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संपादकीयः जानलेवा रोष

पहले बीएसएफ के एक जवान ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाल कर घटिया खाने की तरफ पूरे देश का ध्यान खींचा, फिर सीआरपीएफ के एक जवान ने भी सोशल मीडिया के जरिए वेतन विसंगतियों का मसला उठाया।

Author Updated: January 14, 2017 2:51 AM
बिहार के औरंगाबाद में सीआइएसएफ यानी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान बलवीर सिंह गिरफ्तार

पहले बीएसएफ के एक जवान ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाल कर घटिया खाने की तरफ पूरे देश का ध्यान खींचा, फिर सीआरपीएफ के एक जवान ने भी सोशल मीडिया के जरिए वेतन विसंगतियों का मसला उठाया। इन दोनों शिकायतों से हैरानी और हंगामे के आलम में एक और खबर आई, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। बिहार के औरंगाबाद में सीआइएसएफ यानी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान बलवीर सिंह ने अपने चार साथियों की गोली मार कर हत्या कर दी। ये जवान नबीनगर पॉवर जेनरेटिंग कंपनी के परिसर में तैनात थे। दो जवानों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। इन घटनाओं से जाहिर है कि हमारे अर्धसैनिक बलों में सबकुछ ठीकनहीं चल रहा है और अनेक स्तरों पर समीक्षा तथा गहन सुधार की जरूरत है। खबर के मुताबिक जिस जवान ने अपने चार साथियों की जान ले ली, वह छुट््टी न मिल पाने से नाराज था और इस मामले में अपने वरिष्ठ साथियों से उसकी तीखी बहस हो गई थी। संभवत: छुट्टी न मिलने पर साथियों ने उसका मखौल उड़ाया था और उस पर छींटाकशी की थी। फिर उसने गुस्से में आकर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। छुट्टी मंजूर न होने से किसी जवान के आपे से बाहर होने जाने और अपने साथी या अफसर पर हमला कर बैठने की यह पहली घटना नहीं है; इससे पहले भी ऐसे कई मामले हो चुके हैं।

हालांकि सीआइएसएफ ने यह सफाई पेश की है कि हादसे के पीछे छुट्टी न मिल पाना कोई कारण नहीं था; बलवीर सिंह आठ दिन पहले ही छुट्टी से लौटा था; उसने पिछले एक साल में ढाई महीने से ज्यादा छुट्टियां ली थीं, जो सीआइएसएफ में सालाना औसत से ज्यादा है। बहरहाल, यह स्पष्टीकरण सही हो तब भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बलवीर सिंह गहरे तनाव और अवसाद में रहा होगा। और सबका गुस्सा चरम हिंसा में भले न फूटता हो, पर जहां अवसाद तथा तनाव में जीने व काम करने की बात है, बलवीर सिंह को अपवाद नहीं कहा जा सकता। कुछ दिन पहले सीआइएसएफ के एक सब-इंस्पेक्टर के दक्षिण दिल्ली के कालकाजी मेट्रो स्टेशन पर खुदकुशी कर लेने की खबर आई थी। खुद सीआइएसएफ के एक आंतरिक अध्ययन ने बताया था कि उसके बहुत सारे जवान कुछ वक्त परिवार के बीच बिताने के लिए छुट््टी न मिल पाने के कारण अवसाद में रहते हैं।

सीआइएसएफ का गठन 1969 में 3129 जवानों के साथ हुआ था, औद्योगिक इकाइयों की रक्षा के उद््देश्य से। आज इसके पास एक लाख चौवालीस हजार जवान हैं, जो औद्योगिक इकाइयों के अलावा नक्सल प्रभावित इलाकों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, मेट्रो आदि की रक्षा में तैनात रहते हैं। बीएसएफ या भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की तरह उन्हें शायद वैसे कष्ट न उठाने पड़ते हों जैसे सरहद या दुर्गम इलाकों में उठाने पड़ते हैं, मगर जरूरत के समय अगर छुट््टी न मिल पाए या पर्व-त्योहार पर घर न जा पाएं, तो उसका दुख सालता होगा। शादी-ब्याह के सीजन में, या पर्व-त्योहार पर छुट्टी की मांग बढ़ जाती है और कुछ की अर्जियां मंजूर न हो पाती होंगी। मगर रिक्त पदों पर नियुक्ति न होने से काम के बढ़े बोझ और लंबी ड्यूटी की विवशता पुलिस से लेकर तमाम विभागों में है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अर्धसैनिक बलों के जवानों की मन:स्थिति को समझने की कोशिश सरकार करेगी और कुछ समाधानकारी उपाय भी।

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