन की चर्चा शुरू हुई। बदलाव की तीव्र कामना को प्रतिबद्धता का हेतु माना गया। यह धारणा भी बनी कि प्रतिबद्ध लेखन गुणवत्ता के लिहाज से उन्नीस होता है।

यह तथ्य नोट करने योग्य है कि प्राय: दलित रचनाकारों ने लिखने से पहले अतिरिक्त तैयारी की परवाह नहीं की। एक नई लेखन-भाषा में उनके आवेश दर्ज हुए। ये रचनाकार कालांतर में परिवर्तनवादी वैचारिकी की ओर मुड़े। फुले-आंबेडकर के चिंतन को उन्होंने पढ़ना और अपने लेखन में पिरोना आरंभ किया। इससे आवेश का संयमन संभव हुआ।

प्रगतिवाद के दौर में प्रतिबद्ध लेखन की चर्चा शुरू हुई। बदलाव की तीव्र कामना को प्रतिबद्धता का हेतु माना गया। यह धारणा भी बनी कि प्रतिबद्ध लेखन गुणवत्ता के लिहाज से उन्नीस होता है। ऐसे लेखन के प्रति एक तिरस्कार भाव पनपा। पर प्रतिबद्धता का मुद्दा अस्मितावादी लेखन के दौर में नए सिरे से उभरा। तीन मुख्य अस्मिता विमर्शों- स्त्री, दलित और आदिवासी- में प्रतिबद्धता भिन्न-भिन्न रंग-रूप लिए हुए है। अपनी मुखरता, व्यापकता और गतिशीलता के कारण दलित विमर्श अन्य विमर्शों से विशिष्ट माना गया। दलित लेखन में प्रतिबद्धता का आशय है वर्ण-जाति जनित व्यथा का अंकन और जाति-वर्ण का स्पष्ट नकार। जिस लेखन में यह प्रतिबद्धता अनुपस्थित है वह दलित साहित्य के दायरे से बाहर रखा गया। नतीजतन, प्रतिबद्धता प्रतिमान हो गई। दलित साहित्य का अनिवार्य लक्षण।
पर, यह अनिवार्यता दूसरे नंबर की रही। पहले स्थान पर लेखक/ लेखिका का दलित पृष्ठभूमि से होना तय हुआ। तीसरे नंबर पर फुले-आंबेडकर से जुड़ाव और उसकी मूर्त अभिव्यक्ति रखी गई। दलित साहित्य की पहचान के ये तीनों बिंदु निर्विवाद रहे। इनकी पूर्वापरता पर भी प्रश्न नहीं उठे। लेकिन, इससे दलित लेखन में एक परिपाटी बनती दिखाई पड़ी। विडंबना यह कि परिपाटीबद्धता से दलित लेखन का घोषित विरोध प्रारंभ से था।
प्रतिबद्धता आवेश या आवेग के सहारे रूपाकार लेती है। विचारधारा से संवाद आवेश को नियंत्रित करता चलता है। प्रगतिवाद में आवेश इसीलिए मर्यादित रहा। विमर्शपरक लेखन में आवेश केंद्रीय हो गया। यह क्रमश: दलित लेखन का स्वभाव बनता गया। पहले दौर में व्यथा-कथा-कथन पर बल था। इस कथन पर आवेश के छींटे यत्र-तत्र पड़े थे। दूसरे दौर में आवेश का उच्छलन दिखाई पड़ा। दीर्घावधि में संचित व्यथापूरित आवेश एकाएक जैसे फूट पड़े हों। यह उच्छलन किसी स्थान-विशेष तक सीमित नहीं था। इसका अखिल भारतीय स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा। तीसरे दौर में दलित आंदोलन ने आवेश के ग्रंथन और नियोजन (चैनलाइजेशन) का काम किया। इससे आवेश की सम्मिलित ऊर्जा पारंपरिक वर्चस्व को टक्कर देने में सक्षम होने लगी। इसके बाद आवेश के नियमन का काम शुरू हुआ। नियमन का आशय था कि आवेश को एक प्रक्रिया से गुजार कर प्रस्तुत करना।
