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खेल-खेल में बच्चों की पढ़ाई

संगीत और नृत्य से अंग्रेजी की एबीसीडी पढ़ाने वाली मनु गुलाटी को भारत सरकार ने 2018 में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया था। वे दिल्ली सरकार के एसकेवी नंबर-दो स्कूल, पंजाबी बाग में पढ़ाती हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: August 29, 2019 4:51 AM
मनु गुलाटी टीजीटी होने के साथ-साथ अब परामर्शदाता शिक्षिका भी हैं।

मीना

शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें।’ डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के इन विचारों को मनु गुलाटी और आरती कानूनगो जैसी शिक्षिकाएं बखूबी निभा रही हैं। ये शिक्षिकाएं केवल रचनात्मक तरीके से पढ़ा ही नहीं रही हैं बल्कि छात्राओं को आगे कैसे बढ़ाया जाए, उनमें आत्मविश्वास कैसे पैदा किया जाए आदि विषयों पर भी काम कर रही हैं। सरकारी स्कूल की इन शिक्षिकाओं ने बच्चों को रचनात्मक तरीके से पढ़ाकर देश का नाम दुनिया भर में रोशन किया है।

संगीत और नृत्य से अंग्रेजी की एबीसीडी पढ़ाने वाली मनु गुलाटी को भारत सरकार ने 2018 में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया था। वे दिल्ली सरकार के एसकेवी नंबर-दो स्कूल, पंजाबी बाग में पढ़ाती हैं। मनु गुलाटी टीजीटी होने के साथ-साथ अब परामर्शदाता शिक्षिका भी हैं। वे कहती हैं कि सरकारी स्कूल में जिस वर्ग से बच्चे आते हैं वो बहुत अमीर परिवारों के नहीं होते। इनके लिए अंग्रेजी को समझना थोड़ा मुश्किल होता है इसलिए बच्चों को अंग्रेजी सिखाना और आना बहुत रोचक होना चाहिए। ताकि बच्चे को उस भाषा से प्यार हो जाए।

इसीलिए मैंने पढ़ाने के लिए संगीत और नृत्य का तरीका निकाला। उनका मानना है कि पढ़ाने के लिए सृजनात्मकता जरूरी है। अगर पढ़ाने के तरीके रचनात्मक नहीं होंगे तो बच्चों के लिए शिक्षा उबाऊ बन जाएगी। मनु का अनुभव रहा है कि रचनात्मक तरीके से पढ़ाने से कक्षा में छात्राओं की उपस्थिति बढ़ी है। अपने पढ़ाने के अलग अंदाज से मनु उस छवि को भी तोड़ रही हैं जिसमें ये माना जाता था कि सरकारी स्कूल के शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं।

संगीत और नृत्य से जुड़ते हैं बच्चे
मनु कहती हैं कि हम पहले अंग्रेजी गाने बच्चों को सुनाते हैं। इससे छात्राओं को शब्द याद होते हैं। इन्हीं को मैं नृत्य और संगीत के साथ सिखाती हूं। मेरे स्टेप्स डांस के शब्द के अनुसार होते हैं। जब यही प्रक्रिया बच्चे करते हैं तो वे उससे खुद को जोड़ पाते हैं और वो शब्द उन्हें याद रहते हैं। मनु का मानना है कि नंबर ही तरीका नहीं है ये देखने का कि किस बच्चे ने कितना सीखा। मेरे लिए जरूरी है कि जो भी मैं अपने बच्चे को करवा रही हूं उसमें मेरे बच्चे को आत्मविश्वास आए।

माहवारी की भ्रांतियों को तोड़ा
मनु जेंडर के मुद्दों पर भी काम करती हैं। वे कहती हैं कि लड़कियां घरों में अधिक रहती हैं इस वजह से उन्हें मालूम नहीं होता कि अगर बैंक जाएं तो कैसे लेन-देन करें या माहवारी को लेकर उनके अंदर बहुत से भ्रामक तथ्य होते हैं। इन सभी भ्रांतियों को तोड़ने का काम हम करते हैं। वे कहती हैं कि बच्चों के समग्र विकास के लिए जरूरी है कि उनमें किसी भी काम को करने के लिए आत्मविश्वास पैदा हो। जब बच्चे संगीत और नृत्य के माध्यम से सीखते हैं तो उनकी झिझक हटती है।

