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कब लौटेगी वो किलकारी

कोरोना महामारी ने जीवन और समाज को कई लिहाज से पहले जैसा नहीं रहने दिया है। एक साल से लंबी चली महामारी के प्रकोप को सेहत और आर्थिक मोर्चे पर हुए बड़े नुकसान के तौर पर देखा जा रहा है। पर इससे बड़ा नुकसान उन नौनिहालों के हिस्से आया है जिनकी पढ़ाई तो प्रभावित हुई ही है, आंखों में बसे सपने भी लंबे समय के लिए मुरझा गए हैं।

सांकेतिक फोटो।

कोविड-19 की भयावहता पिछले साल के मुकाबले और बढ़ गई है। यह भयावहता सेहत के संकट से आगे जीवन और समाज के भीतर कई नई जटिलताएं और दुश्वारियां लेकर आई है। मातमी आलम के बीच रोजी-रोजगार जैसे संकट तो भारी हैं ही, महामारी के एक साल से लंबे दौर ने बचपन को भी मनोवैज्ञानिक खरोंच से भर दिया है। इससे आसानी से उबरने के किसी विकल्प के बारे में तो सोचना ही व्यर्थ है। घर के बड़ों के ‘जान है तो जहान है’ जैसे शब्दों के घूंट को हर रोज पीने की कोशिश में ऊबे-थके बच्चों का पूरा जीवन ही इस महामारी में बदल गया है।

बच्चे जाने-अनजाने कई स्तरों पर नजरअंदाजी के शिकार बने हैं। पक्षियों सा उड़ान भरता, जानता-सीखता बचपन आज एक बंधी शैली में कैद होकर कुंभला रहा है। उनके विद्यालय, खेल-खिलौने, घूमना-फिरना, मौज-मस्ती, दोस्तों से मिलना, लड़ना-झगड़ना और वो सब कुछ बंद है जो बच्चों के सहज विकास के लिए जरूरी है। लाखों बच्चों की तो पढ़ाई पूरी तरह छूट गई है। ज्यादातर घरों में माता-पिता अपनी ही समस्याओं और दुश्चिंताओं में इतने खोए हैं कि वो बच्चों की सामान्य जरूरतों की पूर्ति के अलावा अन्य तथ्यों पर गौर भी नहीं कर पा रहे हैं। वो यह देख ही नहीं पा रहे हैं कि यह समय उनके बच्चों के लिए भी बेहद कठिन है।

सामाजिक-आर्थिक असर

महामारी के प्रकोप के बीच बच्चों पर पड़े असर संबंधी अपने अध्ययन में संयुक्त राष्ट्र कहता है, ‘कोरोना के इस दौर में दुनियाभर के बच्चे सबसे ज्यादा पीड़ित हुए हैं। इसने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाला है। इस दौरान माता-पिता के नौकरी जाने और घरेलू हिंसा का सीधा असर बच्चों के मानसिक शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ा है। इस कालक्रम में बढ़ी घरेलू हिंसा ने बच्चों पर नकारात्मक असर डाला है।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़ी संख्या में बच्चे इस समय सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रभावित होते जा रहे हैं। गरीब देशों में इन परेशानियों का असर और ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार कामबंदी के कारण दुनियाभर के करीब 4 से 6 करोड़ बच्चे गरीबी की चपेट में आ गए हैं।

गौरतलब है कि दुनियाभर के 40 करोड़ बच्चे पहले से ही गरीबी रेखा के नीचे की जिंदगी बसर कर रहे हैं। पूरे विश्व में इस महामारी ने करीब 150 करोड़ स्कूली बच्चों की शिक्षा को बाधित किया है। एक उपाय के तौर पर चलाए जा रहे आॅनलाइन कक्षाओं का लाभ गरीब बच्चे नहीं उठा पा रहे हैं। आलम तो यह है कि दुनिया के करीब एक तिहाई बच्चे डिजिटल वर्ल्ड से वाकिफ ही नहीं हैं।