जब दलित लेखन बड़े पैमाने पर और उल्लेखनीय मात्रा में सामने आने लगा तो लेखन की एक प्रविधि उभरने लगी। इस प्रविधि में उन खास स्थलों की पहचान प्रमुख थी, जहां आवेश को खुल कर प्रगट किया जाना था। यह तथ्य नोट करने योग्य है कि प्राय: दलित रचनाकारों ने लिखने से पहले अतिरिक्त तैयारी की परवाह नहीं की। एक नई लेखन-भाषा में उनके आवेश दर्ज हुए। ये रचनाकार कालांतर में परिवर्तनवादी वैचारिकी की ओर मुड़े। फुले-आंबेडकर के चिंतन को उन्होंने पढ़ना और अपने लेखन में पिरोना आरंभ किया। इससे आवेश का संयमन संभव हुआ।
दलित साहित्यांदोलन में आवेश अनुभव, विचार और उत्कट परिवर्तनेच्छा के समुच्चय का नाम है। अगली अवस्था आवेश के आत्मसातीकरण की हो सकती है। पंजाबी के दलित कथाकार बलीजीत का साहित्य यही संकेत देता प्रतीत हो रहा है। आवेश का आत्मसातीकरण बड़ी संश्लिष्ट स्थिति है। पुंजीभूत अनुभव आवेश का ज्वार पैदा करता है। मात्र विचार न इस ज्वार को थाम सकते हैं और न उसे सहेज सकते हैं। आवेश के तंतु इतने गुत्थमगुत्था और पेचोखम वाले होते हैं कि उन्हें संभालना आसान नहीं होता। आवेश की निर्मिति में कई स्रोतों की भूमिका रहती है- सुदूर अतीत के अनुभव, जो सामूहिक स्मृतियों के जरिए यात्रा करते हुए आते हैं; सामुदायिक अनुभव, पारिवारिक और वैयक्तिक अनुभव, स्थूल और सूक्ष्म हिंसा के विविध अनुभव, भाषिक अभिव्यक्तियों में गुंथी अवमानना के दंश आदि। इन आवेशों का अनुकूलन आत्मसातीकरण नहीं है। आवेश का प्रबंधन भी आत्मसातीकरण नहीं कहा जा सकता। आवेश के शमन को भी इसी तरह देखना चाहिए। आवेशों के जाहिरनामे का सबसे मुफीद इलाका आत्मकथा है। इनकी अभिव्यक्ति में न्यूनतम लेखकीय हस्तक्षेप इसी विधा में संभव है। लेकिन, यहां भी रचनाकार को चयनधर्मी होना पड़ता है। ऐसी चयनधर्मिता में परिष्कार कम, यादृच्छिक छंटाई अधिक होती है।
वास्तव में आवेश के सृजनात्मक रूपांतरण की क्षमता अर्जित करना आत्मसातीकरण के निकट पड़ता है। यहां समस्या अनुभवों के वर्गीकरण या कोटि निर्माण की है। सभी तरह के आवेशों का रूपांतरण न तो काम्य है और न ही संभव। रचनाकार को अपनी वरीयताएं पहचाननी और तय करनी पड़ती हैं। इस क्रम में बहुत कुछ छूटना लाजमी है। मगर यह सब स्थूल अर्थ में सायास नहीं होता। सृजन अपना रास्ता खुद चुनता है। वह रचनाकार के एक अनुभव-कोष से सामग्री ले सकता है, साथ ही दूसरे अनुभव-कोष का संज्ञान लेने से भी मुकर सकता है। यह भी कि तमाम अनुभव कोषों को फेंट कर एक नए अनुभव कोष का निर्माण हो सकता है।
ऐसे मिश्रित स्रोत से उपजे आवेश की प्रकृति ही अलहदा होती है। आस्वाद के परिचित धरातलों से इतर। न सर्वथा कड़वाहट भरा आवेश, न निरा प्रेमावेग। न मात्र रोषपूरित भाव और न सिर्फ हर्षावेग। इन ध्रुवांतों के मध्य एकल शेड वाले आवेश भी नहीं। विचार और संवेदना अपनी गहन पारस्परिकता में। एक का दूसरे पर आरोपण नहीं। तरजीह देने का सवाल ही जहां बेमानी हो जाए। ऐसे आवेश का नया बही-खाता खोलने के लिए रचनाकार का निष्कवच होना मानो पूर्वशर्त हो। जब रचना के ढांचे में ही आक्रामकता घुला दी गई हो, तो रचनाकार के बचाव की आतंरिक सज्जा का अवकाश नहीं रहता।