शिक्षक भी लगातार सीखें
वे कहती हैं कि विद्यार्थी के जीवन में शिक्षक सभी भूमिकाएं निभाता है। वो मां, बहन, दोस्त, पिता कुछ भी हो सकता है। बच्चे बहुत संघर्ष से निकल रहे हैं। अगर कोई लड़की किसी समस्या से गुजर रही है तो हम उसके साथ बैठें और बात करें। मैं भावुक और सामाजिक मुद्दों पर बात करने में विश्वास करती हूं। जिंदगी में नंबर ज्यादा या कम मायने नहीं रखता बल्कि मायने ये रखता है कि मेरा बच्चा खुश रहे। वे कहती हैं कि सीखना केवल विद्यार्थी को नहीं है बल्कि शिक्षकों को भी लगातार सीखते रहना चाहिए। शिक्षक विद्यार्थी तो हर पल होना ही चाहिए। तभी बच्चों को कुछ नया मिल पाएगा।

‘टीचर इनोवेटर आॅफ द इयर 2018’ और ‘ग्लोबल टीचर प्राइज’ की दौड़ में शामिल रहीं आरती कानूनगो गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल, स्कूल ब्लॉक, शकरपुर में पढ़ाती हैं। उनका मानना है कि पढ़ाने के रचनात्मक तरीके (इनोवेशन) और शिक्षक दोनों साथ-साथ चलते हैं। सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में 50 से 60 बच्चे होते हैं। उनका किसी बात को समझने का स्तर भी अलग होता है। कोई किसी बात को बहुत आसानी से समझ लेता है तो किसी को कोई बात समझाने के लिए नए तरीके अपनाने पड़ते हैं और वही नए तरीके उस समय के लिए किसी शिक्षक के लिए रचनात्मकता होती है।

खेल-खेल में सिखाती हूं अंग्रेजी
अंग्रेजी की शिक्षिका आरती का कहना है कि मैं बच्चों को नाटक, कहानी, आर्ट एंड क्राफ्ट, कविता, संगीत आदि कई ऐसे तरीके हैं जिनसे उन्हें पढ़ाती हूं। वे कहती हैं कि किसी भी भाषा को सीखने का पहला तरीका होता है उसे सुनना। जब बच्चे सुनते हैं तो उनके लिए भाषा का अजनबीपन खत्म होता है। मैंने कई सारे खेल इजात किए जिनसे बच्चों को पढ़ाती हूं। आरती का कहना है कि जब शिक्षक किसी योजना के साथ कक्षा में जाएंगे तभी वे उसे कर पाएंगे। पढ़ाने के ऐसे तरीके ही रचनात्मकता कहलाते हैं।

छात्राओं को किया जागरूक
आरती पढ़ाने के अलावा छात्राओं को जागरूक करने का भी काम करती हैं। वे कहती हैं कि जब उन्होंने इस स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था तब लड़कियां अक्सर अपने माहवारी के दिनों में छुट्टी कर लेती थीं। इस वजह से उनकी कक्षा में उपस्थिति कम हो जाती थी। उस वक्त ये जरूरी था कि छात्राओं को पहले स्कूल में लाया जाए। जब मैंने अपने पढ़ाने के तरीकों को कुछ अलग किया और जब लड़कियों को समझाया कि माहवारी आपके उनके लिए कोई मुसीबत नहीं है बल्कि सामान्य जीवन के लिए बहुत जरूरी है। तब उन्हें और ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं पड़ी, वे खुद कक्षा में आने लगीं।

आरती का कहना है कि शिक्षक और अभिभावक बच्चों को अच्छे नंबर लाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं लेकिन ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं। पर हमें ये समझना होगा कि अगर बच्चा ज्ञान प्राप्त करेगा तो नंबर भी अच्छे लाएगा। हमारा पहला फोकस होता है कि बच्चा अच्छे से किसी भी बात को समझे। वे कहती हैं कि बच्चों के समग्र विकास के लिए शिक्षकों का सृजनात्मक होना बहुत जरूरी है। जब शिक्षक खुद नए प्रयास करते हैं तब बच्चे भी मेहनत करते हैं।

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