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कारोबारी छलांग

दुनिया के बाजारों में अभी तक चीन, अमेरिका आदि कुछ देशों का वर्चस्व है।

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अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए घरेलू उत्पाद का बाहरी बाजार में पैठ बनाना बहुत जरूरी है। इस दृष्टि से भारत पिछड़ा रहा है। इसके आयात और निर्यात में काफी अंतर रहा है। इसलिए लगातार मांग उठती रही है कि व्यापारिक घाटा पाटने के लिए निर्यात को बढ़ावा देना चाहिए। यह पहली बार है, जब सरकार के घोषित लक्ष्य को प्राप्त करते हुए चालू वित्त वर्ष में निर्यात चार सौ अरब डालर के पार पहुंच गया है।

यह ऐसे समय में संभव हो सका है, जब दुनिया भर में कोविड महामारी के चलते आर्थिक गतिविधियां शिथिल पड़ी हुई थीं और फिर रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से बाहर के बाजार पर संकट मंडराना शुरू हो गया। निस्संदेह इस उपलब्धि से सरकार का मनोबल बढ़ा और अर्थव्यवस्था को जल्दी पटरी पर लाने के संकल्प को मजबूती मिली है।

प्रधानमंत्री ने इसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए कहा है कि यह आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में मील का पत्थर साबित होगा। स्वाभाविक ही निर्यात बढ़ने से एमएसएमइ यानी सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा। एमएसएमइ में बेहतरी का अर्थ है, रोजगार के नए अवसर पैदा होना, क्योंकि इस क्षेत्र में सबसे अधिक रोजगार के अवसर हैं। कोरोना महामारी की वजह से हुई पूर्णबंदी ने इस क्षेत्र की बहुत बुरी गत बना दी थी। अब निर्यात बढ़ने से इस क्षेत्र को बल मिलेगा।

दुनिया के बाजारों में अभी तक चीन, अमेरिका आदि कुछ देशों का वर्चस्व है। उसे तोड़ना भारत के लिए कठिन बना हुआ था। मगर कोरोना काल में जब दुनिया के बड़े कल-कारखाने बंद हुए तो भारत जैसे देशों को उन बाजारों में पैर पसारने की जगह मिल गई। भारत के जिन क्षेत्रों में निर्यात की दर बढ़ी है, वे पेट्रोलियम उत्पाद, रसायन, रत्न, आभूषण और इंजीनियरिंग हैं। इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर काफी हैं। रत्न के कारोबार में भारत पहले से अग्रणी देशों में शुमार है। इसमें कुटीर उद्योग के रूप में काम करने वाले भी बहुत सारे लोग जुड़े होते हैं।

कोविड की वजह से अर्थव्यवस्था में आई मंदी के दौर में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार के नए अवसर पैदा करने की है। बंदी के दौरान लाखों लोगों के रोजगार छिन गए, एमएसएमइ के बहुत सारे कल-कारखानों में ताले पड़ गए। उनके पास नए सिरे से कारोबार करने की पूंजी तक नहीं बची, कर्ज का बोझ ऊपर से था। हालांकि आसान शर्तों पर सरकार ने कर्ज की व्यवस्था की थी, पर उद्यमियों की हिम्मत जवाब दे गई थी। इसकी बड़ी वजह थी कि उनके उत्पाद के लिए बाजार नजर नहीं आ रहा था।

आयात के मुकाबले निर्यात के बढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी है कि सरकार ने घरेलू उत्पाद को बढ़ावा देना शुरू किया है। कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है, जिसके चलते बाहर की वस्तुओं की अपेक्षा कीमत और गुणवत्ता में देशी उत्पाद प्रतिस्पर्धा में खड़े हो सके हैं। फिर बाहर के बाजारों में नई जगहें तलाशने में कामयाबी मिली है, यह ज्यादा संतोष की बात है।

अभी तक गुणवत्ता और कीमत के स्तर पर भारतीय उत्पाद विदेशी वस्तुओं के सामने प्रतिस्पर्धा में खड़े नहीं हो पा रहे थे। अब उनकी पहुंच बढ़ रही है तो यह इस बात का संकेत है कि बाहर के बाजारों में भारतीय उत्पाद की गुणवत्ता पर वहां के लोगों का भरोसा बढ़ा है। कारोबार में यह उछाल बना रहा, तो बहुत जल्दी इसके सकारात्मक नतीजे नजर आने लगेंगे।

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