ऐसे में जितना बेध्य अभीष्ट प्रतिपक्ष होता है उतना ही स्वपक्ष। रचना के लिए जीवन ही सब कुछ होता है। सृजन से कोई दूसरा मकसद नहीं साधा जाता। जीवन की विडंबनाएं उछाली नहीं जातीं। कृति में विडंबना के निवेश और बरताव का कोई फार्मूला नहीं बनता। जिस संजीदगी से कथा-विन्यास में विडंबना को गूंथा जाता है उससे सहज संभाव्य होने के बावजूद आवेश के स्फुल्लिंग नहीं फूटते। तनिक हेरफेर से विडंबनाएं घृणा मिश्रित क्रोध के धधकते गोले में बदली जा सकती हैं, बहुधा बदली जाती रही हैं। पर, आवेश के आत्मसातीकरण की कठिन प्रक्रिया से गुजरा हुआ रचनाकार सप्रयास ऐसा नहीं होने देता। आवेश को जज्ब कर सकने वाले लेखक नफरत की फितरत से बखूबी वाकिफ होते हैं। वे तात्कालिक फायदे के साथ दीर्घकालिक दुष्प्रभावों का आकलन करके ही घृणा के विनियोजन के प्रलोभन से बचते हैं।
ऐसा आकलन कर सकने की सलाहियत और दृष्टि विरल रचनाकारों में होती है। अस्मिताओं के तीव्र प्रवाही समय में जहां कथ्य, संवेदना, शैली और रूप अधिकाधिक ‘आत्मपरक’ होते गए हैं, यह सुयोग और भी कम घटित होता नजर आता है। पूर्व-अस्मितावादी समय में ऐसी सामान्यीकृत आत्मपरकता संभव नहीं थी।
यह न समझ लिया जाए कि आवेश का आत्मसातीकरण सर्वथा निरापद मामला है। इस ढर्रे के अपने अंध बिंदु हैं, जिसका ध्यान रखना आवश्यक है। आत्मसातीकरण की प्रक्रिया में यह हो सकता है कि स्थूल, अनवरत और ठोस हिंसा के संदर्भों से कन्नी काट ली जाए, जातिवादी मानस की कू्ररताएं धुंधली हो जाएं, वर्णवादी चेहरों को चिह्नित करने का ‘पारंपरिक’ दायित्व स्थगित हो जाए। बलीजीत की कहानियां इस शंका को आधार देती हैं। उनके यहां आश्चर्यजनक रूप से संगठित होते, नारे लगाते, प्रतिरोध करते दलितों की छवियां नदारद हैं। दलित बस्तियों पर सुनियोजित हमले और उसकी पृष्ठभूमि में राजनीतिक गतिविधियों की कोई भनक नहीं मिलती। दलित स्त्री की पीड़ा का भरपूर संज्ञान लिया गया है, लेकिन हाल के वर्षों में सामने आई नई दलित स्त्री की पदचाप अभी तक सुनी नहीं जा सकी है। वे कड़वाहट के नहीं, संवेदना-सृष्टि के लेखक हैं। मुखर प्रतिबद्धता के नहीं, व्यंजक प्रतिबद्धता के कलमकार हैं। प्रगतिवाद के दौर में प्रतिबद्ध लेखन की चर्चा शुरू हुई। बदलाव की तीव्र कामना को प्रतिबद्धता का हेतु माना गया। यह धारणा भी बनी कि प्रतिबद्ध लेखन गुणवत्ता के लिहाज से उन्नीस होता है। ऐसे लेखन के प्रति एक तिरस्कार भाव पनपा। पर प्रतिबद्धता का मुद्दा अस्मितावादी लेखन के दौर में नए सिरे से उभरा। तीन मुख्य अस्मिता विमर्शों- स्त्री, दलित और आदिवासी- में प्रतिबद्धता भिन्न-भिन्न रंग-रूप लिए हुए है। अपनी मुखरता, व्यापकता और गतिशीलता के कारण दलित विमर्श अन्य विमर्शों से विशिष्ट माना गया। दलित लेखन में प्रतिबद्धता का आशय है वर्ण-जाति जनित व्यथा का अंकन और जाति-वर्ण का स्पष्ट नकार। जिस लेखन में यह प्रतिबद्धता अनुपस्थित है वह दलित साहित्य के दायरे से बाहर रखा गया। नतीजतन, प्रतिबद्धता प्रतिमान हो गई। दलित साहित्य का अनिवार्य लक्षण।
