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चौपालः बदलाव की शर्त

हमारे समाज के एक छोटे-से हिस्से को छोड़ कर शेष समाज में आज भी जब कोई दूल्हा बनता है तो चाहे वह कोई भी हो, अपने विवाह के दिन उसे यकायक एक विशिष्टता का बोध होने लगता है।

Author Published on: July 29, 2016 3:07 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारे समाज के एक छोटे-से हिस्से को छोड़ कर शेष समाज में आज भी जब कोई दूल्हा बनता है तो चाहे वह कोई भी हो, अपने विवाह के दिन उसे यकायक एक विशिष्टता का बोध होने लगता है। वह महसूस करने लगता है कि जिस युवती से उसका विवाह हो रहा है, वह कहने को भले उसकी अर्धांगिनी रहेगी लेकिन यथार्थ में जीवन भर वह अनुगामिनी रहेगी। उसकी सोच का एक नमूना यह भरोसा भी है कि उसकी पत्नी वोट तक उसकी पसंद के उम्मीदवार को देगी! मजे की बात यह भी है कि अपने ससुराल पक्ष से वह अपेक्षा रखता है कि वे हमेशा उसकी जायज-नाजायज मांगों को स्वीकार करते रहेंगे। इतना ही नहीं, समाज का यह बड़ा हिस्सा मान कर चलता है कि लड़कियों को विवाह के बाद अपने ससुराल वालों की सेविका के बतौर वे सभी काम करने होंगे जिनके लिए उससे कहा जाएगा।

यही कारण है कि दफ्तर से आते ही वे अपनी बहू को किचन में देखना पसंद करते हैं। आज भी अधिकतर घरों में बेटों को किचन से दूर रहने की हिदायत दी जाती है। कई मामलों में तो दिन भर घर से बाहर ‘जी हुजूरी’ करने वाले ऐसे पति घर में घुसते ही खुद को ‘हुजूर’ मानने लगते हैं! अगर अपवादस्वरूप कुछ पति घर के कामों में अपनी पत्नी की मदद करते हैं तो उन्हें जोरू का गुलाम कहा जाता है। ऐसे लोगों के हिसाब से सच्चा मर्द वही है जिसकी बीवी उसके सामने चूं तक न करे! दरअसल, ये नहीं जानते कि एक वास्तविक मर्द हमेशा अन्याय का विरोध करता है फिर चाहे वह अन्याय घर में हो या बाहर।

देश को यदि सचमुच बदलना है तो पहले ऐसे सभी लोगों को खुद को बदलना होगा। सिर्फ शौचालय बना कर देश नहीं बदलेगा। देश तो तभी बदलेगा जब उसमें रहने वाले इंसान बिना किसी भी तरह के भेदभाव के सभी को सम्मान देना सीखेंगे फिर चाहे वह पत्नी हो या कोई सफाईकर्मी।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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