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संपादकीयः राज्य का कर्तव्य

सर्वोच्च अदालत ने कावेरी विवाद पर अपने आदेश के बाद हिंसा रोक पाने में नाकाम रहने पर कर्नाटक और तमिलनाडु की सरकारों से उचित ही नाराजगी जताई है।

Author Updated: September 17, 2016 3:29 AM
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सर्वोच्च अदालत ने कावेरी विवाद पर अपने आदेश के बाद हिंसा रोक पाने में नाकाम रहने पर कर्नाटक और तमिलनाडु की सरकारों से उचित ही नाराजगी जताई है। आने वाली समस्या या चुनौती का दोनों राज्य सरकारों को पहले से जरूर अंदाजा रहा होगा, क्योंकि कावेरी के जल बंटवारे का विषय बहुत लंबे समय से एक भावनात्मक मसला रहा है। इससे पहले भी जब अदालत का फैसला आया, विवाद सड़कों पर आ गया और पुलिस को भीड़ नियंत्रण में लगना पड़ा। टकराव और हिंसा की घटनाएं हुर्इं। इस बार भी वैसा होने का अंदेशा था। पर पहले के सारे अनुभवों तथा आगाह करने वाले साफ संकेतों के बावजूद सिद्धरमैया सरकार एहतियाती कदम उठाने में विफल रही। कानून-व्यवस्था बनाए रखना किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है, इसलिए अदालत का यह कहना एकदम वाजिब है कि दोनों राज्यों की जिम्मेदारी है कि हिंसा न हो और संपत्तियों को नुकसान न पहुंचाया जाए। अदालत को ऐसा इसलिए कहना पड़ा कि उसके फैसले के बाद कर्नाटक में उबाल आ गया। एक भावनात्मक मुद््दा होने से तीखी प्रतिक्रिया का तर्क एक हद तक माना जा सकता है, पर जिस तरह तोड़-फोड़, आगजनी और हिंसा की घटनाएं हुर्इं, और तमिलनाडु में भी उसी तरह से उसका जवाब देने की प्रवृत्ति दिखी, उसे सियासी खेल से अलग करके नहीं देखा जा सकता। दोनों तरफ कावेरी के बहाने उग्र क्षेत्रीय भावनाओं की आंच पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती रही हैं। विडंबना यह है कि अदालत का फैसला कार्यपालिका की नाकामी की देन है।

जल बंटवारे के विवाद को अगर कावेरी घाटी वाले राज्य आपसी सहमति से सुलझा लेते तो 2006 में कावेरी अवार्ड के गठन की जरूरत ही न पड़ती। पर अवार्ड के निर्णय को भी ये राज्य मानने को तैयार नहीं हुए और उसके खिलाफ सर्वोच्च अदालत की शरण में चले गए। उनकी अपीलों के मद््देनजर ही अदालत वर्षा की स्थिति और कावेरी में जल की उपलब्धता तथा संबद्ध पक्षों की जरूरत व दावेदारी आदि को देखते हुए जल बंटवारे का फैसला सुनाती रहती है। अगर उसे शांति से स्वीकार नहीं किया जाएगा, तो हालात काबू में नहीं रह सकते। जो लोग भीड़ को उकसाने में लगे रहते हैं, उन्होंने कभी सोचा है कि सर्वोच्च अदालत के फैसले को न मानने का नतीजा क्या होगा? इसे स्वीकार करने के सिवा दूसरा चारा क्या है? कर्नाटक के लोगों को बंगलुरु की ब्रांड छवि पर गर्व है।

सही है कि बंगलुरु अब कर्नाटक की राजधानी होने के साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी का एक अंतरराष्ट्रीय महत्त्व का केंद्र है। पर पिछले दिनों की घटनाओं से इसकी अंतरराष्ट्रीय छवि और राज्य को आर्थिक नुकसान पहुंचा है। अदालत ने तमिलनाडु के हिस्से का पानी छोड़ने का आदेश दिया, तो इसमें गलत क्या था? देश के भीतर ही नहीं, दूसरे देशों के साथ भी नदियों के पानी को लेकर साझेदारी के करार होते हैं। झगड़ा या विवाद आपस में न सुलझे तो अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का फैसला मानना पड़ता है। कावेरी के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी असंतुष्ट पक्ष को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए कानूनी कदम का सहारा लेने की आजादी है, पर शांति व कानून का सम्मान बनाए रखना चाहिए। तमिलनाडु और कर्नाटक के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों राज्यों के लोगों से शांति व सौहार्द बनाए रखने की अपील कर चुके हैं। पर सवाल है कि उपद्रव, हिंसा तथा अफवाहों से निपटने की जिम्मेदारी भी तो उनकी थी; उन्होंने क्यों कोताही बरती?

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