पर, यह अनिवार्यता दूसरे नंबर की रही। पहले स्थान पर लेखक/ लेखिका का दलित पृष्ठभूमि से होना तय हुआ। तीसरे नंबर पर फुले-आंबेडकर से जुड़ाव और उसकी मूर्त अभिव्यक्ति रखी गई। दलित साहित्य की पहचान के ये तीनों बिंदु निर्विवाद रहे। इनकी पूर्वापरता पर भी प्रश्न नहीं उठे। लेकिन, इससे दलित लेखन में एक परिपाटी बनती दिखाई पड़ी। विडंबना यह कि परिपाटीबद्धता से दलित लेखन का घोषित विरोध प्रारंभ से था।
प्रतिबद्धता आवेश या आवेग के सहारे रूपाकार लेती है। विचारधारा से संवाद आवेश को नियंत्रित करता चलता है। प्रगतिवाद में आवेश इसीलिए मर्यादित रहा। विमर्शपरक लेखन में आवेश केंद्रीय हो गया। यह क्रमश: दलित लेखन का स्वभाव बनता गया। पहले दौर में व्यथा-कथा-कथन पर बल था। इस कथन पर आवेश के छींटे यत्र-तत्र पड़े थे। दूसरे दौर में आवेश का उच्छलन दिखाई पड़ा। दीर्घावधि में संचित व्यथापूरित आवेश एकाएक जैसे फूट पड़े हों। यह उच्छलन किसी स्थान-विशेष तक सीमित नहीं था। इसका अखिल भारतीय स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा। तीसरे दौर में दलित आंदोलन ने आवेश के ग्रंथन और नियोजन (चैनलाइजेशन) का काम किया। इससे आवेश की सम्मिलित ऊर्जा पारंपरिक वर्चस्व को टक्कर देने में सक्षम होने लगी। इसके बाद आवेश के नियमन का काम शुरू हुआ। नियमन का आशय था कि आवेश को एक प्रक्रिया से गुजार कर प्रस्तुत करना।
जब दलित लेखन बड़े पैमाने पर और उल्लेखनीय मात्रा में सामने आने लगा तो लेखन की एक प्रविधि उभरने लगी। इस प्रविधि में उन खास स्थलों की पहचान प्रमुख थी, जहां आवेश को खुल कर प्रगट किया जाना था। यह तथ्य नोट करने योग्य है कि प्राय: दलित रचनाकारों ने लिखने से पहले अतिरिक्त तैयारी की परवाह नहीं की। एक नई लेखन-भाषा में उनके आवेश दर्ज हुए। ये रचनाकार कालांतर में परिवर्तनवादी वैचारिकी की ओर मुड़े। फुले-आंबेडकर के चिंतन को उन्होंने पढ़ना और अपने लेखन में पिरोना आरंभ किया। इससे आवेश का संयमन संभव हुआ।
दलित साहित्यांदोलन में आवेश अनुभव, विचार और उत्कट परिवर्तनेच्छा के समुच्चय का नाम है। अगली अवस्था आवेश के आत्मसातीकरण की हो सकती है। पंजाबी के दलित कथाकार बलीजीत का साहित्य यही संकेत देता प्रतीत हो रहा है। आवेश का आत्मसातीकरण बड़ी संश्लिष्ट स्थिति है। पुंजीभूत अनुभव आवेश का ज्वार पैदा करता है। मात्र विचार न इस ज्वार को थाम सकते हैं और न उसे सहेज सकते हैं। आवेश के तंतु इतने गुत्थमगुत्था और पेचोखम वाले होते हैं कि उन्हें संभालना आसान नहीं होता। आवेश की निर्मिति में कई स्रोतों की भूमिका रहती है- सुदूर अतीत के अनुभव, जो सामूहिक स्मृतियों के जरिए यात्रा करते हुए आते हैं; सामुदायिक