भारत में महामारी के संदर्भ में यूनिसेफ का कहना है कि कोविड-19 के संक्रमण के कारण विश्व के अन्य देशों की तरह भारत में भी मानव और वित्तीय संसाधनों में कमी के साथ-साथ मेडिकल सप्लाई चेन में भी बाधा आ रही है। पूर्णबंदी, कर्फ्यू और परिवहन सेवाओं पर रोक तथा संक्रमण के डर से लोग स्वास्थ्य केंद्रों पर कम जा रहे हैं। इससे बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं तक टीकाकरण और अन्य सेवाएंं नहीं पहुंच पा रही हैं। यह स्थिति सिर्फ भारत में ही अगले छह महीने में तीन लाख बच्चों की मौत का कारण बन सकती है।

प्रवासी मजदूरों के बच्चे

भारत जैसे देश में जहां सामान्य दिनों में भी हर साल कुपोषण के कारण दस लाख बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। 10 करोड़ बच्चों ने अब तक स्कूल का मुंह भी नहीं देखा है। देश के 44 करोड़ बच्चों में से 14 करोड़ बाल श्रमिक हैं। उपरोक्तअध्ययन बड़ी ही स्पष्टता से कोरोना महामारी का बच्चों के जीवन पर हो रहे या होने वाले प्रभावों की बात बताता है। ऐसे में सहज रूप से सोचा जा सकता है कि यह महामारी अधिसंख्य बच्चों के जीवन को किस गर्त में लेकर जाएगी। इस दौरान देश में प्रवासी मजदूरों की समस्या विकराल रूप से सामने आई है।

मीडिया के तमाम संजालों पर इसकी चर्चा भी खूब हुई है। पर इस क्रम में जो अहम तथ्य सार्वजनिक मंचों पर चिंता के तौर पर नहीं उभरा है वह है प्रवासी बच्चों की समस्या, जिन पर मौजूदा दौर का सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है। वो अपने न्यूनतम अधिकारों यथा- शिक्षा, स्वास्थ्य, उचित पोषण आदि से भी वंचित हो गए हैं। ज्यादातर बच्चे विद्यालय से दूर हैं और कुछ का नामांकन हुआ भी है तो नाममात्र के लिए ही। आज की तारीख में ऐसे ज्यादातर बच्चे बाल मजदूर बनने को अभिशप्त हैं।

तालीम पर ताला

इस महामारी ने बच्चों की शिक्षा को बुरी तरह प्रभावित किया है। गांव हो या शहर हर स्तर पर सरकारी विद्यालयों से लेकर निजी विद्यालय बंद पड़े हैं। कभी छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के खट्टे-मीठे कोलाहल से गुंजित सीखने-सिखाने वाले और जीवन के रंगों से बच्चों को परिचित कराने वाले ये विद्यालय कब स्थायी तौर से खुलेंगे, कोई नहीं जानता। हर स्तर पर विद्यार्थी आॅनलाइन पढ़ाई के लिए मजबूर हैं। इसका फायदा ऊंची कक्षा के बच्चे, इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट आदि से जुड़े विद्यार्थी तो कुछ हद तक उठा भी रहें है, पर कम उम्र के बच्चों के लिए यह परेशानी का कारण बन चुका है।

कंप्यूटर, मोबाइल और नेट की समस्या, शिक्षकों की क्षमता, विद्यार्थियों को समझ में न आना और ऐसी कक्षाओं के प्रति दिलचस्पी न होना आदि बड़ी समस्याएं हंै। बड़ी बात यह भी है कि जिन लोगों के पास इसके साधन नहीं हैं, उनकी पढ़ाई बंद ही है। इस दौरान सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई सर्वाधिक प्रभावित हुई है। गरीबी की मार, किताबों का न होना, अधिकतर परिवार के सदस्यों का शिक्षा से दूर होना और उन बच्चों की जिज्ञासाओं और प्रश्नों का हल न मिलने के कारण ये बच्चे लगातार पढ़ाई से दूर होते जा रहे हैं।

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