अनुभव, पारिवारिक और वैयक्तिक अनुभव, स्थूल और सूक्ष्म हिंसा के विविध अनुभव, भाषिक अभिव्यक्तियों में गुंथी अवमानना के दंश आदि। इन आवेशों का अनुकूलन आत्मसातीकरण नहीं है। आवेश का प्रबंधन भी आत्मसातीकरण नहीं कहा जा सकता। आवेश के शमन को भी इसी तरह देखना चाहिए। आवेशों के जाहिरनामे का सबसे मुफीद इलाका आत्मकथा है। इनकी अभिव्यक्ति में न्यूनतम लेखकीय हस्तक्षेप इसी विधा में संभव है। लेकिन, यहां भी रचनाकार को चयनधर्मी होना पड़ता है। ऐसी चयनधर्मिता में परिष्कार कम, यादृच्छिक छंटाई अधिक होती है।
वास्तव में आवेश के सृजनात्मक रूपांतरण की क्षमता अर्जित करना आत्मसातीकरण के निकट पड़ता है। यहां समस्या अनुभवों के वर्गीकरण या कोटि निर्माण की है। सभी तरह के आवेशों का रूपांतरण न तो काम्य है और न ही संभव। रचनाकार को अपनी वरीयताएं पहचाननी और तय करनी पड़ती हैं। इस क्रम में बहुत कुछ छूटना लाजमी है। मगर यह सब स्थूल अर्थ में सायास नहीं होता। सृजन अपना रास्ता खुद चुनता है। वह रचनाकार के एक अनुभव-कोष से सामग्री ले सकता है, साथ ही दूसरे अनुभव-कोष का संज्ञान लेने से भी मुकर सकता है। यह भी कि तमाम अनुभव कोषों को फेंट कर एक नए अनुभव कोष का निर्माण हो सकता है।
ऐसे मिश्रित स्रोत से उपजे आवेश की प्रकृति ही अलहदा होती है। आस्वाद के परिचित धरातलों से इतर। न सर्वथा कड़वाहट भरा आवेश, न निरा प्रेमावेग। न मात्र रोषपूरित भाव और न सिर्फ हर्षावेग। इन ध्रुवांतों के मध्य एकल शेड वाले आवेश भी नहीं। विचार और संवेदना अपनी गहन पारस्परिकता में। एक का दूसरे पर आरोपण नहीं। तरजीह देने का सवाल ही जहां बेमानी हो जाए। ऐसे आवेश का नया बही-खाता खोलने के लिए रचनाकार का निष्कवच होना मानो पूर्वशर्त हो। जब रचना के ढांचे में ही आक्रामकता घुला दी गई हो, तो रचनाकार के बचाव की आतंरिक सज्जा का अवकाश नहीं रहता।
ऐसे में जितना बेध्य अभीष्ट प्रतिपक्ष होता है उतना ही स्वपक्ष। रचना के लिए जीवन ही सब कुछ होता है। सृजन से कोई दूसरा मकसद नहीं साधा जाता। जीवन की विडंबनाएं उछाली नहीं जातीं। कृति में विडंबना के निवेश और बरताव का कोई फार्मूला नहीं बनता। जिस संजीदगी से कथा-विन्यास में विडंबना को गूंथा जाता है उससे सहज संभाव्य होने के बावजूद आवेश के स्फुल्लिंग नहीं फूटते। तनिक हेरफेर से विडंबनाएं घृणा मिश्रित क्रोध के धधकते गोले में बदली जा सकती हैं, बहुधा बदली जाती रही हैं। पर, आवेश के आत्मसातीकरण की कठिन प्रक्रिया से गुजरा हुआ रचनाकार सप्रयास ऐसा नहीं होने देता। आवेश को जज्ब कर सकने वाले लेखक नफरत की फितरत से बखूबी वाकिफ होते हैं। वे तात्कालिक फायदे के साथ दीर्घकालिक दुष्प्रभावों का आकलन करके ही घृणा के विनियोजन के प्रलोभन से बचते हैं।
ऐसा आकलन कर सकने की सलाहियत और दृष्टि विरल रचनाकारों में होती है। अस्मिताओं के तीव्र प्रवाही समय में जहां कथ्य, संवेदना, शैली और रूप अधिकाधिक ‘आत्मपरक’ होते गए हैं, यह सुयोग और भी कम घटित होता नजर आता है। पूर्व-अस्मितावादी समय में ऐसी सामान्यीकृत आत्मपरकता संभव नहीं थी।
यह न समझ लिया जाए कि आवेश का आत्मसातीकरण सर्वथा निरापद मामला है। इस ढर्रे के अपने अंध बिंदु हैं, जिसका ध्यान रखना आवश्यक है। आत्मसातीकरण की प्रक्रिया में यह हो सकता है कि स्थूल, अनवरत और ठोस हिंसा के संदर्भों से कन्नी काट ली जाए, जातिवादी मानस की कू्ररताएं धुंधली हो जाएं, वर्णवादी चेहरों को चिह्नित करने का ‘पारंपरिक’ दायित्व स्थगित हो जाए। बलीजीत की कहानियां इस शंका को आधार देती हैं। उनके यहां आश्चर्यजनक रूप से संगठित होते, नारे लगाते, प्रतिरोध करते दलितों की छवियां नदारद हैं। दलित बस्तियों पर सुनियोजित हमले और उसकी पृष्ठभूमि में राजनीतिक गतिविधियों की कोई भनक नहीं मिलती। दलित स्त्री की पीड़ा का भरपूर संज्ञान लिया गया है, लेकिन हाल के वर्षों में सामने आई नई दलित स्त्री की पदचाप अभी तक सुनी नहीं जा सकी है। वे कड़वाहट के नहीं, संवेदना-सृष्टि के लेखक हैं। मुखर प्रतिबद्धता के नहीं, व्यंजक प्रतिबद्धता के कलमकार हैं। प्रगतिवाद के दौर में प्रतिबद्ध लेखन की चर्चा शुरू हुई। बदलाव की तीव्र कामना को प्रतिबद्धता का हेतु माना गया। यह धारणा भी बनी कि प्रतिबद्ध लेखन गुणवत्ता के लिहाज से उन्नीस होता है। ऐसे लेखन के प्रति एक तिरस्कार भाव पनपा। पर प्रतिबद्धता का मुद्दा अस्मितावादी लेखन के दौर में नए सिरे से उभरा। तीन मुख्य अस्मिता विमर्शों- स्त्री, दलित और आदिवासी- में प्रतिबद्धता भिन्न-भिन्न रंग-रूप लिए हुए है। अपनी मुखरता, व्यापकता और गतिशीलता के कारण दलित विमर्श अन्य विमर्शों से विशिष्ट माना गया। दलित लेखन में प्रतिबद्धता का आशय है वर्ण-जाति जनित व्यथा का अंकन और जाति-वर्ण का स्पष्ट नकार। जिस लेखन में यह प्रतिबद्धता अनुपस्थित है वह दलित साहित्य के दायरे से बाहर रखा गया। नतीजतन, प्रतिबद्धता प्रतिमान हो गई। दलित साहित्य का अनिवार्य लक्षण।
पर, यह अनिवार्यता दूसरे नंबर की रही। पहले स्थान पर लेखक/ लेखिका का दलित पृष्ठभूमि से होना तय हुआ। तीसरे नंबर पर फुले-आंबेडकर से जुड़ाव और उसकी मूर्त अभिव्यक्ति रखी गई। दलित साहित्य की पहचान के ये तीनों बिंदु निर्विवाद रहे। इनकी पूर्वापरता पर भी प्रश्न नहीं उठे। लेकिन, इससे दलित लेखन में एक परिपाटी बनती दिखाई पड़ी। विडंबना यह कि परिपाटीबद्धता से दलित लेखन का घोषित विरोध प्रारंभ से था।
प्रतिबद्धता आवेश या आवेग के सहारे रूपाकार लेती है। विचारधारा से संवाद आवेश को नियंत्रित करता चलता है। प्रगतिवाद में आवेश इसीलिए मर्यादित रहा। विमर्शपरक लेखन में आवेश केंद्रीय हो गया। यह क्रमश: दलित लेखन का स्वभाव बनता गया। पहले दौर में व्यथा-कथा-कथन पर बल था। इस कथन पर आवेश के छींटे यत्र-तत्र पड़े थे। दूसरे दौर में आवेश का उच्छलन दिखाई पड़ा। दीर्घावधि में संचित व्यथापूरित आवेश एकाएक जैसे फूट पड़े हों। यह उच्छलन किसी स्थान-विशेष तक सीमित नहीं था। इसका अखिल भारतीय स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा। तीसरे दौर में दलित आंदोलन ने आवेश के ग्रंथन और नियोजन (चैनलाइजेशन) का काम किया। इससे आवेश की सम्मिलित ऊर्जा पारंपरिक वर्चस्व को टक्कर देने में सक्षम होने लगी। इसके बाद आवेश के नियमन का काम शुरू हुआ। नियमन का आशय था कि आवेश को एक प्रक्रिया से गुजार कर प्रस्तुत करना।
जब दलित लेखन बड़े पैमाने पर और उल्लेखनीय मात्रा में सामने आने लगा तो लेखन की एक प्रविधि उभरने लगी। इस प्रविधि में उन खास स्थलों की पहचान प्रमुख थी, जहां आवेश को खुल कर प्रगट किया जाना था। यह तथ्य नोट करने योग्य है कि प्राय: दलित रचनाकारों ने लिखने से पहले अतिरिक्त तैयारी की परवाह नहीं की। एक नई लेखन-भाषा में उनके आवेश दर्ज हुए। ये रचनाकार कालांतर में परिवर्तनवादी वैचारिकी की ओर मुड़े। फुले-आंबेडकर के चिंतन को उन्होंने पढ़ना और अपने लेखन में पिरोना आरंभ किया। इससे आवेश का संयमन संभव हुआ।
दलित साहित्यांदोलन में आवेश अनुभव, विचार और उत्कट परिवर्तनेच्छा के समुच्चय का नाम है। अगली अवस्था आवेश के आत्मसातीकरण की हो सकती है। पंजाबी के दलित कथाकार बलीजीत का साहित्य यही संकेत देता प्रतीत हो रहा है। आवेश का आत्मसातीकरण बड़ी संश्लिष्ट स्थिति है। पुंजीभूत अनुभव आवेश का ज्वार पैदा करता है। मात्र विचार न इस ज्वार को थाम सकते हैं और न उसे सहेज सकते हैं। आवेश के तंतु इतने गुत्थमगुत्था और पेचोखम वाले होते हैं कि उन्हें संभालना आसान नहीं होता। आवेश की निर्मिति में कई स्रोतों की भूमिका रहती है- सुदूर अतीत के अनुभव, जो सामूहिक स्मृतियों के जरिए यात्रा करते हुए आते हैं; सामुदायिक अनुभव, पारिवारिक और वैयक्तिक अनुभव, स्थूल और सूक्ष्म हिंसा के विविध अनुभव, भाषिक अभिव्यक्तियों में गुंथी अवमानना के दंश आदि। इन आवेशों का अनुकूलन आत्मसातीकरण नहीं है। आवेश का प्रबंधन भी आत्मसातीकरण नहीं कहा जा सकता। आवेश के शमन को भी इसी तरह देखना चाहिए। आवेशों के जाहिरनामे का सबसे मुफीद इलाका आत्मकथा है। इनकी अभिव्यक्ति में न्यूनतम लेखकीय हस्तक्षेप इसी विधा में संभव है। लेकिन, यहां भी रचनाकार को चयनधर्मी होना पड़ता है। ऐसी चयनधर्मिता में परिष्कार कम, यादृच्छिक छंटाई अधिक होती है।
वास्तव में आवेश के सृजनात्मक रूपांतरण की क्षमता अर्जित करना आत्मसातीकरण के निकट पड़ता है। यहां समस्या अनुभवों के वर्गीकरण या कोटि निर्माण की है। सभी तरह के आवेशों का रूपांतरण न तो काम्य है और न ही संभव। रचनाकार को अपनी वरीयताएं पहचाननी और तय करनी पड़ती हैं। इस क्रम में बहुत कुछ छूटना लाजमी है। मगर यह सब स्थूल अर्थ में सायास नहीं होता। सृजन अपना रास्ता खुद चुनता है। वह रचनाकार के एक अनुभव-कोष से सामग्री ले सकता है, साथ ही दूसरे अनुभव-कोष का संज्ञान लेने से भी मुकर सकता है। यह भी कि तमाम अनुभव कोषों को फेंट कर एक नए अनुभव कोष का निर्माण हो सकता है।
ऐसे मिश्रित स्रोत से उपजे आवेश की प्रकृति ही अलहदा होती है। आस्वाद के परिचित धरातलों से इतर। न सर्वथा कड़वाहट भरा आवेश, न निरा प्रेमावेग। न मात्र रोषपूरित भाव और न सिर्फ हर्षावेग। इन ध्रुवांतों के मध्य एकल शेड वाले आवेश भी नहीं। विचार और संवेदना अपनी गहन पारस्परिकता में। एक का दूसरे पर आरोपण नहीं। तरजीह देने का सवाल ही जहां बेमानी हो जाए। ऐसे आवेश का नया बही-खाता खोलने के लिए रचनाकार का निष्कवच होना मानो पूर्वशर्त हो। जब रचना के ढांचे में ही आक्रामकता घुला दी गई हो, तो रचनाकार के बचाव की आतंरिक सज्जा का अवकाश नहीं रहता।
ऐसे में जितना बेध्य अभीष्ट प्रतिपक्ष होता है उतना ही स्वपक्ष। रचना के लिए जीवन ही सब कुछ होता है। सृजन से कोई दूसरा मकसद नहीं साधा जाता। जीवन की विडंबनाएं उछाली नहीं जातीं। कृति में विडंबना के निवेश और बरताव का कोई फार्मूला नहीं बनता। जिस संजीदगी से कथा-विन्यास में विडंबना को गूंथा जाता है उससे सहज संभाव्य होने के बावजूद आवेश के स्फुल्लिंग नहीं फूटते। तनिक हेरफेर से विडंबनाएं घृणा मिश्रित क्रोध के धधकते गोले में बदली जा सकती हैं, बहुधा बदली जाती रही हैं। पर, आवेश के आत्मसातीकरण की कठिन प्रक्रिया से गुजरा हुआ रचनाकार सप्रयास ऐसा नहीं होने देता। आवेश को जज्ब कर सकने वाले लेखक नफरत की फितरत से बखूबी वाकिफ होते हैं। वे तात्कालिक फायदे के साथ दीर्घकालिक दुष्प्रभावों का आकलन करके ही घृणा के विनियोजन के प्रलोभन से बचते हैं।
ऐसा आकलन कर सकने की सलाहियत और दृष्टि विरल रचनाकारों में होती है। अस्मिताओं के तीव्र प्रवाही समय में जहां कथ्य, संवेदना, शैली और रूप अधिकाधिक ‘आत्मपरक’ होते गए हैं, यह सुयोग और भी कम घटित होता नजर आता है। पूर्व-अस्मितावादी समय में ऐसी सामान्यीकृत आत्मपरकता संभव नहीं थी।
यह न समझ लिया जाए कि आवेश का आत्मसातीकरण सर्वथा निरापद मामला है। इस ढर्रे के अपने अंध बिंदु हैं, जिसका ध्यान रखना आवश्यक है। आत्मसातीकरण की प्रक्रिया में यह हो सकता है कि स्थूल, अनवरत और ठोस हिंसा के संदर्भों से कन्नी काट ली जाए, जातिवादी मानस की कू्ररताएं धुंधली हो जाएं, वर्णवादी चेहरों को चिह्नित करने का ‘पारंपरिक’ दायित्व स्थगित हो जाए। बलीजीत की कहानियां इस शंका को आधार देती हैं। उनके यहां आश्चर्यजनक रूप से संगठित होते, नारे लगाते, प्रतिरोध करते दलितों की छवियां नदारद हैं। दलित बस्तियों पर सुनियोजित हमले और उसकी पृष्ठभूमि में राजनीतिक गतिविधियों की कोई भनक नहीं मिलती। दलित स्त्री की पीड़ा का भरपूर संज्ञान लिया गया है, लेकिन हाल के वर्षों में सामने आई नई दलित स्त्री की पदचाप अभी तक सुनी नहीं जा सकी है। वे कड़वाहट के नहीं, संवेदना-सृष्टि के लेखक हैं। मुखर प्रतिबद्धता के नहीं, व्यंजक प्रतिबद्धता के कलमकार हैं।

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